क्या नोवार्टिस फ़ैसले से वाकई कुछ बदलेगा?

नोवार्टिस
Image caption नोवार्टिस सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से ख़ुश नहीं है

स्विस दवा कंपनी नोवार्टिस की कैंसर की एक दवा के पेटेंट से जुड़ी याचिका ख़ारिज करने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद दिल्ली स्थित एक शीर्ष स्वास्थ्य विशेषज्ञ शक्तिवेल सेल्वाराज का कहना था- ये एक ऐतिहासिक फ़ैसला है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का मतलब ये है कि जेनेरिक दवाएँ बनाने वाली कंपनियाँ कैंसर की इस दवा की नकल करके सस्ती दवाएँ बनाकर भारत में बेच सकती हैं.

भारत उन देशों में शामिल है, जहाँ तेज़ी से दवाओं का बाज़ार बढ़ रहा है. डॉक्टर सेल्वाराज का मानना है कि इस फ़ैसले ने भारत के प्रगतिशील पेटेंट क़ानून का समर्थन किया है, जो निरर्थक पेटेंट्स को ख़ारिज करता है और इसमें स्पष्ट तौर पर अंतर करता है कि क्या नया है और क्या पहले से मौजूद है.

सेल्वाराज कहते हैं, "ये क़ानून यह संदेश देता है कि हम कंपनियों को उन वस्तुओं पर पेटेंट के लिए प्रोत्साहित नहीं करना चाहते, जो पहले से ही मौजूद हैं."

लेकिन इन सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि ये फ़ैसला भारत जैसे देश में सस्ती जीवन रक्षक दवाओं को बढ़ावा देता है, जहाँ स्वास्थ्य सेवा बढ़ती मांग का मुक़ाबला नहीं कर सकती और ज़्यादातर लोगों को अपनी दवा ख़ुद ही ख़रीदनी पड़ती है.

स्वास्थ्य सेवा

भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का चार प्रतिशत से कुछ ज़्यादा ख़र्च करता है. जबकि विकसित देशों में आठ से नौ प्रतिशत तक ख़र्च होता है.

इस ख़र्च का 70 प्रतिशत व्यक्तिगत और घरेलू स्तर पर होता है. सरकारी आँकड़े बताते हैं कि भारत में घरेलू स्तर पर दवाओं पर ख़र्च काफ़ी बढ़ा है. इनमें से ज़्यादातर जेनेरिक दवाएँ होती हैं.

पेटेंट दवाओं की बिक्री का अनुपात कुल दवाओं की बिक्री के 10 प्रतिशत से भी कम है. इससे अंदाज़ा हो जाता है कि भारत में जीवन रक्षा के लिए सस्ती दवाएँ कितनी अहम हैं.

डॉक्टर सेल्वाराज जैसे विशेषज्ञों का ये भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला दुनियाभर के लोगों के लिए भी खुशखबरी लाएगा.

विशेषज्ञ भारत को 'दुनिया का फॉर्मेसी' कहते हैं. भारत का औषधि उद्योग 11 अरब डॉलर का है और इसका 40 फ़ीसदी निर्यात किया जाता है. निर्यात की जाने वाली ज़्यादातर दवाएँ सस्ती जेनेरिक होती हैं.

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि नोवार्टिस इस फ़ैसले से ख़ुश नहीं है. कंपनी का कहना है कि ये फ़ैसला उन्नत दवाओं की खोज को हतोत्साहित करेगा, जो मरीजों के लिए मेडिकल साइंस को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक है.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से पहले ही कंपनी ने चेतावनी जारी कर दी थी. नोवार्टिस में शोध और विकास के पूर्व प्रमुख पॉल हेर्लिंग ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा था, "अभी की स्थिति के मुताबिक एक मूल यौगिक पर किसी तरह के सुधार को संरक्षण नहीं है और शायद ऐसी दवाएँ भारत में आए ही नहीं."

उन्होंने आगे कहा- हमें ऐसा करना भी क्यों चाहिए? लेकिन डॉक्टर सेल्वाराज मानते हैं कि ऐसी चेतावनी दिखावटी है.

सेल्वाराज कहते हैं, "दरअसल भारत दूसरे विकासशील देशों से भी ये ख़तरा हटा सकता है. भारत का जेनेरिक दवाओं के बाज़ार का एक बड़ा हिस्सा यूरोप और अमरीका से आता है."

भारत को इससे भी चिंतित नहीं होना चाहिए कि इस फ़ैसले से दवा उद्योग में विदेशी निवेश पर असर पड़ सकता है, क्योंकि इस क्षेत्र में विदेशी निवेश दो प्रतिशत से भी कम है.

सवाल

Image caption इस मामले में पेटेंट के खिलाफ अभियान चला था

ज़्यादातर विदेशी दवा कंपनियाँ भारतीय कंपनियों को अधिग्रहित करने को उत्सुक हैं या फिर वे आयातित दवाओं का कारोबार करती हैं. डॉक्टर सेल्वाराज कहते हैं कि ये कंपनियाँ भारत में बहुत कम दवाएँ बनाती हैं.

ब्लड कैंसर और अन्य कैंसर के इलाज में काम आने वाली दवा ग्लीवेक की प्रति महीने की क़ीमत क़रीब डेढ़ लाख रुपए है, जबकि इसकी समकक्ष भारतीय दवा नौ हज़ार में उपलब्ध है.

मेडिसिंस सैंस फ़्रंटियर्स की मिशेल चाइल्ड्स पूछती हैं- क्या वाकई दवाओं को इतना महंगा होना चाहिए?

एक एक अच्छा सवाल है.

पिछले सप्ताह बीबीसी न्यूज़ की वेबसाइट पर एक लेख में उन्होंने लिखा था- ये सच है कि उन्नत नई दवाएँ लोगों के इलाज के तरीकों को बदल सकती हैं और हमें इसकी ज़्यादा ज़रूरत है, लेकिन उन उन्नत दवाओं का फ़ायदा ही क्या, जब लोग नए इलाज से महरूम रहेंगे, क्योंकि ये इतने महंगे हैं.

जैसा कि मिशेल चाइल्ड्स कहती हैं, स्पष्ट रूप से इस मामले में नई सोच की आवश्यकता है.

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