आपबीती: पाकिस्तानी साथी की हिम्मत और लुटेरों से रिहाई

अब तक आप पढ़ चुके हैं कि समुद्री लुटेरों ने किस तरह जहाज़ पर सवार 22 लोगों को बंधक बना लिया. इसमें कई भारतीय भी थे. प्रीतम साहू भी उनमे से एक थे.पूरा एक साल समुद्र में बिताने के बाद आखिरकार वे रिहा हो चुके हैं और छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव स्थित अपने घर पर हैं.

प्रीतम की डायरी की अंतिम कड़ी में जानिए कि समुद्री लुटेरों के चंगुल से आखिर कैसे रिहा हुए नाविक.

पेश है उनके अनुभवों की कहानी उन्ही की जुबानी, जो बीबीसी संवाददाता सलमान रावी के साथ बातचीत पर आधारित है.

बिना पंखे गर्मी में दिन गुज़ारे

जहाज़ पर ही हमें पता चला कि हमारे जहाज़ को बंधक बनाने के बाद उन्होंने 'स्मरिणी' नाम के एक दूसरे जहाज़ को भी हाइजैक कर लिया है. समुद्र में कुछ ही दूरी पर उसे रखा गया था. उस पर काफी माल लदा था. वह नया जहाज़ था. इसलिए डाकुओं ने उसे छोड़ने के एवज में 18 अरब डॉलर की मांग की थी.

पढ़िए डायरी का पहला भाग

समुद्री डाकू हमसे कहने लगे कि एक और जहाज़ आने वाला है.'स्मरिणी' पर 20-25 नाविकों का दल था. इसमें 11 भारतीय थे.

कभी-कभी हम 'स्मरिणी' से डीज़ल लेकर आया करते थे. जब तक यह जहाज़ नहीं आया था, हमें कई दिन अँधेरे में गुज़ारने पड़े, क्योंकि हमारे पास डीज़ल नहीं था.

डायरी का दूसरा भाग

समुद्री डाकुओं ने जेनरेटर का इंतज़ाम तो किया था. लेकिन वह केवल चार किलोवाट का ही था.इससे केवल बल्ब ही जल सकते थे,पंखे नहीं. हमारा गर्मी से बुरा हाल था. बस किसी तरह हमने अपना वक़्त गुज़ारा. स्मरिणी के आने से हमें काफी राहत मिली.

हमें मानव ढाल बनाया

स्मरिणी पर हमेशा करीब 150 समुद्री डाकू सवार रहते थे. उनके पास एंटी एयरक्राफ्ट गन, रॉकेट लांचर आदि रहते थे.

इसलिए मन में कभी भागने की बात ही नहीं आई. अलबत्ता हमने एक बार एक समुद्री डाकू का मोबाइल चुराकर उसका सिम कार्ड ग़ायब कर दिया. इसी सिम के सहारे हम अपने घरों पर बात करते थे.

सुमद्री लुटेरों के साथ एक साल तस्वीरों में

वैसे तो सभी समुद्री डाकू क्रूर थे. लेकिन हमारे लिए खाना पकाने वाला अब्दुल्ला कुछ अलग था. अंग्रेजी के 20-25 शब्दों के सहारे वह हमसे बातचीत करता था. उसके पास हथियार नहीं था और वह दयालु भी था.

समुद्र में हमारे जहाज़ से 10-15 नॉटिकल मील की दूरी पर नैटो सेना का एक जहाज़ था.

हमें पता था कि वह जहाज़ हमारे लिए है. वह हमारे जहाजों की निगरानी करता था. अक्सर नैटो सेना के लोग हेलीकॉप्टर से हमारे जहाज़ के चक्कर लगाया करते थे. लेकिन वे जहाज़ पर हमला नहीं कर सकते थे, क्योंकि समुद्री डाकू हमें मानव ढाल के रूप में रखे हुए थे. उनका हमला या हमारे भागने की कोशिश घातक हो सकती थी.

प्रताड़ना के बाद भी नहीं बताया डीज़ल बाकी है

सुबह के 4.30 बज रहे थे. हम सब सो रहे थे कि डाकुओं ने सब को उठाया और कहा कि अपने जहाज़ का इंजन तैयार करो, हमें सुरक्षा कारणों से यहाँ से 20 नॉटिकल मील दूर जाना है. उन्होंने कहा कि अब यह जगह असुरक्षित हो गई है और कभी भी हम पर हमला हो सकता है.

मगर हमें लगा कि अब हमारे आज़ाद होने का वक़्त आ गया है. बिना वक़्त गंवाए हमने इंजन तैयार करना शुरू कर दिया. सारे समुद्री डाकू रात में ही हमारे जहाज़ से उतर चुके थे. केवल तीन या चार ही उस पर बचे थे.

हमारे पाकिस्तानी चीफ इंजीनियर अब्दुल राशिद ने 20 टन डीज़ल इसी दिन के लिए बचा कर रखा था. इतनी प्रताड़ना के बाद भी उन्होंने समुद्री डाकुओं को नहीं बताया कि हमारे पास इतना डीज़ल है.

और हम आज़ाद हो गए

Image caption प्रीतम और उनके साथ आज़ादी हो चुके हैं.

सुबह नौ बजे डाकुओं ने हम सबको बुलाया और कहा तुम लोग चले जाओ. तुम आज़ाद हो.

सुबह 9.30 बजे हमारे जहाज़ ने सफ़र शुरू किया. हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. सबसे पहले हमने समुद्री डाकू से चुराई गई सिम से अपने अपने घरों में फोनकर बताया कि हम आजाद हो गए हैं.

रास्ते में हमें नैटो सेना का जहाज़ भी मिला. नैटो सेना के कमान्डो 'स्पीड बोट' से हमारे जहाज़ पर आए. उन्होंने बताया कि वो एक साल से हमारी निगरानी कर रहे थे.

जितनी ख़ुशी हमें थी उतनी ही ख़ुशी उन्हें भी थी हमारे आज़ाद होने की, क्योंकि वे भी एक साल से अपने घर नहीं गए थे. ये सभी लोग 'स्पेनिश' बोल रहे थे.

फिर नौसेना के एक जहाज़ ने हमें एस्कार्ट कर ओमान तक पहुंचाया. वहां भारतीय दूतावास के अधिकारी मौजूद थे. भारत की सरकार ने हमारे लिए बहुत किया. हमें आज तक यह पता नहीं चल पाया है कि हमारी रिहाई के लिए डाकुओं को कितना पैसा दिया गया.

ओमान पहुंचने के बाद पता चला कि समुद्री डाकुओं ने 18 अरब डॉडर लेने के बाद स्मरिणी को भी छोड़ दिया है.

अब मैं अपने घर वापस आ गया हूँ. मुझे नहीं लगता कि घर वाले मुझे दोबारा समुद्री जहाज़ पर नौकरी करने जाने देंगे. ऐसे में अब मुझे किसी दूसरी नौकरी की तलाश करनी पड़ेगी.

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