क्या मोदी की मंच कला राहुल से बेहतर है?

  • 8 अप्रैल 2013
नरेंद्र मोदी
Image caption फिक्की के मंच से मोदी ने स्त्री सशक्तिकरण के मुद्दे पर भाषण दिया. (फाइल फोटो)

कई बार लगता है कि मोदी ज़मीन से आते हैं और राहुल पाठ्य पुस्तकों के सहारे बोलते हैं. राहुल कवि हैं तो मोदी मंच के कवि.

वे मंच का लाभ उठाना जानते हैं. फिक्की की महिला शाखा की सभा का पूरा फायदा मोदी ने उठाया, बल्कि पूरी बहस को स्त्रियों के सशक्तिकरण से जोड़कर वे एक कदम आगे चले गए हैं.

पिछले चुनाव के दौरान गुजरात से आने वाले बताते थे कि मोदी स्त्रियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. सोमवार की सभा में यह बात समझ में आई कि वे क्यों लोकप्रिय हैं.

चार दिन पहले राहुल गांधी का भाषण विचारों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण था. लेकिन राहुल इस सवाल को छोड़ गए कि यह सब हासिल कैसे होगा.

मोदी के भाषण में वे बातें थीं, जो हो चुकी हैं. जो किया है उसके सहारे यह बताना आसान होता है कि क्या सम्भव है.

नरेन्द्र मोदी के सोमवार के भाषण में राजनीतिक संदर्भ केवल दो जगह आए और उन्होंने संकेत में बात कह कर इसका फायदा उठाया.

एक जगह उन्होंने राज्यपाल के दफ्तर में अटके स्त्रियों को आरक्षण देने वाले विधेयक का जिक्र किया और दूसरी जगह दूसरों के खोदे गड्ढों को भरने की बात कही.

इसके अलावा जस्सू बेन के पीज्जा का जिक्र करते हुए उन्होंने कलावती का नाम लेकर राहुल पर चुटकी ली. बेशक गुजरात में मानव विकास को लेकर तमाम सवाल है, पर वे इस सभा में उठाए नहीं जा सकते थे.

मोदी को इस मंच पर घेरना सम्भव ही नहीं था. इस सभा में उपस्थित लोग उद्यमिता और कारोबार की भाषा समझते हैं. और गुजरात की ताकत उद्यमिता और कारोबार हैं.

अभिनय के मामले में राहुल बनाम मोदी

अभिनय में राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के मुकाबले हल्के बैठते हैं. नरेन्द्र मोदी के भाषण में नाटकीयता होती है. फिक्की की महिला शाखा के समारोह में नरेन्द्र मोदी ने मातृशक्ति के साथ अपनी बात को जिस तरह जोड़ा वह राहुल गांधी के भाषणों में नहीं मिलता.

नवम्बर में दिल्ली रामलीला मैदान में लगता था जैसे उन्हें तेज़ी से भाषण पूरा करके जाना है, वहीं गुजरात की चुनाव रैलियों में भी ऐसा कोई सुधार नहीं था. जनता को बाँधे रखने की कला उन्हें सीखनी होगी.

गुजरात में मोदी गुजराती में बोलते हैं पर शेष देश में वे हिन्दी में बोलते हैं. वे इन भाषाओं में सहज हैं और इनके मुहावरों को समझते हैं. जब उनसे गुजरात के पुरुषों के बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'मैं तो आपके गीत गा रहा हूँ'.

राहुल के लिए ज़रूरी है कि वे जनता के बीच जाएं और कहानियाँ सुनाने की पुरानी परम्परागत कला को समझें. सीआईआई की सभा में राहुल अंग्रेजी में बोले, जिसमें वे सहज हैं. उन्होंने मंच पर टहलते हुए भाषण दिया. जिसमें अभिनय की काफी गुंजाइश थी.

Image caption राहुल बनाम मोदी की बहस हाल के दिनों में तेजी से जोर पकड़ रही है.

फिक्की की सभा में मोदी पोडियम के सामने खड़े थे, जिसमें अभिनय की सम्भावना कम थी. फिर भी बीच-बीच में मज़ाक करते हुए उन्होंने उसे रोचक बना लिया.

दोनो नेताओं के मुद्दे

सीआईआई में राहुल गांधी ने जो भी बोला वह एक दार्शनिक दृष्टि थी. उन्होंने एक लंबी रणनीति की अपेक्षा जाहिर की है. राहुल ने कहा कि मेरे प्रधानमंत्री बनने का सवाल गैरवाजिब है.

भारत में एक ऐसा सिस्टम बन गया है जिसमें ये सोचा जाता है कि कोई घोड़े पर सवार आएगा, जिसके पास अकूत ताकत होगी और वो सारी समस्याओं का निदान कर देगा.

उनके विचार से कोई एक शख्स देश की परेशानियों का जवाब नहीं ढूंढ सकता. करोड़ों लोगों को मिलकर हल खोजना होगा.

राहुल ने व्यक्तिवादी-केंद्रीकरण की जगह विकेंद्रित-सत्ता की बात की. यानी मेरी ज़रूरत नहीं, सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत है.

उन्होंने यह भी कह दिया, "मनमोहन सिंह अकेले कुछ नहीं कर सकते मैं चाहता हूँ कि मैं अप्रासंगिक हो जाऊं".

राहुल की वह पहली प्रभावशाली प्रस्तुति थी. उनके पास बताने के लिए काफी कुछ था, पर बता नहीं पाए. बताया भी तो बदलाव का एक लंबा कार्यक्रम पेश किया.

मोदी ने ठीक इसके विपरीत अपने कृतित्व की जानकारी दी. प्रदेश की महिलाओं के सशक्तिकरण का परिचय दिया.

इसके लिए सम्पत्ति का पंजीकरण-शुल्क खत्म करने, स्कूलों में बच्चे के नाम के पहले माँ का नाम लिखने, जस्सू बेन के पीज्ज़ा, लिज्जत पापड़, काजू और फूलों की खेती करती महिलाओं से लेकर देश की पहली महिला फोटोग्राफर होमी वयारवाला तक का जिक्र करते हुए उन्होंने केवल फिक्की की महिलाओं को प्रभावित नहीं किया.

आपके चेहरे की रोशनी के लिए कितने गरीबों ने मेहनत की है इसे न भूलें, कहकर उन्होंने मंच जीत लिया.

इससे पहले नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में पी2जी2, स्किल,स्केल और स्पीड, माउस चार्मर का देश, फाइबर टू फैशन, गुजरात का नमक और आधा भरा गिलास जैसे नौजवानों के जुम्लों में समझाए थे.

राहुल गांधी के पास भी शिक्षा, सूचना और भोजन का अधिकार के मुद्दे हैं. और अब कैश ट्रांसफर का मसला है. उन्हें इसके लिए जनता को आकर्षित करने वाली शब्दावली खोजनी होगी.

छवियों का संघर्ष

Image caption राहुल लंबे समय से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के सवाल को खारिज करते रहे हैं.

नरेन्द्र मोदी कितना भी लोकप्रिय हो जाएं, पर उनकी हिंसक और कट्टर छवि खत्म होने वाली नहीं है.

राहुल गांधी के पास त्याग की परम्परा है. वे अपनी उस छवि का लाभ ले सकते हैं. जयपुर में अपनी माँ के रोने की बात वे अच्छे तरीके से कह पाते तो प्रभावशाली होते. सोनिया गांधी ने जिस प्रकार अपने पति के हत्यारों को माफ किया उसे वे व्यक्त करते तो जनता उन्हें भी पसंद करेगी.

सीआईआई की सभा में राहुल ने इस बात को व्यक्त करने की कोशिश की थी कि आर्थिक विकास किसी भी स्तर का हो, यदि उसमें सदाशयता नहीं है समाज के सभी वर्गों की भागीदारी नहीं है, तो वह व्यर्थ है.

मोदी के लिए अपनी मुसलमान विरोधी छवि को दुरुस्त कर पाना काफी मुश्किल है, पर उन्होंने पूरी बहस को स्त्री-केन्द्रित करके इसे घुमा दिया है.

विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने हाल में नरेन्द्र मोदी की तुलना लोकप्रियता के मामले में जवाहर लाल नेहरू से की है.

उनका कहना था कि पहले आम चुनाव में जनता की माँग थी कि नेहरू को प्रधानमंत्री बनाओ.

विडंबना है कि जिस खानदान के नाम पर राहुल गांधी की राजनीति की आलोचना की जाती है, उसके श्रेय से भी उन्हें वंचित करके नरेन्द्र मोदी को जोड़ दिया गया.

बहरहाल अब जब लगता है कि चुनाव में दोनो के बीच सीधा मुकाबला हो या न हो मोदी और राहुल की बहस अभी कई रंग लेगी.

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