पुणे के 'कातिल' ड्राइवर को सज़ा-ए-मौत

Image caption संतोष माने ने अंधाधुंध ड्राइविंग कर नौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया.

पिछले साल जनवरी में पुणे में अंधाधुंध तरीके से बस चला कर नौ लोगों को मौत के घाट उतारने वाले ड्राइवर को स्थानीय अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई है.

पिछले हफ्ते पुणे की अदालत ने संतोष माने नाम के इस ड्राइवर को दोषी करार दिया था और कहा था कि उन्हें किसी भी प्रकार की मानसिक तकलीफ नहीं है.

उन्हें भारतीय दंड संहिता के दफा 302 के तहत दोषी करार दिया गया और सोमवार को उन्हें सज़ा सुनाई गई.

25 जनवरी, 2012 की सुबह संतोष माने ने पुणे के स्वारगेट बस डिपो में खड़ी एक खाली बस को चुराया और तेज़ गति से उसे चलाते हुए रास्ते में कई गाड़ियों और लोगों को कुचल दिया.

हादसे में नौ लोगों की मौत हुई थी और करीब 30 लोग घायल भी हुए थे.

परिजनों का दर्द

मृतकों में मिलिंद गाइकवाड भी थे जिनकी पत्नी नंदिनी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “मैं ये नहीं कह सकती कि मैं खुश हूं क्योंकि मेरा सब कुछ लुट गया. लेकिन मैं अदालत के फैसले से खुश हूं. मैं चाहती हूं इस पर जल्द से जल्द अमल किया जाए.”

उन्होंने बताया कि उनके पति मिलिंद की मौत से पहले उनकी बातचीत भी हुई थी.

वो भयावह हादसा याद करते हुए उन्होंने कहा, “मैंने एफएम रेडियो पर जब ये खबर सुनी तो मैंने अपने पति को फोन किया. मेरे पति ने कहा कि घबराओ मत, मैंने एक रिक्शा ले लिया है और मैं उस बस के रास्ते पर नहीं हूं. इसके फौरन बाद बस रिक्शे से जा टकराई और उनकी मौके पर ही मौत हो गई.”

पुलिस ने उन्हें गोलियाँ चलाकर रोकने की कोशिश भी की, लेकिन वो नहीं रुका. आखिरकार मोटरसाइकल पर सवार एक शख्स ने एक हवलदार के साथ मिल कर बस पर छलांग लगाई और उसे धर दबोचा.

अदालत ने सज़ा सुनाते हुए कहा कि संतोष माने नौ मासूम लोगों की हत्या का ज़िम्मेदार है, जिस पर पर्दा डालने के लिए उस ने अदालत को खुद को मानसिक रूप से बीमार कह कर गुमराह करने की कोशिश की.

सरकारी वकील उज्ज्वला पवार ने बीबीसी को बताया कि वे इस फैसले से खुश हैं.

उन्होंने कहा, “संतोष माने ने झूठी गवाही का सहारा लिया, जिसका खामियाज़ा उसे भुगतना पड़ा. माने ने घोर अपराध किया, जिसकी सज़ा फांसी ही होनी चाहिए.”

संतोष माने अदालत में मौजूद था लेकिन उसने इस फैसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई.

माने के पास फिलहाल महाराष्ट्र हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती देने का मौक़ा है. अगर वे हाई कोर्ट का दरवाज़ा नहीं खटखटाते, तब भी इस फैसले की पुष्टि हाई कोर्ट से ही की जाएगी.

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