छोटी कारें पीछे, लंबी गाड़ियों ने पकड़ी स्पीड

मारूति
Image caption मारूति की आल्टो भारत में सबसे अधिक बिकने वाली कार रही है.

कार निर्माताओं के संघ, सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमाबाइल मैनुफ़ैक्चर्सस, के आंकड़ो के मुताबिक़ पिछले साल कार की बिक्री में बारह सालों में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है.

आंकड़ो के अनुसार मार्च में ख़त्म हुए वित्तीय वर्ष में भारत में कार की बिक्री में 6.7 फ़ीसद की गिरावट आई. साल 2001 में कारों की बिक्री 7.7 फ़ीसद कम हो गई थी.

संघ के मुताबिक़ पिछले साल छोटी कारों की बिक्री में कमी आई लेकिन साथ ही साथ दिए गए आंकड़ो से ये भी बात सामने आती है कि एसयूवी यानी स्पोर्टस यूटिलिटी व्हेकिल या उस जैसी कारों की बिक्री 50 प्रतिशत से अधिक रही.

पिछले कुछ सालों में बिक्री में सालाना 30 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की जाती रही थी.

आर्थिक स्थित की तस्वीर

आर्थिक मामलों के जानकार राजेश रपाड़िया बिक्री में कमी के लिए पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतों, मंहगाई और लोगों में रोज़गार को लेकर बढ़ रही अनिश्चितता को जिम्मेदार मानते हैं.

राजेश रापड़िया कहते हैं, "साल 2008 के बाद से खाने-पीने की वस्तुएं बहुत मंहगी हुई हैं, और आम भारतीय का माह का 30 से 40 फीसद इसी मद पर व्यय होता है. साथ ही बच्चों की शिक्षा भी बहुत मंहगी हो रही है, जिसका नतीजा ये हो रहा है कि लोगों के पास वो धन नहीं बच पा रहा है जिसे वो कार या ज़रूरत की दूसरी मंहगी चीज़े ख़रीदने या दूसरी शौक की वस्तुओं पर खर्च कर सकें."

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में ह्यूनडई के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राकेश श्रीवास्तव के हवाले से कहा गया है कि अगर सरकार की तरफ से वित्तीय प्रोत्साहन नहीं मिलता है, और अर्थव्यवस्था को लेकर हालात बेहतर नहीं होते हैं, तो बिक्री पर दबाव बना रहेगा, जबतक की पूरी अर्थव्यवस्था में बेहतरी नहीं हो जाए.

इस सवाल पर कि क्या कार की बिक्री को अर्थव्यवस्था के बैरोमीटर के तौर देखा जा सकता है, राजेश रापड़िया कहते हैं कि हां इसे मुल्क की कमज़ोर अर्थव्यवस्था के पैमाने के तौर पर देखा जा सकता है, क्योंकि कार की कम बिक्री का मतलब ये भी हुआ कि स्टील की बिक्री भी कहीं न कहीं प्रभावित हो रही होगी.

Image caption एसयूवी की मांग भारत में बढ़ रही है और इसकी बिक्री पिछले साल 50 फीसद ऊपर रही.

वो कहते हैं पिछले सालों में कोर इंडस्ट्री या आधारभूत ढांचों के निर्माण से जुड़े सारे क्षेत्रों में कमज़ोरी साफ देखने में आ रही है.

मतलब

लेकिन जहां छोटे कारों की बिक्री कम हो रही है वहीं बड़ी कारें एक वर्ग अधिक ख़रीद रहा है इसका क्या अर्थ है?

राजेश रापड़िया मानते हैं कि इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए कि मुल्क में एक वर्ग के पास दौलत में तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है, तो दूसरे वर्ग के लिए चीज़े मुश्किल होती जा रही है.

यानी अब मध्यम वर्ग के लिए भी हालात पहले की तुलना में मुश्किल भरे हैं.

राजेश रापड़िया का कहना है कि एक वर्ग जिसके पास ब्लैक मनी यानी काली कमाई के पैसे हैं, जिसमें नेता से लेकर अफसरशाही तक शामिल हैं, की कमाई में इजा़फ़ा हो रहा है, और वो मंहगी वस्तुओं की बढ़ी बिक्री में ज़ाहिर हो रहा है.

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