पश्चिम बंगाल में सत्ता बदली है, संस्कृति नहीं

  • 11 अप्रैल 2013
ममता बनर्जी
ममता बनर्जी से पश्चिम बंगाल के लोगों को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन वो अभी तक इस पर खरी नहीं उतरी हैं

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में सीपीएम की ही राजनीतिक संस्कृति को आगे बढ़ा रही है. सीपीएम ने डर और भय का साम्राज्य कायम करके 30 सालों तक राज किया था और ममता उसी तरह राज्य में शासन चला रही हैं.

सीपीएम के पास संगठित कैडर था जबकि तृणमूल के पास उतना संगठित कैडर नहीं है. पार्टी समर्थकों खासकर युवाओं का इस्तेमाल विपक्ष को डराने धमकाने के लिए किया जा रहा है.

कई लोगों का मानना है कि ममता की सत्ता में आने की प्रमुख वजह ये थी कि उन्होंने वामपंथियों की तरकीब का उनसे बेहतर इस्तेमाल किया और अब सत्ता में बने रहने के लिए भी उसी नुस्खे का इस्तेमाल कर रही हैं.

ममता विपक्ष को मैनेज करने के लिए राजनीतिक हिंसा का सहारा ले रही हैं. उनकी सरकार के पास सहिष्णुता नाम की कोई चीज नहीं है. यानी सरकार के ख़िलाफ़ बोलने वालों से सख्ती से पेश आया जा रहा है.

टकराव

तृणमूल के राज में सरकार के लिए वही हो रहा है जो ममता चाहती है. दूसरे लोगों की राय के लिए कोई जगह नहीं है. यहां तक कि संवैधानिक संस्थाओं से भी सरकार का टकराव हो रहा है.

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संस्कृति बिगड़ गई है. राज्य में लोकतांत्रिक सोच विचार के लिए कोई जगह नहीं है. यानी हम जो चाहेंगे वही करेंगे. सीपीएम के ज़माने में भी यही होता था और इस सरकार का भी कमोबेश वही रवैया है.

दिल्ली में ममता बनर्जी पर एसएफआई कार्यकर्ताओं ने हमले को तृणमूल जमकर भुनाना चाहती है ताकि पंचायत चुनावों में उसका फायदा ले सके. इस घटना के विरोध में तृणमूल कार्यकर्ताओं ने पश्चिम बंगाल में सीपीएम के दफ्तरों पर हमले किए.

पश्चिम बंगाल में जब तक कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं हो जाता है तब तक हिंसा और बदले का ये चक्र चलता रहेगा.

छवि

ममता सीपीएम की ही राजनीतिक संस्कृति को आगे बढ़ा रही हैं

ममता के अपनी इस नीति का तात्कालिक लाभ मिल सकता है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम उनके लिए अच्छे नहीं होंगे. ऐसी घटनाओं से मुख्यमंत्री की छवि खराब होगी.

ममता जब सत्ता में आई थीं तो उन्होंने परिवर्तन का वादा किया था लेकिन बदलाव का मतलब ये नहीं है कि राइटर्स बिल्डिंग में कौन बैठता है. परिवर्तन का मतलब ये है कि पिछले 30 साल में जिस तरह इस राज्य को चलाया जा रहा है उसमें बदलाव हो.

अगर ऐसा नहीं हुआ तो लोगों में रोष बढ़ेगा और इसका नुकसान ममता को होगा. सीपीएम को भी इसी बात का नुकसान हुआ था.

ममता का रवैया नहीं बदला तो उनका भी सीपीएम जैसा हश्र होगा. ममता के मामले में लोगों के पास शायद उतना धैर्य नहीं होगा जितना सीपीएम के लिए था.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

संबंधित समाचार