'84 दंगे: 'आगे भी मौत थी, पीछे भी मौत'

मोहन सिंह
Image caption मोहन सिंह दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में रहते थे जहाँ सिखों के खिलाफ़ सबसे ज्यादा हिंसा हुई

राहुल बेदी और आलोक तोमर जैसे वरिष्ठ पत्रकारों की बदौलत दुनिया ने जाना कि 1984 में दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में कैसे दंगाइयों ने सिखों का कत्लेआम किया. लेकिन ये संभव हुआ मोहन सिंह नाम के एक व्यक्ति के कारण. इंदिरा गांधी की हत्या के अगले दिन 1 नवंबर की उस भयावह रात दंगाइयों से बचते-बचाते एक साइकिल पर सवार होकर उन्होंने त्रिलोकपुरी से इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर तक का डरावना सफर तय किया और पत्रकारों को सिखों की हत्या के बारे में बताया. ये उनकी कहानी है.

हम राजस्थान में अलवर के रहने वाले हैं. शुरुआत में हम शाहदरा में कस्तूरबा नगर में रहते थे. वर्ष 1976 में हम त्रिलोकपुरी आए.

आपातकाल के दौरान मकानों की तोड़फोड़ हो रही थी और कस्तूरबा नगर के हमारे मकान को भी तोड़ दिया गया. घर तोड़ने के बाद हमें त्रिलोकपुरी में 25-25 गज़ का प्लॉट देकर पुनर्वास कॉलोनी में बसाया गया था.

तीन बेटों सहित हमारा पूरा परिवार वहीं त्रिलोकपुरी में रहता था. मैं ऑटोरिक्शा चलाता था.

वो 31 अक्टूबर 1984 की शाम थी. मैंने रेडियो और टीवी पर इंदिरा गाँधी की मौत की ख़बर सुनी. शुरुआत में हमें पता ही नहीं चला कि ये सब कैसे हुआ.

उसके बाद हमने सरदारों के खिलाफ़ हिंसा की बात सुनी. शुरुआत में सबसे ज्यादा हिंसा सफ़दरजंग अस्पताल के पास हो रही थी. मैं उसी इलाके में ऑटोरिक्शा चला रहा था.

हमने देखा कि सिख ड्राइवरों की गाड़ियों पर हमले हो रहे थे. कई लोगों ने हमें घर वापस जाने की सलाह दी. मैं घर चला आया. उस रात कुछ नहीं हुआ.

दूसरे दिन 1 नवंबर को सुबह से ही दंगे भड़क उठे. घर के नज़दीक शकरपुर नाम का इलाका था. मैने सुबह देखा कि वहाँ आग लगी हुई थी और हर जगह से धुँआ उठ रहा था.

हम त्रिलोकपुरी के 32 नंबर ब्लॉक में रहते थे. ब्लॉक नंबर 36 में एक गुरुद्वारा था. दंगाइयों ने सबसे पहले इस गुरुद्वारे को जलाया.

फिर वो दंगाई पास के इलाकों में फैल गए. उन्होंने चारों ओर तोड़-फोड़ शुरू कर दी. हमारे पास सुरक्षा का कोई इंतज़ाम नहीं था. डर के मारे लोग घर में छिपे बैठे हुए थे. दिन में पुलिस ने हमें सुरक्षा का भरोसा दिलाया था और कहा था कि वो कोई दंगा नहीं होने देंगे.

कत्लेआम

शाम छह, सात बजे कत्लेआम शुरू हुआ. चारों ओर अंधेरा था. इलाके का बिजली, पानी काट दिया गया था. इलाके में करीब 200 लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी. वो लोगों को घर से निकालते, उन्हें मारते, फिर उन पर तेल छिड़ककर आग लगा देते.

त्रिलोकपुरी की तंग गलियों के कारण लोग चाहकर भी भाग नहीं सकते थे. तलवारों से लैंस दंगाइयों की भीड़ ने इलाके को घेर रखा था.

रात करीब साढ़ नौ बजे मैंने अपने बाल काटे और फिर मैं किसी तरह बचते-बचाते कल्याणपुरी थाने आ गया. थाने में मैने पुलिसवालों को बताया कि हमारे ब्लॉक 32 में बहुत सारे लोग मारे गए हैं और वहाँ लूटपाट जारी है. मैंने उनसे मदद की गुहार लगाई. लेकिन मदद करने के बजाय उन्होंने मुझे भगा दिया.

उन्होंने मुझसे कहा कि तुम भी एक सरदार हो. दरअसल, मेरे बाल ठीक से नहीं कटे थे.

फिर मैने अपने एक रिश्तेदार से साइकिल ली और मैं आईटीओ (आयकर विगाग दफ्तर) चौराहे की ओर निकल गया.

रास्ते में मैने देखा कि सरदारों पर हमले हो रहे हैं. शकरपुर में एक और गुरुद्वारा जला हुआ था. मैं डरा हुआ था. आगे भी मौत थी, पीछे भी मौत, लेकिन ऐसे हालात में आदमी कुछ नहीं कर सकता.

अगर मैं त्रिलोकपुरी में रुकता तो वहाँ भी मौत का खतरा था. मेरे दो छोटे भाई केवल और मेवल सिंह दंगे में मारे जा चुके थे.

कोई मदद नहीं

Image caption दंगों में मोहन सिंह के दो भाई मारे गए थे

आईटीओ चौराहे पर रास्ते में दिल्ली पुलिस का हेडक्वार्टर पड़ता है. मैं वहाँ पहुँचा. मैंने पुलिसवारों को इलाके के हालात के बारे में बताया और किसी अफसर से मिलने की इजाज़त मांगी. लेकिन मुझे किसी से भी मिलने नहीं दिया.

मैंने सोचा कि अगर मैं वापस गया तो वहाँ भी दंगाइयों के हाथों मारे जाने का डर था.

पास ही अखबार इंडियन एक्सप्रेस का दफ्तर था. वहाँ काम करने वाले पत्रकार राहुल बेदी और आलोक तोमर मेरे जानकार थे. वहाँ मैंने उन्हें अपनी सारी कहानी बताई और मदद मांगी.

उस वक्त रात के करीब साढ़े 11 बज चुके थे. राहुल बेदी ने एक डीआईजी जाटव साहब को फोन किया. उन्होंने जाटव साहब से कहा कि एक तरफ पुलिस दावा कर रही है कि दिल्ली में दंगे नहीं हो रहे हैं और दूसरी ओर उनके दफ्तर में आया एक व्यक्ति सैकड़ों आदमियों के मारे जाने की बात कर रहा है.

फिर वो गाड़ी लेकर इलाके की ओर चल दिए लेकिन रास्ते में उनकी गाड़ी को भी जला दिया गया.

उन्होंने मुझे वापस त्रिलोकपुरी नहीं जाने दिया था. उन्होंने कहा कि वापस मत जाओ क्योंकि वापस जाने पर मेरे पहचान लिए जाने का डर था. उन्होंने हमारी काफी मदद की.

मैंने अगले दो-तीन दिन दफ़्तर में ही गुज़ारे. परिवार के बारे में मुझे कोई पता नहीं था. मैं कई गुरुद्वारों में परिवार को ढूंढता रहा. फिर फर्शबाज़ार में लगे एक कैंप के बारे में पता चला जहाँ मेरा परिवार था.

आलोक तोमर और इंडियन एक्सप्रेस का दूसरा स्टाफ मुझे फर्श बाज़ार के कैंप तक छोड़ कर आया. कैंप में न तो किसी के पास पहनने के लिए कपड़ा था, न खाने के लिए रोटी. लोग पार्कों में किसी तरह पड़े हुए थे.

मैंने भागदौड़ करके लोगों को बिस्तर दिलवाया. करीब 15-20 दिन बाद घर की हालत देखने हम वापस त्रिलोकपुरी गए. वहाँ सारे घर जले हुए थे.

करीब डेढ़ साल कैंप में रहने के बाद हम 1985 में तिलक विहार (पश्चिमी दिल्ली) आ गए.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

संबंधित समाचार