भुल्लर को फाँसी से राहत नही

Image caption बम धमाके में मनिंदर सिंह बिट्टा को निशाना बनाया गया था

सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के दिल्ली बम ब्लास्ट के दोषी देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की दया याचिका खारिज कर दी है.

देवेंदर पाल सिंह भुल्लर को 10 सितंबर 1993 के दिन दिल्ली में हुए एक विस्फोट के लिए टाडा अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी.

इस बम हमले में तत्कालीन युवा कांग्रेस अध्यक्ष मनिंदरजीत सिंह बिट्टा को निशाना बनाया गया था.

उनके काफ़िले पर हुए हमले में बिट्टा तो गंभीर चोटों के साथ बच गए थे मगर उनके नौ सुरक्षाकर्मी मारे गए थे और 25 अन्य घायल हुए थे.

भुल्लर को इस जुर्म के लिए मौत की सज़ा सुनाई गई, और जांच के दौरान पाया गया कि वे खालिस्तान लिब्रेशन फोर्स के कट्टर समर्थक थे.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उनकी दया याचिका के फैसले पर हुई देरी को इस फैसले का आधार नहीं बनाया जा सकता कि उनकी सज़ा आजीवन कारावास में बदल दी जाए.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए मनिंदरजीत सिंह बिट्टा ने कहा कि उन्हें ये उम्मीद नहीं थी कि कोर्ट उनकी फांसी की सज़ा को बरकरार रखेगी.

नाकाम कोशिशें

फैसले का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा, "मुझे बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि सुप्रीम कोर्ट से ये फैसला आएगा. जिस तरीके से शीला दीक्षित ने भुल्लर को मानसिक रूप से अस्थिर बताया और खुल कर उसकी मदद की. जिस भुल्लर की फाईल को विभिन्न मंत्रालय 15 सालों तक घुमाते रहे, मुझे उम्मीद नहीं थी कि भुल्लर को फांसी मिलेगी."

उधर कांग्रेस ने कहा है कि पार्टी कोर्ट के इस फैसले की इज़्ज़त करेगी.

दिल्ली में बम धमाके के बाद भुल्लर जर्मनी चले गए और वहां की सरकार से राजनीतिक शरण मांगी, लेकिन जर्मनी की सरकार ने उनकी अपील ठुकरा दी जिसके बाद उन्हें भारत प्रत्यार्पित कर दिया गया.

भुल्लर ने मौत की सज़ा को आजीवन कारावास में बदलवाने की कई कोशिशें की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.

2002 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा के खिलाफ दायर की गई उनकी याचिका खारिज कर दी थी.

इसके बाद उन्होंने एक पुनरीक्षण याचिका डाली जिसे एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने मानने से इंकार कर दिया.

साल 2003 में उन्होंने राष्ट्रपति के समक्ष क्षमा याचिका रखी थी, जिसे राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने 2012 में खारिज कर दिया.

फैसले से नाराज़ भुल्लर की पत्नी नवनीत कौर ने टेलिविज़न चैनल एनडीटीवी को दिए इंटर्व्यू में कहा कि उनके पति को इस मामले में फंसाया गया और वे चाहती हैं कि कोर्ट उनके पति के साथ-साथ उन्हें भी फांसी पर चढ़ा दे.

कहा जा रहा है इस फैसले का असर उन दोषियों पर भी पड़ेगा जिन्हें फांसी की सज़ा दी गई है और उन्होंने क्षमा याचिका दायर की है.

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