क्यों करता है कोई बर्बर तरीक़े से बलात्कार?

  • 22 अप्रैल 2013
Image caption हिंसक बलात्कार करनेवाले लोग एक तरह के मनोरोगी होते हैं.

घटना - 1. अप्रैल 2013 में पूर्वी दिल्ली के गांधीनगर इलाके एक पांच साल की बच्ची के साथ बार-बार बलात्कार करने वाले ने उसके गुप्तांग में बोतल और मोमबत्ती डाल दी. बच्ची का गंभीर हालत में दिल्ली के एम्स अस्पताल में इलाज चल रहा है.

घटना - 2. 16 दिसंबर 2012 को 23 साल की एक छात्रा का दिल्ली के मुनीरका इलाके में चलती बस में सामूहिक बलात्कार किया गया और उनके पेट, आंत और गुप्तांगों में इस बर्बरता से लोहे की छड़ से प्रहार किया गया कि आखिरकार इन चोटों की वजह से सिंगापुर के एक अस्पताल में उनकी मौत हो गई.

घटना - 3. साल 2011 में छत्तीसगढ़ की संदिग्ध माओवादी सोनी सोरी नाम की एक आदिवासी महिला का कथित रूप से पुलिस हिरासत में बलात्कार किया गया और उनके जननांगों में पत्थर डाल दिए गए.

ये तीनों ही घटनाएं अपराधी की बर्बर मन:स्थिति की हालिया मिसालें हैं. बलात्कार अपनेआप में एक अमानवीय कृत्य है. लेकिन किसी महिला या बच्ची के साथ बलात्कार के बाद उसके अंगों पर प्रहार करना, उसे यातना देना, उसे शारीरिक नुकसान पहुंचाना आखिर कैसी पाशविक मन:स्थिति का काम हो सकता है. ऐसा कृत्य करनेवाला व्यक्ति आखिर कौन होता है, किन परिस्थितियों में कोई व्यक्ति ऐसा बर्बर कृत्य करने का प्रयास करता है?

मनोचिकित्सक संदीप वोहरा कहते हैं, “ये लोग आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं और इनके भीतर वहशीपन होता है. ऐसे लोग बलात्कार के वक्त अगर मदिरा का सेवन करते हैं तो उनके भीतर बर्बरता की प्रवृत्ति और बढ़ जाती है. ऐसे लोगों के अतीत को यदि खंगाला जाए तो बलात्कार और हत्या जैसे मामलों में इनकी लिप्तता पहले भी पाई जा सकती है. ये सामान्य मन:स्थिति वाले लोग नहीं होते."

परपीड़क सुख

दिल्ली में मैक्स अस्पताल के मनोचिकित्सक समीर मल्होत्रा इसे और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि बलात्कार के बाद अपने शिकार को शारीरिक नुकसान पहुंचाना दरअसल उन्हें एक सैडिस्टिक प्लेज़र यानी परपीड़क सुख देता है.

वो इसका कारण बताते हुए कहते हैं, “ऐसी मानसिक दशा के अपराधियों में बचपन से लेकर बड़े होने तक मिलनेवाले संस्कार, लालन-पालन, एक्सपोज़र की अहम भूमिका होती है, कई बार ये खुद यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं. इन वजहों से ऐसी मानसिक स्थिति तैयार होती है जिसमें दूसरे के जिस्म को इस्तेमाल करने और भोगने की प्रवृत्ति पैदा होती है.”

डॉक्टर समीर बताते हैं कि ऐसी मानसिक बनावट वाले अपराधी दूसरों के शरीर को इस्तेमाल कर फेंकने की प्रवृत्ति विकसित कर लेते हैं, उनके ज़हन में अपने शिकार के लिए दर्द या पीड़ा का ख्याल नहीं आता.

बच्चे क्यों निशाना?

Image caption बच्चों को बलात्कार के समय यातना देने के पीछे अपराधी की यातना देने और डराने की मनोवृत्ति काम करती है.

इस तरह के पाशविक अपराध करनेवाले व्यक्ति क्या किसी निश्चित आयुवर्ग के होते हैं या फिर उम्र से ऐसी मनोवृत्ति का कोई संबंध नहीं होता. इसके बारे में डॉक्टर संदीप वोहरा कहते हैं कि आमतौर पर 25 से 35 साल से कम की आयु के आपराधिक मनोवृत्ति वाले लोगों में ऐसी विकृत मनोभावना पाई जा सकती है.

वो बताते हैं, “इस आयुवर्ग में दिमाग के भीतर बहुत ऊर्जा होती है और शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा प्रबल होती है. इस उम्र के अपराधी अंदर से कुंठित होते हैं और खुद को समाज में समायोजित नहीं कर पाते. इन लोगों को जैसे ही कोई आसान लक्ष्य दिखाई देता है वो उसे अपना निशाना बना लेते हैं और उसे नुकसान पहुंचाते हैं. ये एक पाशविक मनोवृत्ति होती है.”

कई बार ऐसा देखा गया है कि छोटे बच्चों के साथ बलात्कार किया जाता है. ऐसी खबरें अक्सर देखने-पढ़ने-सुनने में मिल जाती हैं. छोटे-छोटे बच्चों को अपनी पाशविक वृत्ति का निशाना आखिर कैसी मन:दशा का प्रमाण हो सकता है.

डॉक्टर समीर कहते हैं, “ये लोग बच्चों को इसलिए निशाना बनाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वो शिकायत नहीं करेंगे या जिन्हें डराया-धमकाया जा सकता है. दूसरी बात ये कि कई बार ऐसे लोग सेक्सुअली खुद को कमज़ोर पाते हैं और बच्चों को निशाना बना कर अपना टेस्ट करना चाहते हैं कि वो सेक्स कर सकते हैं या नहीं. ऐसे लोग पीडोफ़ाइल या बालप्रेमी भी होते हैं जिन्हें बच्चों के साथ शारीरिक संबंध बनाकर संतोष मिलता है.”

पोर्नोग्राफी

मनोविश्लेषक कहते हैं कि जो बाल यौन उत्पीड़क होते हैं वो पॉर्नोग्राफी से बहुत प्रेरित होते हैं. ऐसी सामग्री आज इंटरनेट और बाज़ारों में सहज सुलभ है जिसे देखकर ऐसी कुप्रवृत्ति रखनेवाले लोग उसे हासिल करने की ओर अग्रसर होते हैं.

डॉक्टर संदीप वोहरा कहते हैं, “ऐसी मनोवृत्ति वाले लोग पॉर्नोग्राफ़ी देखकर उत्तेजित होते हैं और जब मौका मिलता है तो बच्चों को निशाना बनाते हैं.”

आजकल की फिल्मों में जिस तरह का खुलापन पाया जाता है, जिस तरह के नारी देह दर्शाने वाले आइटम गीत बनाते जाते हैं उसे भी मनोचिकित्सक ऐसे अपराधों को बढ़ाने में मददगार मानते हैं क्योंकि इससे सेक्स अपराधियों में उसे पाने की इच्छा प्रबल हो जाती है.

Image caption मनोचिकित्सक मानते हैं कि पोर्न सामग्री देखकर विकृत मानसिकता के लोग यौन अपराध के लिए प्रवृत होते हैं.

लेकिन इन सामग्रियों को आज के दौर में नियंत्रित नहीं किया जा सकता. पॉर्नोग्राफ़ी सर्वसुलभ है और फिल्में हर आयु वर्ग के लोग आसानी से देख लेते हैं. तो फिर ऐसी सामाजिक बुराइयों से और ऐसे पाशविक कुप्रवृत्ति वाले लोगों से समाज को बचाया कैसे जा सकता है?

बालमन की रक्षा

डॉक्टर समीर मल्होत्रा कहते हैं,”हर बच्चे का अधिकार होता है कि उसे स्वस्थ बचपन मिले. ऐसी मनोवृत्ति रखनेवाले लोगों का बचपन आम लोगों के बचपन के अनुभवों से भिन्न होता है. इसलिए ज़रूरी है कि व्यक्ति के स्तर पर, परिवार के स्तर पर और समाज के स्तर पर एक सामूहिक प्रयास हो ताकि हर बच्चे का बचपन खुशगवार हो सके, उसके भीतर कोई कुंठा पैदा न हो.”

इसके साथ ही जुड़ा एक और पहलू है कि अगर कोई बच्चा दिल्ली की पांच साल की बलात्कार पीड़ित बच्ची की तरह बर्बर उत्पीड़न का शिकार हुआ हो तो उसका भावी जीवन इस घटना से प्रभावित न हो. जिस तरह का यौन उत्पीड़न इस बच्ची के साथ हुआ है उसकी यादें यदि बच्चे के ज़हन में रह जाती हैं तो बड़े होने पर वो स्वस्थ जीवन व्यतीत नहीं कर पाएगा.

इसे स्पष्ट करते हुए डॉक्टर समीर मल्होत्रा कहते हैं, “ये परिवार और समाज की सम्मिलित जिम्मेदारी बनती है कि ऐसी पीड़ित बच्ची को ऐसी हिंसक वारदात की याद न दिलाई जाए. बच्चा बड़ों पर विश्वास करता है. अगर बड़े उसे एक सकारात्मक माहौल दे सकें, उसे ऐसी हॉबी में डाल सकें जिससे उसे अपने जीवन की दर्दनाक घटना को भुलाने में मदद मिल सके तो वो एक सामान्य ज़िंदगी जी सकता है.”

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