बॉलीवुड मसाला फिल्म जैसा सुदीप्तो सेन का सफ़र

सुदीप्तो
Image caption सुदीप्तो की बहन के अनुसार वे अपनी मां की मौत पर भी घर नहीं आए.

सैकड़ों फर्ज़ी कंपनियों के ज़रिए लाखों लोगों से कथित तौर पर हज़ारों करोड़ की रकम उगाहने वाले पश्चिम बंगाल के शारदा समूह के मालिक सुदीप्तो सेन की कहानी बालीवुड की किसी मसाला फिल्म को भी मात देती है.

कोई 13-14 साल पहले शारदा गार्डेन नामक एक कंपनी में मैनेजर के तौर पर काम करते थे सुदीप्तो सेन.

उस कंपनी के मालिक विश्वनाथ अधिकारी की दिनदहाड़े हुई हत्या के बाद पूरे कारोबार पर ज़िम्मा उन्होनें अपने सिर ले लिया.

राजनेता-पुलिस और कथित ‘गुंडा’ कनेक्शन के ज़रिए वही शारदा गार्डेन धीरे-धीरे हज़रों करोड़ के कारोबार वाले शारदा समूह में बदल गया.

असल नाम

दरअसल सुदीप्तो सेन नामक इन शख्स का नाम शंकरादित्य सेन था.

आम बोलचाल में लोग उनको शंकर कहते थे.

शंकर के पड़ोसी रहे श्यामल कर्मकार कहते हैं, “सुदीप्तो दरअसल शंकरादित्य ही है.”

अस्सी के दशक में कथित तौर पर राजनेताओं-पुलिस अधिकारियों और असामाजिक तत्वों की सहायता से शंकर ने धीरे-धीरे अपने कारोबार का विस्तार शुरू किया.

उनका मुख्य काम था ज़मीन की खरीद-फरोख्त.

परिवार से किनारा

धीरे-धीरे शंकर ने अपने भाइयों से भी संबंध तोड़ लिया और पैतृक घर से अलग रहने लगे.

शंकर की बहन शुक्ला कहती हैं, “बीते 25 वर्षों में मेरी और बाकी दो भाइयों की शंकर से महज दो बार मुलाकात हुई है. पहली बार 2001 में पिता की मौत के समय और दूसरी बार पांच साल बाद जब उन्होनें अपने पृतक मकान का हिस्सा किसी और को बेचा था.”

Image caption सुदीप्तो के शारदा ग्रुप कंपनियों के कर्मचारियों में असंतोष फैल चुका है.

महानगर में रहने वाले शंकर के छोटे भाई व्रिकमादित्य भी उनसे खफ़ा हैं.

उन्होनें बताया, “शंकर बाद में हमारे लिए पूरी तरह अजनबी हो गया था. नब्बे के दशक के आखिरी दिनों में अपना नाम शंकर से बदल कर सुदीप्तो रख लिया था. वह मां के मरने पर भी नहीं आया था.”

नया पासपोर्ट

नाम बदलने के बाद उनके नए नाम से ही वर्ष 2004 में पासपोर्ट भी जारी हुआ था.

दिलचस्प बात यह है कि उस पासपोर्ट पर शंकर के पैतृक आवास का ही पता दर्ज है.

जबकि उन्होनें वह मकान कोई दस साल पहले ही छोड़ दिया था.

इससे इस बात की पुष्टि होती है कि पुलिस अधिकारियों के साथ उनकी कितनी गहरी छनती थी.

नब्बे के दशक के आखिर में उसने शारदा गार्डेन नामक फर्म में मैनेजर का काम शुरू किया.

लेकिन मालिक विश्वनाथ अधिकारी की रहस्यमय हत्या के बाद वह फर्म में सर्वेसर्वा बन गए.

उस हत्या के मामले में सुदीप्तो की ओर ही कथित तौर पर अंगुली उठी थी.

मालिकाना हक

लेकिन जानकारों के अनुसार अपने राजनीतिक और पुलिस संपर्कों के बल पर वह साफ बच निकले.

अब वह मामला ठंडे बस्ते में है.

उस फर्म का मालिकाना हक हाथ में आते ही सुदीप्तो ने अपनी गतिविधियां बढ़ा दीं.

उन्होनें इलाके के तमाम असामाजिक तत्वों को लेकर एक टीम बनाई थी.

इस टीम का कथित तौर पर काम था किसानों को डरा-धमका कर पानी के मोल उनकी जमीन को खरीदना.

इसी तरकीब के जरिए वर्ष 2002 तक सुदीप्तो ने कोलकाता से सटे दक्षिण 24-परगना जिले के विष्णुपुर में एक हजार बीघे जमीन खरीद ली थी.

Image caption पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सुदीप्तो की गिरफ्तारी का दबाव बढ़ गया था.

उस जमीन पर ही सुदीप्तो ने फ्लैट बना कर बेचना शुरू किया. लेकिन ज़मीन के कागजात नहीं होने की वजह से खरीददारों को फ्लैट के कागजात नहीं सौंपे गए.

ऊपर से तुर्रा यह कि सुदीप्तो की अनुमति के बिना कोई भी खरीददार किसी दूसरे को अपना फ्लैट नहीं बेच सकता था.

नतीजतन कई लोग मजबूरन कौड़ियों के भाव अपना फ्लैट शारदा गार्डेन के हाथों ही बेच कर वहां से चले गए.

रियलिटी कंपनी

इस कारोबार से हुए मुनाफे के बाद ही उन्होनें वर्ष 2006 में शारदा रियलिटी इंडिया नामक नई कंपनी बनाई.

शारदा गार्डेन में रहने वाले एक फ्लैट मालिक कहते हैं, “विष्णुपुर विधानसभा केंद्र से मदन मित्र (खेल व परिवहन मंत्री) की भारी जीत के बाद सुदीप्तो तृणमूल नेताओं के करीब आ गए. नेताओं और पुलिस अफसरों को भी मौके-बेमौके कीमती उपहार भेजना भी वह नहीं भूलते थे. यही वजह थी कि 14 साल तक फर्जीवाड़े पर आधारित उसका साम्राज्य लगातार तरक्की करता रहा.”

इस कंपनी के जरिए शुरू की गई योजनाएं ही अब औंधे मुंह गिरी हैं.

सुदीप्तो ने पहले इलाके के सीपीएम नेताओं के साथ बढ़िया संबध बनाए और उनकी हर तरह से सहायता की.

लेकिन हवा का बदलता रुख भांप कर बाद में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के नेताओँ के साथ नज़दीकी बढ़ानी शुरू कर दी.

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