बर्फीली तलवारों से अंतरिक्ष अभियान को खतरा

बर्फ की ब्लेड
Image caption बर्फ की ये नुकीली धार यूरोपा के भूमध्य क्षेत्र को पूरी तरह से ढंक सकती है.

बृहस्पति का बर्फीला चांद भविष्य में शुरु की जाने वाली कई अंतरिक्ष अभियानों का प्रमुख लक्ष्य है. इसकी बर्फीली सतह के नीचे समंदर छिपा है. यही वजह है कि माना जा रहा है कि यहां मानव जीवन संभव है.

मगर एक बड़ी मुश्किल है. यहां तलवार की शक्ल में बर्फ की करीब 19 मीटर लंबी-लंबी नुकीली 'चोटियां' मौजूद हैं. बर्फ की इन नुकीली चोटियों को वैज्ञानिकों ने 'पेनिटेण्ट्स' का नाम दिया है.

वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं कि वहां बर्फ की परतों के बीच जमे नीले पानी मे मौजूद धरातल के कुछ टुकड़ों को नमूने के बतौर इकट्ठा किया जाए.

वैज्ञानिक यूरोपा की सतह पर रोबोट भेज कर मानव जीवन के लिए जरूरी परिस्थितियों की छानबीन करना चाहते है. इस छानबीन से वैज्ञानिक पता लगा सकेंगे कि कई किलोमीटर नीचे दबे समंदर का पानी कैसा है.

लगभग यही परिस्थितियां धरती पर काफी ऊंचाई पर स्थित क्षेत्र एण्डिज पर भी मौजूद है.

यहां हवाएं सर्द भी हैं और शुष्क भी. इस कारण यहां बर्फ की ऊंचाई धीरे धीरे बढ़ती जाती है. क्योंकि बर्फ ठोस रूप से सीधा भाप में बदल जाता है, बिना तरल रूप लिए.

पेनिटेण्ट्स तब बनना शुरु होता है जब बर्फ की सतह सूरज की गर्मी के कारण तपने लगती हैं.

धीरे धीरे बर्फ के बीच में खांचे बनने शुरु हो जाते हैं. फिर यही खांचे सूरज की किरणों के लिए जाल बन जाते हैं. जैसे जैसे ये खांचे गहरे होते जाते हैं, बर्फ की लंबी लंबी नुकीली चोटियां बनती चली जाती है.

सिर पर सवार सूरज

कोलेरैडो विश्वविद्यालय के डॉ डेनियल होबले, टेक्सास में 44वां लूनर एण्ड प्लैनेटरी साइंस कांफ्रेंस में अपना शोध प्रस्तुत कर चुके हैं. उनका कहना हैं कि पेनीटेण्ट्स तभी बनते हैं जब सूरज बिलकुल सिर के ऊपर खड़ा होता है.

जब सूरज की तीखी किरणें एकदम सीधी बर्फ के ऊपर पड़ती हैं तो इसकी धार से बर्फ बहुत धीरे धीरे पिघलती है. और फिर वे पीछे खिसकने लगती हैं, उन्होंने समझाते हुए बताया.

Image caption ये यूरोपा है. ऐसा माना जाता है कि यूरोपा की सतह बर्फ की मोटी परत मे घिरे नीले पानी के समंदर से बनी है.

धरती पर बर्फ की ऐसी नुकीली तलवारों का बनना मुश्किल होता है, क्योंकि पृथ्वी भूमध्य रेखा से 30 डिग्री अक्षांश पर स्थित है. यहां बर्फ के ऊपर उठते हुए नुकीली धार बन जाने की संभावनाएं ना के बराबर होती हैं.

“यूरोपा बृहस्पति से बहुत मजबूत गुरुत्वाकर्षण से बंधा हुआ है और बृहस्पति सूरज से बहुत मजबूत गुरुत्वाकर्षण से बंधा हुआ है, इसलिए सूरज बृहस्पति पर हमेशा एकदम ऊपर स्थित होता है.” डॉ होबले कहते हैं. और इसीलिए बृहस्पति का ये मून (चांद) इन सारी जरूरतों को अच्छे से पूरी करता है.

यूरोपा पर बहुत कम ऑक्सीजन मौजूद है. इससे वहां कई सारी समस्याओं के पैदा होमे की संभावनाएं पैदा हो जाती है. मसलन, इस मून पर इन बर्फीली चोटियों के बनने के लिए जरूरी परिस्थितियां कम या ज्यादा भी हो सकती हैं.

डॉ होबले ने बीबीसी न्यूज को बताया, “हमारे आकलन के अनुसार सूरज की सीधी पड़ती तीखी किरणों के कारण यूरोपा की सतह लगातार ऊंची होती जा रही है.”

जांच दल सूरज की किरणों के कोण का पता लगाते हुए यूरोपा की सतह के तापमान का भी अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने पता लगाया है कि संभवतः भूमध्यरेखा से 15 और 20 डिग्री अक्षांश के बीच पेनिटेण्ट्स के बनने पर रोक लगाई जा सकती है.

यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि इस क्षेत्र में पेनिटेण्ट्स की लंबाई को 1 मी से 10 मी के बीच हो सकती है.

यूरोपा की सतह अपेक्षाकृत् नई है. और किन्हीं अज्ञात प्रक्रियाओं के जरिए 5 करोड़ साल पहले इसकी नई परतें बननी शुरु हुईं थीं. अगर हम इस 50 लाख साल पुरानी सतह पर हों और भूमध्य रेखा की उस पट्टी से यह 20 डिग्री कम और ज्यादा में स्थित हो तो उम्मीद है कि बर्फ की 5 मी. लंबी चोटियां होंगीं.

मुश्किलें

डॉ जेविह कोरिपियो एक ग्लेशियोलॉजिस्ट हैं. इन्होंने एण्डिज पर निर्मित संरचनाओं का अध्ययन किया है. वे डॉ होबले की परिकल्पना को रोचक बताते हैं.

उनका मानना है कि डॉ होबले ने संभावित समस्या को हम सबके सामने बखूबी रखा है. पेनिटेण्ट्स के बनने के दौरान बर्फ के खांचे गहरे होते जाते है. इससे इनमें बर्फ को पिघलाने देने वाली हवाओं को छिपने की पर्याप्त जगह मिल जाती है.

वे सुझाव देते है कि किन्हीं अन्य प्रक्रियाओं को यूरोपा की सतह पर सक्रिय किया जा सकता है, "तापमान और वायुमंडलीय दबाव चूंकि यहां बहुत कम है, सतह के ऊपर उठने की प्रक्रिया भी बहुत धीमी है. इसलिए, भाप उसी हिस्से से निकलेगी जहां का दबाव निम्न होगा. तब बर्फ के क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया की दर बहुत धीमी होगी.”

उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा, “हर परिस्थिति में, भविष्य के अभियानों के लिए बृहस्पति के इस बर्फीले चांद यूरोपा पर जाने का विचार किया जा सकता है.”

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