कर्नाटक चुनाव: बाज़ी कांग्रेस के हाथ कैसे लगी?

कर्नाटक विधानसभा चुनावों में काँग्रेस ने पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को बाहर का रास्ता दिखाया है.

ताजा नतीजों के अनुसार राज्य की 224 सीटों में से जिन 223 पर चुनाव हुए, उनमें कांग्रेस 119 सीटें जीत चुकी है जबकि दो पर बढ़त बनाए हुए है.

दूसरी तरफ भाजपा को अभी तक 39 सीटें मिली हैं और एक सीट पर उसका उम्मीदवार आगे चल रहा है.

जेडीएस को 40 सीटें मिली हैं जबकि अन्य 22 स्थानों पर कामयाब हुए हैं. अन्य में बीजेपी से टूटकर अलग हुए बीएस येदियुरप्पा की केजीपी पार्टी को छह सीटें मिली हैं.

वैसे कर्नाटक में काँग्रेस की जीत अप्रत्याशित नहीं थी. लेकिन भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता और सुस्ती के आरोपों से घिरी केंद्र की यूपीए सरकार को क्या इस जीत से ख़ुश होना चाहिए और 2014 के चुनावों के लिए भी उम्मीद बाँधनी चाहिए? लीजिए पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल का आकलन.

क्या इस जीत की लहर पर सवार होकर काँग्रेस आम चुनाव की नैया पार कर पाएगी?

याद करें कि 1985 के चुनावों को. कर्नाटक के मतदाता ने राजीव गाँधी को पूरा समर्थन दिया और दो-तिहाई बहुमत उन्हें मिला.

पर विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली काँग्रेस को हराकर रामकृष्ण हेगड़े को मुख्यमंत्री बनाया.

तो काँग्रेस को ये नहीं भूलना चाहिए कि कर्नाटक की ये जीत उसकी स्थिति में कोई बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा. ये भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कि बीजेपी की हालत राज्य में पतली थी. ये नतीजे चौंकाने वाले नहीं हैं.

लेकिन जब दिल्ली की बात आएगी तो यही कर्नाटक का वोटर दिल्ली के लिए चुनेगा. विधानसभा के लिए अलग तरह से वोट दिया जाता है और संसद के लिए अलग तरह से.

जनता दल (सेक्युलर) ऊँघते-ऊँघते दूसरे नंबर पर कैसे पहुँची?

ये बहुत बड़ा राजनीतिक संदेश कर्नाटक देने जा रहा है. अब तक तीसरे मोर्चे की बात उठती थी और रुक जाती थी.

अब कर्नाटक में जनता दल (सेक्यूलर) का उठान ये दर्शाता है कि आने वाले दिनों में तीसरे मोर्चे की बात फिर उठेगी.

याद रखना ज़रूरी है कि जब दूसरी बार विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था तो कर्नाटक से एच डी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाया गया.

आज जेडी (एस) अगर दूसरे नंबर पर आ रहा है तो मेरा अनुमान है कि तीसरे मोर्चे को ऑक्सीजन मिलना शुरू हो गई है.

क्या बीजेपी के लिए दक्षिण भारत के प्रवेश द्वार पर ताला ठुक गया?

कर्नाटक में जब पहली बार भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीती थी, तब कहा जा रहा था कि दक्षिण भारत में पैर पसारने के लिए बीजेपी को एक रास्ता मिल गया. उसे दक्षिण का प्रवेश द्वार कहा गया था.

ताजा नतीजों से ये नहीं कहा जा सकता कि कर्नाटक से बीजेपी साफ़ हो गई है. लेकिन ये ज़रूर है कि बीजेपी को दक्षिण में पैर पसारने के लिए एक बार फिर कर्नाटक से शुरुआत करनी होगी.

भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे येद्दियुरप्पा अब क्या करेंगे?

अब बीजेपी को राजनीतिक नफ़ा नुकसान देखते हुए फ़ैसला करना है कि येद्दियुरप्पा का क्या करना है.

अब जनता जान गई है कि धार्मिक नारेबाज़ी आदि का कोई मतलब नहीं है. नेतृत्व को साफ़ सुथरा होना चाहिए और स्वच्छ प्रशासन देने वाला होना चाहिए.

बीजेपी से निकले हुए नेता पहले भी वापिस आते रहे हैं, जैसे कल्याण सिंह लौटे और उमा भारती लौटीं, उसी तरह येद्दियुरप्पा भी लौट सकते हैं.

क्या ये भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मतदाता का ग़ुबार था?

भ्रष्टाचार का मुद्दा चार प्रतिशत से ज़्यादा भूमिका नहीं निभाता. इसके कारण लोगों पर सीधा असर होता है, मसलन भ्रष्टाचार के कारण सड़क नहीं बनती या विकास नहीं होता तो लोग प्रभावित होते हैं. तो भ्रष्टाचार तो मुद्दा है.

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