क्यों आहत हैं सागरिका घोष ट्विटर से

  • 1 मई 2013
Image caption सागरिका घोष सीएनन-आईबीएन न्यूज़ चैनल की डिप्टी एडिटर हैं.

एक वरिष्ठ महिला पत्रकार को ट्विटर पर तीन साल तक बार-बार बलात्कार और जान से मारने की धमकी दी जाए और वेश्या के नाम से पुकारा जाए तो वो क्या करेंगी? और अगर उनकी बेटी का नाम, क्लास और स्कूल की जानकारी ही ट्वीट की जाए तो?

भारतीय टेलीविज़न का जाना-पहचाना चेहरा, सीएनएन-आईबीएन चैनल की डिप्टी एडिटर सागरिका घोष इन सबसे तंग आ चुकी हैं.

बीबीसी से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा, “किस धमकी पर अमल किया जाएगा, ये जानना मुश्किल है, लेकिन जब मेरी बेटी के बारे में ट्वीट हुआ था, तो मैं डर गई, कुछ समय के लिए उसे स्कूल बस की जगह अपनी कार से स्कूल भेजा.”

ट्विटर पर इस वक्त सागरिका घोष के 1,74,000 से भी ज़्यादा फॉलोअर हैं.

वो कहती हैं, “मेरी पत्रकारिता पर बहस हो तो ठीक है, लेकिन सेक्सिस्ट और अभद्र भाषा के इस्तेमाल पर गुस्सा आता है, पहले मैं भी जवाब देती थी, लेकिन उससे माहौल और बिगड़ जाता था, तो अब मैं या तो ध्यान नहीं देती, या फिर महिला पत्रकारों के साथ होनी वाली बदतमीज़ी दर्शाने के लिए उन ट्वीट्स को री-ट्वी्ट करती हूं.”

क्यों होती है बदतमीज़ी?

तमिल नाडू के तिरुनेलवली में क्रिमिनॉलॉजी के प्रोफेसर डॉ. जयशंकर और वक़ील देबरती हल्दर ने इंटरनेट पर हमलों में महिलाओं को निशाना बनाए जाने पर शोध कर, 'क्राइम एंड द विक्टिमाइज़ेशन ऑफ वीमेन' नाम की किताब लिखी है.

सागरिका से इत्तफ़ाक रखते हुए वो कहते हैं, "हमारे समाज की पुरुषवादी मानसिकता इंटरनेट पर भी झलकती है, महिलाएं बहस करें या जवाब दें, ये मर्दों को पसंद नहीं. तो जानीमानी हस्तियों को अभद्र भाषा से निशाना बनाया जाता है और आम महिलाओं का पीछा कर उनसे असल ज़िन्दगी में संपर्क करने की कोशिश की जाती है."

Image caption सागरिका घोष को किया गया एक ट्वीट.

उनके शोध में पाया गया कि ऐसी बदतमीज़ी करनेवाले पुरुष असल ज़िन्दगी में डॉक्टर, वकील या टीचर भी हो सकते हैं, लेकिन इंटरनेट पर अपनी पहचान ज़ाहिर किए बगैर बोलने की छूट उनके व्यक्तित्व के भद्दे चेहरे को उभरने का मौका देती है.

सागरिका के ट्विटर अकाउंट पर नज़र डालें तो पता चलता है कि ऐसे कमेन्ट्स खास तौर पर तब आते हैं जब वो देश की राजनीति पर टिप्पणी करती हैं.

Image caption मीना कंडासामी कई अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी कविताएं रख चुकी हैं.

सागरिका का मानना है कि, “ट्विटर पर उन महिलाओं को निशाना बनाया जाता है जो उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष विचार रखती हैं, और उनसे बदतमीज़ी करनेवाले पुरुष दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी सोच रखते हैं.”

सागरिका कहती हैं कि अब उन्होंने ट्विटर पर अपने व्यक्तिगत विचार रखना छोड़ दिया है, वो इसपर अब सिर्फ अपने काम की जानकारी देती हैं.

कौन परवाह करे इन पुरुषों की ?

सागरिका अकेली नहीं हैं. जानी-मानी दलित लेखक मीना कंडासामी ने भी ट्विटर से किनारा कर लिया है.

पिछले साल अप्रैल में उस्मानिया विश्वविद्यालय में ‘बीफ फेस्टिवल’ के आयोजन पर उनकी ट्विटर पोस्ट पर बहुत अभद्र टिप्पणियां आने लगीं.

उन्हें सामूहिक बलात्कार की धमकी दी गई और इसका टीवी पर सीधा प्रसारण करने की भी. कुछ ने तेज़ाब फेंकने की बात कही. इनमें से कुछ के ख़िलाफ मीना ने पुलिस में शिकायत भी की.

मीना ने बीबीसी को बताया, “मेरी किताबों और लेखनी की फेसबुक और ट्विटर पर ही नहीं, असल ज़िन्दगी में भी बहुत आलोचना होती है.. प्रकाशित सामान को जलाया जाता है और मुझे वो ज़्यादा दुख देता है.. मैंने तय किया है कि मैं अपना कीमती समय अब वर्चुअल वर्ल्ड के अनजान लोगों की टिप्पणियों से परेशान होने में नहीं गुज़ारूंगी.”

मीना का मानना है कि सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ बदतमीज़ी करनेवालों में ज़्यादातर ऐसे पुरुष होते हैं जिन्हें ‘जाति और हिन्दुत्व की आलोचना करनेवाले’ पसंद नहीं आते.

Image caption मीना कंडासामी को किया गया एक ट्वीट.

महिला आंदोलनकारी ही निशाना?

दिसंबर में सामूहिक बलात्कार के बाद महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा कई बहसों का चर्चा बना, पर पिछले हफ्ते इंटरनेट पर हो रही ऐसी ही एक चर्चा में एक महिला आंदोलनकारी के साथ ही बदतमीज़ी हुई.

महिलाओं के मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रहीं कविता कृष्णनन ने बीबीसी को बताया कि ‘रेडिफ वेबसाइट’ के द्वारा आयोजित एक चैट के दौरान @RAPIST नाम के हैंडल से एक व्यक्ति ने उनका बलात्कार करने की धमकी दी.

Image caption दिसंबर के सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद दिल्ली के इंडिया गेट पर एक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेतीं कविता कृष्णनन.

कविता ने कहा, “कुछ ही देर में मैंने वो चैट छोड़ दी, मुझे दुख इस बात का है कि एक जानकार के तौर पर मुझे बुलाया गया लेकिन मुझे सुरक्षित माहौल नहीं मिला. रेपिस्ट जैसे नाम वाले हैंडल को इस चैट में शामिल होने दिया गया, ना उसे रोका गया ना बाद में ब्लॉक किया गया.”

रेडिफ वेबसाइट ने इस मामले में बीबीसी से बात तो नहीं की, पर अपनी वेबसाइट पर चैट की जानकारी देते हुए अभद्र टिप्पणियों के लिए कविता से माफी मांगी.

कविता ने अब उस व्यक्ति के ख़िलाफ एफआईआर दर्ज कराई है.

पुलिस और क़ानून

पुलिस की मदद लेने का रास्ता चुनने वाली कविता और मीना को एक अपवाद बताते हुए देबरती हल्दर कहती हैं कि ज़्यादातर महिलाएं पुलिस के पास जाने की बजाय हैकर्स की मदद लेना पसंद करती हैं.

देबरती और डॉ. जयशंकर साल 2009 से चेन्नई में इंटरनेट पर हमलों का शिकार हुए लोगों के लिए काउंसलिंग सेंटर चलाते हैं. वो बताती हैं कि शुरुआत में उन्हें हैकर समझा गया और कई लोग अभद्र सामग्री हटाने की दरख़्वास्त लेकर उनके पास आए.

देबरती ने कहा, "आखिरकार हमने कुछ महिलाओं को पुलिस के पास जाने के लिए राज़ी किया, पर उनमें से कई ने लौटकर मुझे बताया कि उनकी शिकायत पर ग़ौर करने की बजाय पुलिस ने उन्हें कहा कि सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने की ज़रूरत क्या थी?"

भारत में इंटरनेट पर सेक्सिस्ट और अभद्र भाषा से महिलाओं के निशाना बनाए जाने से निपटने के लिए फ़िलहाल कोई क़ानून नहीं है.

पर देबरती का मानना है कि यौन उत्पीड़न और इंटरनेट पर आपत्तिजनक संदेश भेजने के ख़िलाफ मौजूदा क़ानूनों पर भी अगर सही तरीके से अमल किया जाए तो महिलाओं को इंटरनेट पर अपनी बात रखने के लिए सुरक्षित माहौल मिलने में मदद मिलेगी.

(ऐसी स्थिति में आप क्या करते? हमें बताने के लिए आएं हमारे फेसबुक पन्ने पर और ट्वीट करें @bbchindi पर)

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