पुराना इतिहास है मज़दूर दिवस का

Image caption दुनिया भर में एक मई मज़दूरों का दिन माना जाता है.

एक मई को पूरी दुनिया में मज़दूर दिवस या मई दिवस के रुप में मनाया जाता है. कई देशों में इस दिन छुट्टी होती है लेकिन किसी एक घटना से इसे सीधे सीधे जोड़ा नहीं जा सकता है.

हालांकि 1886 में शिकागो के बाज़ार में मज़दूरों के प्रदर्शन की तारीख को इससे जोड़ा जाता है. हुआ ये था कि शिकागो के हेमार्केट में मज़दूर एक दिन में आठ घंटे काम को लेकर आंदोलन कर रहे थे और इस दौरान पुलिस ने फायरिंग की जिसमें कुछ मज़दूर मारे गए.

ये घटना एक मई की थी. इसके बाद 1889 से लेकर 1890 तक अलग अलग देशों में मज़दूरों ने प्रदर्शन किए. ब्रिटेन के हाइड पार्क में 1890 की पहली मई को तीन लाख मज़दूरों ने प्रदर्शन किया और मांग वही थी एक दिन में सिर्फ आठ घंटे काम.

आगे चलकर कई यूरोपीय देशों में यही मांग उठी और शिकागो में मारे गए मज़दूरों की याद में एक मई को मज़दूर दिवस के रुप में मनाने पर सहमति बनी.

लेकिन मई दिवस का स्वरुप बदला और ये सिर्फ मज़दूरों तक सीमित नहीं रहा. कालांतर में ये विरोध का दिवस बन गया.

1900 से लेकर 1920 के दशक में यूरोप की सोशलिस्ट पार्टियों ने सरकार और व्यवसायियों के दमन के विरोध के लिए इसी दिन को चुना. कई बार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मई दिवस के विरोध युद्ध विरोधी प्रदर्शनों में बदल जाते थे.

इसके बाद के दशकों में कई बार मई दिवस को नात्सी विरोधी दिवस के रुप में भी मनाया गया जबकि हिटलर के शासन काल में एक मई को राष्ट्रीय मज़दूर दिवस घोषित किया गया था. इटली में मुसोलिनी और स्पेन में जनरल फ्रैंको ने मई दिवस पर प्रतिबंध भी लगाए.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के देशों में मई दिवस को छुट्टी के तौर पर मनाया जाता रहा और कई देशों ने इस दिन छुट्टी की घोषणा की. ये वो दौर था जब मज़दूरों के लिए सुधार के कई कार्यक्रम शुरु किए गए.

लेकिन तब भी यदा कदा जब विरोध होता तो इसके लिए एक मई की ही तारीख चुनी जाती. बाद में पूंजीवाद का विरोध जब शुरु हुआ तो उसे भी एक मई से ही जोड़ा गया. ब्रिटेन और अमरीका में आक्यूपाई यानी कब्ज़ा करो आंदोलन को भी मई दिवस या मज़दूरों से जोड़ा जाता है.

भारत में कुछ राज्यों में मई दिवस के दिन छुट्टी होती है लेकिन कई राज्यों में इस दिन कोई छुट्टी नहीं होती है. ट्रेड यूनियनें इस दौरान धरना प्रदर्शन और कई कार्यक्रम आयोजित करते हैं.