मज़ाक क्यों नहीं झेल पाते भारतीय नेता.?

Image caption कार्टूनिस्टों का मानना है कि आजकल के राजनेता आलोचना नहीं सह पाते

आज के ज़्यादातर राजनीतिक नेता ज़रा सी आलोचना भी नहीं झेल पाते जबकि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता के पास न सिर्फ़ ग़ज़ब का सेंस ऑफ ह्मूमर था बल्कि उन्हें ख़ुद पर भी हँसने की कला आती थी.

कुछ दिन पहले गोवा में मारियो मरिंडा कार्टून फेस्टिवल के दौरान ये बातें आउटलुक के पूर्व संपादक विनोद मेहता ने कही.

इस समारोह में अक्सर वाजपयी के नाम का ज़िक्र हुआ. फेस्टिवल में न सिर्फ़ मशहूर कार्टूनिस्ट मारियो मरिंडा के काम को याद किया गया बल्कि कार्टूनिंग को लेकर प्रशासन और सरकारों की बढ़ती असहनशीलता पर भी बात हुई.

कार्टूनिस्ट या व्यंग का सहारा लेकर राष्ट्रीय मुद्दे उठाने वालों के खिलाफ सरकारी कदम उठाए जाने के कई मामले सामने आते रहे हैं.

कार्टूनिस्ट हैं, आतंकवादी नहीं

अप्रैल 2012 में जाधवपुर यूनिवर्सिटी प्रोफेसर अंबिका महापात्रा पर कथित तौर पर सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने हमला किया था. आरोप था कि उन्होंने कथित तौर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्टून कई जगह भेजा था.

इसी तरह विरोध प्रदर्शन के दौरान एक छात्र की मौत के बाद तृणमूल के एक कार्यकर्ता ने कार्टून बनाया जिसमें ममता बनर्जी की आलोचना की गई थी. बाद में इस कार्यकर्ता ने इस्तीफ़ा दे दिया.

इस पूरे घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल सरकार व्यंग्य और तंज की रेस में पिछड़ी हुई साबित हुई.

हिंदू के कार्टूनिस्ट केशव, मुंबई मिरर के हेमंत मोरपारिया समेत कई कार्टूनिस्टों ने राजनेतओं के इस रवैये पर निराशा जताई.

बहस इस सवाल पर भी हुई कि हँसी मज़ाक और भड़काऊ के बीच लकीर कहाँ खींची जाए. दिल्ली में 2012 में असीम त्रिवेदी नाम के कार्टूनिस्ट को गिरफ्तार किया गया था.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करने वाले विश्व भर के हज़ारों लोगों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी जब भारत सरकार ने असीम त्रिवेदी पर देशद्रोह का आरोप लगा दिया था.

Image caption कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया था

मरिंडा कार्टून फेस्टिवल में हालांकि ज़्यादातर लोग इस बात पर सहमत थे कि असीम त्रिवेदी के कार्टून बहुत बढ़िया नहीं थे, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस के कार्टूनिस्ट उन्नी का कहना था कि ज़्यादा जरूरी सवाल ये है कि सरकार उन पर देशद्रोह का आरोप कैसे लगा सकती है.

उन्नी का सवाल था, वो एक युवा कार्टूनिस्ट है, आतंकवादी नहीं.

कई देशों से अलग भारतीय संविधान में अभिव्यक्ती की आज़ादी का अधिकारी अप्रत्यक्ष रूप से आर्टिकल 19 से आता है. लेकिन सरकार का फर्ज़ है कि वो संविधान की रक्षा करे न कि अभिव्यक्ती की आज़ादी का हनन करने के तरीके ढूँढे.

"युवा भी बेहतर नहीं"

हिंदू के मुख्य कार्टूनिस्ट केशव ने राजनीतिक कार्टूनिंग की चुनौतियों पर भी बात की. उनका कहना था कि चाहे इनमें हँसी मज़ाका का पुट होता है लेकिन ये काम कभी कभी अवसाद वाला हो जाता है.

उनका कहना था, “पत्रकारों की तरह कार्टूनिस्ट को कोई ग़लतफहमी नहीं होती कि उनके काम से देश बदल जाएगा. लेकिन वो कोशिश करते रहते हैं. हमारे पास एक संदेश होता है और इसे पहुँचाने के लिए हमें अलग माध्यम का इस्तेमाल करना होता है. देश में हम गंभीर हालात से गुज़र रहे हैं. बलात्कार और सांप्रदायिक तनाव जैसी घटनाओं की तुलना में घोटालों और भ्रष्टाचार से निपटना आसान होता है.”

वहीं मुंबई मिरर के हेमंत मरोपारिया कहते हैं कि ऐसा कार्टून बनाना असंभव है जो सबको पसंद आए.

उनका कहना था, कुछ ऐसे लोग होते हैं जो बस इसी इंतज़ार में होते हैं कि छोटा सा मौका मिले और वे आहत हो जाएँ.

फेस्टिवल की निदेशक एमी फर्नाडिज़ के मुताबिक राजनीतिक असहनशीला का मतलब ये नहीं कि आम आदमी भी व्यंग या तंज सहने की अपनी क्षमता भूल चुका है.

Image caption फेस्टिवल में कार्टूनिस्टों के सामने आ रही दिक्कतों पर चर्चा की गई

उन्होंने कहा, कार्टूनों को लेकर ज़्यादातर विवाद राजनीति से प्रेरित होते हैं. कुछ गुट होते हैं जिनका मकसद कुछ और ही होता है- यही लोग हैं जो बहुत जल्द आहत हो जाते हैं और अख़बारों के दफतरों में तोड़ फोड़ करते हैं. मुझे लगता है कि आम आदमी अब भी तार्किक है.

पत्रकार और स्तंभकार अनिल धारकर ने शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे का उदाहरण दिया जो पहले कार्टूनिस्ट थे.

जब उनसे पूछा गया कि क्यों शिव सेना और एमएनएस की छवि असहनशील राजनीतिक गुटों के तौर पर बन गई है तो धारकर ने कहा, “शायद ठाकरे का अपना सेंस ऑफ ह्मूमर समय के साथ कहीं खो गया !”

विनोद मेहता मानते हैं कि राजनेता ( ख़ासकर सत्ताधारी राजनेता) ख़ुद को बहुत अहम समझने लगते हैं और आडंबरों से भरे रहते हैं जिस वजह से उन पर कसे गए तंज को वो सहन नहीं कर पाते.

मिसाल देते हुए उन्होंने पूछा, क्या आप सोच कहते हैं कि जसवंत सिंह या चिदंबरम के पास सेंस ऑफ ह्मूमर हो. दर्शकदीर्घा में बैठे कई लोगों ने जवाव दिया- नहीं.

विनोद मेहता ने ये भी कहा कि सिंधिया, देओरा या पायलट जैसे युवा राजनेता भी इस मामले में कोई बहुत बेहतर नहीं है.

पैनल और दर्शकों का सर्वसम्मत नज़रिया यही था कि जहाँ तक ह्मूमर-इंडेक्स की बात है तो जिन राजनेताओं की रैंकिंग बेहद कम है वो हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी

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