कश्मीर में हिंदी की आवाज़ बने नवाज़

Image caption कश्मीर की घाटी में हिंदी कवि निदा नवाज़ बेहद लोकप्रिय हैं

बीते दो दशकों के दौरान जब कश्मीर घाटी में भारतीय शासन के विरुद्ध सशस्त्र आन्दोलन जारी था, तब भारत समर्थक लोग जिनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे, घाटी से पलायन करने लगे थे.

आम अवाम हर उस चीज़ से दूरी बना रहा था जो भारत से जुड़ी हुई थी.इसमें हिंदी भाषा भी शामिल थी. लोग हिंदी पढ़ने और पढ़ाने से एक दूरी बनाने लगे थे. लेकिन उन्ही पलों में निदा नवाज़ सबसे जुदा राह अपनाते हुए हिंदी में कविता करने में जुटे थे.

लोग उन्हें कभी 'हिन्दू' और कभी 'हिन्दुस्तानी' कहते थे. लेकिन निदा पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा.

एक कहानी से बदली जिंदगी

उन्होंने हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने एक छोटी सी कहानी लिखी जो जम्मू के एक अख़बार में प्रकाशित हुई. इस पर उन्हें देश भर से पत्र और ख़ूब सराहना मिली.

यही पल निदा नवाज़ के लिए टर्निंग प्वाइंट बन गया और वे हिंदी के ही होकर रह गए. जल्दी ही कहानी लेखन से उनका झुकाव कविता की तरफ हुआ और इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा.

1998 में उनकी कविता संग्रह ‘अक्षर अक्षर रखत भरा’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

निदा नवाज़ की कविताओं में कश्मीर के हालात की झलक मिलती है. वे खुद कहते हैं, “मैं कश्मीर के दुःख दर्द को ऐसी भाषा में बयान करता हूँ जिसे देश के अधिकांश लोग समझते हैं.”

उन्होंने चरमपंथियों के विरोध में भी कविताएं लिखीं तथा सुरक्षा बलों के ज़ुल्मों का भी उल्लेख किया.

उन्होंने चरमपंथियों के हाथों की जाने वाली अपहरण की वारदातों की एक झलक यूँ पेश की है-

"वो जब आते हैं रात के समय, दस्तक नहीं देते,

तोड़ते हैं वो दरवाज़े, घुस जाते हैं हमारे घरों में,

वो दाढ़ी से खींचते हैं हमारे अब्बू को,

छिन जाती है हमारी अम्मा की ओढ़नी."

चरमपंथियों ने उनका दो बार अपहरण किया लेकिन दोनों ही बार उन्हें सुरक्षित छोड़ दिया गया. सुरक्षा बल भी उनसे नाराज़ रहे और कम से कम एक बार तो उन्हें गिरफ़्तार तक किया गया.

सुरक्षा कर्मियों ने घाटी में आम लोगो के साथ कैसा व्यवहार किया उस के बारे में नवाज़ ने लिखा है-

"चिनार के बूढ़े पत्तों की तरह झड़ जाते हैं हम,

रोकते हैं हर मोड़ पर वो गाड़ी हमारी,

अभद्र भाषा में हमें कहा जाता है उतरने के लिए,

कांपते कांपते ढल जाते हैं एक,

बारी बारी ली जाती है तलाशी हमारी,

वो छीन लेते हैं हमसे हमारा आत्म सम्मान."

दोस्त ने दिखाई राह

Image caption कश्मीर निदा नवाज़ ने पटना विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए की डिग्री ली है

दरअसल निदा नवाज़ को हमेशा कुछ अलग करने की इच्छा थी. वे कुछ समय श्रीनगर में रहे थे जहां उनकी बिहार के एक शख्स के साथ दोस्ती हो गई.

उनका दोस्त उन्हें प्रतिदिन एक हिंदी अखबार देता था और उसे पढ़ने में उनकी मदद करता था.

निदा नवाज़ को उन दिनों हिंदी का एक भी अक्षर भी नहीं आता था लेकिन उन्होंने हिंदी सीखने की ठान ली.

इसके बाद उन्होंने हिंदी में स्नातक की डिग्री हासिल की और उसके बाद स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल करने पटना विश्वविद्यालय चले गए.

उन्हें खेद है की आम लोग हिंदी भाषा को हिन्दू धर्म और उर्दू को इस्लाम धर्म के साथ जोड़कर देखते हैं.

ऐसा एक वाकया निदा नवाज़ के साथ भी हुआ, जब बस में सफ़र कर रहे थे. एक व्यक्ति ने उनकी दाढ़ी देख उन्हें मौलवी साहब कह कर पुकारा.

घाटी में कवि सम्मेलन

लेकिन यात्रा के दौरान जैसे ही उन्होंने हिंदी की पुस्तक खोल कर पढ़नी शुरू कर की तो उसी व्यक्ति ने उनसे तुरंत कहा, "मुझे माफ़ कर दीजिए, मुझे नहीं मालूम था की आप हिन्दू हैं."

निदा नवाज़ इस समय दो किताबों पर काम कर रहे हैं, जो शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली हैं.

इनमें से एक उनकी कविताओं का संग्रह है तो दूसरी उनकी लिखी डायरी है.

इसके अलावा निदा नवाज़ ने कश्मीर घाटी में कई कवि सम्मेलनों में भाग लेने लगे हैं.

घाटी के बाहर भी हिंदी के तबके में वे काफी मशहूर हो चुके हैं. लेकिन घाटी के अन्दर उनका एक मात्र दोस्त हैं सतीश विमल. सतीश विमल भी हिंदी के कवि हैं.

घाटी के अंदर सतीश विमल और निदा नवाज़ अक्सर किसी चायखाने में बैठ एक दूसरे को अपनी कविताएँ सुनाते दिख जाते हैं.

संबंधित समाचार