क्या सिमट जाएगा ध्रुपद ?

Image caption फरीउद्दीन डागर अपने शिष्यों उमाकांत-रमाकांत गुंदेचा के साथ बीच में. साभार ध्रुपद डॉट ओआरजी

भारत की शास्त्रीय ध्रुपद गायन परंपरा के गायक ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर ‘डागर परिवार’ की समृद्ध संगीत परंपरा की 19 वीं पीढ़ी के प्रतिनिधि थे.

सुर ताल और उसकी लय पर उनकी पकड़ गज़ब की थी. अलाप, विलंबित, मध्य और द्रुत लय पर उनका गायन सुनने लायक होता था. कहा जाता है कि 20 पीढ़ियों से ध्रुपद गायन की विरासत डागर परिवार ही संजो रहा है.

ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर का जाना सिर्फ़ ध्रुपद गायन ही नहीं बल्कि उस परंपरा की विरासत में कमी है, जहां पर नए कलाकारों को गढ़ने का काम होता है.

कहा जाता है कि ध्रुपद धमार की शैली मुगल काल से आई. जिसके प्रणेता तानसेन थे.

ध्रुपद की परंपरा छह सौ साल पुरानी है. यह एकमात्र ऐसी शास्त्रीय परंपरा है, जिसमें नए प्रयोग हुए और रचनाधर्मिता के नए आयाम भी जोड़े गए. लेकिन डागर परिवार ने इसकी शास्त्रीय शुद्धता को बरकरार रखते हुए, इसका प्रसार किया.

नई पीढ़ी

इस कड़ी में फ़रीदुद्दीन डागर शायद सबसे सशक्त और आखिरी व्यक्ति थे.

फ़रीदुद्दीन डागर के शिष्यों की सूची बहुत लंबी है, इसमें ऋत्विक सान्याल, उदय भवाल्कर, उमाकांत-रमाकांत गुंदेचा और खुद उनके भतीजे ज़िया मुइनद्दीन डागर के पुत्र वहीउद्दीन डागर का नाम लिया जा सकता है.

ध्रुपद की परंपरा को बचाने के लिए डागर परिवार और बड़े उस्तादों ने बख़ूबी काम किया है.

इसलिए यह परंपरा आगे भी चलती रहेगी. अपने पूर्ववर्ती उस्तादों की परंपरा को फ़रीदुद्दीन डागर ने बरकरार रखा. आज नई पीढ़ी के जो लोग ध्रुपद गायन कर रहे हैं. वे उनकी विरासत को आगे बढ़ाएंगे.

संगीत के प्रति नज़रिया

साठ और सत्तर के दशक में जो फिल्मी संगीत होता था, जिस तरह की फ़िल्में बनती थीं, उनकी अगर आज से तुलना की जाए तो कहा जा सकता है कि उसमें क्षरण हुआ है.

सिर्फ ध्रुपद की ही क्यों साहित्य की परंपरा में, लेखन की परंपरा में, सिनेमा की परंपरा और अन्य तमाम परंपराओं में क्षरण हुआ है. यह कमी सिर्फ समाज के नज़रिए की वज़ह से है.

आज अगर कोई व्यक्ति अपने बेटे या बेटी को किसी बड़े उस्ताद के पास ध्रुपद, ख़्याल, कत्थक या शास्त्रीय संगीत की किसी विधा को सिखाने ले जाए तो उसका परिवार और समाज ही उसके खिलाफ़ खड़ा हो जाता है.

क्योंकि लोगों का मानना है कि शास्त्रीय संगीत या नृत्य, जीवन यापन का ज़रिया नहीं बन सकता. लेकिन पहले ऐसा नहीं था. लोग इन विधाओं के लिए न सिर्फ समय निकालते थे, बल्कि इसे प्राथमिकता के आधार पर सीखते भी थे.

कला प्रेमियों की मुश्किल

चौबीस घंटे की आपाधापी और मनोरंजन उद्योग जगत के चक्कर में हमने इन पारंपरिक शास्त्रीय विधाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है. हमारा नज़रिया आज व्यापारिक हो गया है.

आज हमारे पास हर चीज़ के लिए समय है. लेकिन शास्त्रीय विधाओं के लिए नहीं. दूसरी बात यह भी है कि अगर कोई व्यक्ति ख़्याल, बंदिश या फिर ध्रुपद सुनना चाहे तो वह कहां जाएगा?

दूरदर्शन के चैनल पर तो पुरानी आर्काइवल रिकार्डिंग दिख जाती है, आकाशवाणी पर भी ये कलाकार सुनाई दे जाते हैं. लेकिन बाकी चैनलों पर कुछ नहीं दिखता.

दुर्भाग्य की बात यह है कि जब किसी बड़े उस्ताद का निधन हो जाता है या फिर उसे पद्म भूषण या पद्म श्री जैसे सम्मान मिलते हैं तो ये कलाकार पल भर के लिए प्रासंगिक हो जाते हैं.

एक शुद्ध कलाकार हमेशा अपनी कला के शिखर पर पहुंचना चाहता है. ऐसे ही थे फ़रीदुद्दीन डागर साहब, जिन्होंने देश-विदेश में ध्रुपद गायन कला के विकास के साथ-साथ उसे अगली पीढ़ी के लिए संजोया भी.

(बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा से बातचीत पर आधारित)

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