जब भारतीय उपराष्ट्रपति ने माओ के गाल थपथपाए

चीन के नेता माओ के बारे में मशहूर था कि उनका दिन रात में शुरू होता था. वह लगभग पूरी रात काम किया करते थे और सुबह तड़के सोने के लिए जाते थे.

1956 में जब लोकसभा अध्यक्ष आयंगर के नेतृत्व में भारत का संसदीय प्रतिनिधिमंडल चीन पहुँचा तो उन्हें एक रात साढ़े दस बजे बताया गया कि चेयरमेन माओ उनसे रात 12 बजे मुलाकात करेंगे.

माओ ने एक एक करके सभी सांसदों से हाथ मिलाया. शुरू में माओ मूड में नहीं थे और एक दो लफ़्ज़ों में आयंगर के सवालों के जवाब दे रहे थे. लेकिन थोड़ी देर बाद वह खुल गए.

( सीमा विवाद के बाद चीनी प्रधानमंत्री भारत में)

आयंगर ने जब कहा कि आज़ादी के बाद का भारत एक ढोल की तरह था जिसे रूस और अमरीका दोनों तरफ से बजाते रहते थे तो माओ ने ज़ोर का ठहाका लगाया.

पूरी बैठक के दौरान माओ एक के बाद एक सिगरेट जलाते रहे. जब वहाँ मौजूद भारतीय राजदूत आर के नेहरू ने भी अपने मुँह में सिगरेट लगाई तो माओ ने खड़े होकर खुद दियासलाई से उनकी सिगरेट जलाई. माओ के इस जेस्चर पर वहाँ मौजूद भारतीय सांसद और राजनयिक दंग रह गए.

थपथपा दिए गाल

Image caption भारत के उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने थपथपाए थे चीनी नेता माओ के गाल.

अगले साल जब भारत के उप राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन चीन आए तो माओ ने अपने निवास चुंग नान हाई के आंगन के बीचों बीच आकर उनकी अगवानी की. जैसे ही दोनों ने हाथ मिलाया राधाकृष्णन ने माओ के गाल को थपथपा दिए.

इससे पहले कि वह अपने गुस्से या आश्चर्य का इज़हार कर पाते भारत के उप राष्ट्रपति ने ज़बरदस्त पंच लाइन कही, “अध्यक्ष महोदय, परेशान मत होइए. मैंने यही स्टालिन और पोप के साथ भी किया है.”

भारत के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह उस समय चीन में तैनात थे और उन्होंने मुझे बताया कि इस मुलाकात के समय वहाँ मौजूद थे.

भोज के दौरान माओ ने खाते-खाते बहुत मासूमियत से चॉपस्टिक से अपनी प्लेट से खाने का एक कौर उठा कर राधाकृष्णन की प्लेट में रख दिया. माओ को इसका अंदाज़ा ही नहीं था कि राधाकृष्णन पक्के शाकाहारी हैं. राधाकृष्णन ने भी माओ को यह आभास नहीं होने दिया कि उन्होंने कोई नागवार चीज की है.

उस समय राधाकृष्णन की उंगली में चोट लगी हुई थी. चीन की यात्रा से पहले कंबोडिया के दौरे के दौरान उनके एडीसी की ग़लती की वजह से उनका हाथ कार के दरवाज़े के बीच आ गया था और उनकी उंगली की हड्डी टूट गई थी. माओ ने इसे देखते ही तुरंत अपना डॉक्टर बुलवाया और उसने नए सिरे से उनकी मलहम पट्टी की.

चाउ एन लाई की कार

1960 में जब चाउ एन लाई भारत आए तब तक भारत और चीन के संबंध बहुत खराब हो चुके थे. जब पालम हवाई अड्डे पर जवाहरलाल नेहरू ने चाउ एन लाई से हाथ मिलाया तो उसमें पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रह गई थी.

Image caption 1960 में चीनी नेता चाउ एन लाई भारत आए थे.

दलाई लामा को भारत के शरण देने को चीन पचा नहीं पा रहा था. दोनों करिश्माई नेता एक दूसरे के प्रति शिष्ट होने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन हालात इसके खिलाफ थे. चाउ एन लाई की गोविंद वल्लभ पंत और मोरारजी देसाई के साथ मुलाकातें भी विफल साबित हुईं.

इसी यात्रा के दौरान जब चाउ एन लाई चीनी दूतावास के भोज के बाद राष्ट्रपति भवन लौट रहे थे तो राजपथ पर इंडिया गेट के आगे उनकी कार खराब हो गई. चाउ एन लाई पर इसका कोई असर नहीं हुआ लेकिन उनके पीछे चल रहे उनके सुरक्षाकर्मी ज़रूर परेशान हो गए. चाउ एन लाई ने उस खराब कार में बैठ कर दूसरी कार के आने का बहुत संयम से इंतज़ार किया.

चाउ की कार में उनके साथ बैठे नटवर सिंह और रामनाथ काव (भारतीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ के बाद में बने पहले निदेशक) इससे काफ़ी शर्मिंदा हुए. 1964 में जब नेहरू का निधन हुआ तो चाउ एन लाई शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास गए.

हस्ताक्षर करने के बाद जब चाउ अपनी कार में बैठने लगे तो उन्होंने भारत के सहायक राजदूत जगत मेहता से कहा, “नेहरू एक महान इंसान थे और मेरे अच्छे दोस्त भी.”

वॉकआउट

Image caption 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया था.

1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद चीन के राष्ट्रीय दिवस के मौके पर वहाँ के विदेश मंत्रालय ने एक राजकीय भोज का आयोजन किया जिसमें माओ भी मौजूद थे.

इस मौके पर दिए गए भाषण में पाकिस्तान पर भारत को आक्रामक बताया गया. भोज में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे जगत मेहता की मेज के सामने जानबूझ कर इस भाषण का अंग्रेज़ी अनुवाद नहीं रखा गया ताकि वह इस भाषण को समझ न सकें. उन्होंने अपने बगल में बैठे स्विस राजदूत के सामने फ्रेंच भाषा में रखा भाषण पढ़ा और भोज से तुरंत वॉक आउट करने का फैसला किया.

चीनियों ने इसे अपने सर्वोच्च नेता का सबसे बड़ा अपमान माना. बाहर निकलने पर जगत मेहता की कार को वहाँ नहीं पहुँचने दिया गया और वह और उनकी पत्नी रमा आधे घंटे तक नेशनल पीपुल्स हॉल की सीढ़ियों पर कड़कड़ाती सर्दी में ठिठुरते रहे.

वो लंबा हैंड शेक

1970 में मई दिवस के मौक़े पर बीजिंग स्थित सभी दूतावासों के प्रमुखों को तियानानमेन स्क्वेयर की प्राचीर पर बुलाया गया. चेयरमैन माओ भी वहाँ मौजूद थे.

Image caption 1962 में हुई लड़ाई के बाद ब्रजेश मिश्र राजनयिक के रूप में बीजिंग में तैनात थे.

राजदूतों की कतार में सबसे आखिर में खड़े ब्रजेश मिश्र के पास पहुँच कर उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति गिरि और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मेरा अभिवादन पहुँचा दीजिए.” वो थोड़ा रुके और फिर बोले, “हम आखिर कब तक इस तरह लड़ते रहेंगे ?”

इसके बाद माओ ने अपनी प्रसिद्ध मुस्कान बिखेरी और ब्रजेश मिश्र से पूरे एक मिनट तक हाथ मिलाते रहे. यह चीन की तरफ से पहला संकेत था कि वह पुरानी बातें भूलने के लिए तैयार है.

राजीव और देंग

1988 में ठीक इसी अंदाज़ में देंग ज़ियाओ पिंग ने भी राजीव गांधी का स्वागत किया. उनके पहले शब्द थे, “मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ मेरे युवा दोस्त.यह तुम्हारी चीन की पहली यात्रा है.”

देंग ने राजीव के साथ हाथ मिलाना शुरू किया तो उसने ख़त्म होने का नाम ही नहीं लिया. यह एक संकेत था कि देंग चाहते थे कि राजीव की चीन यात्रा सफल हो. अन्य देशों की तुलना में चीन में संकेत काफी महत्व रखते हैं. डेंग बोले, “1954 में जब आपके नाना और माँ चीन आए थे, तो मैं उनसे मिला था. उस समय मैं अपनी पार्टी का महासचिव हुआ करता था.”

Image caption 1988 में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की यात्रा पर गए थे.

भारत और दुनिया के तमाम संवाददाता देंग ज़ियाओ पिंग के मुँह से निकले एक-एक शब्द को ध्यान से सुन रहे थे. दशकों की दुश्मनी दोस्ती में बदल रही थी. वहाँ मौजूद सभी लोग अपनी आँखों के सामने इतिहास बनते देख रहे थे. बातचीत के दौरान देंग ने राजीव से कहा कि वह उनकी दुगनी उम्र के हैं.

इस पर राजीव बोले कि शायद यह कहना बेहतर होगा कि वह उनसे चालीस साल बड़े हैं. राजीव ने फिर उन्हें एक मज़ेदार किस्सा सुनाया. कुछ दिनों पहले जब उत्तरी कोरिया के एक मंत्री उनसे मिलने आए तो उन्होंने उन्हें तोहफ़े में यह कहते हुए जिनसेंग दिया कि इसके इस्तेमाल से उनकी उम्र चालीस साल कम हो जाएगी.

राजीव ने उत्तरी कोरियाई मंत्री को हंसते हुए जवाब दिया कि इससे तो उनकी मुसीबतें कहीं बढ़ जाएंगी (उस समय राजीव की उम्र 43 साल थी.) देंग इस किस्से पर खूब हंसे फिर गंभीर होते हुए उन्हें सलाह दी कि उन्हें उन युवा लोगों से मिलना चाहिए जो इस समय चीन को चला रहे हैं.

उनका इशारा ज़ाओ ज़ियांग और ली फंग की तरफ था. शायद इतिहास उस समय अपने आप को दोहरा रहा था. 1971 में माओ ने भी अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन से करीब-करीब यही कहा था, “बातचीत? इसके लिए तो आपको हमारे प्रधानमंत्री के पास जाना पड़ेगा. मुझसे तो आप सिर्फ दार्शनिक मुद्दों पर बात कर सकते हैं.”

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