भारत-चीन: क्या सीमा विवाद से आगे बढ़ेगी गाड़ी?

चीन के प्रधानमंत्री ली कचीयांग तीन दिन के दौरे पर भारत पहुंच गए हैं. दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के इतिहास और हाल ही में लद्दाख में चीन के घुसपैठ को देखते हुए प्रधानमंत्री ली की ये यात्रा बेहद महत्वपूर्ण है.

चीन में इसी साल मार्च में सत्ता परिवर्तन हुआ है और शी जिनपिंग देश के राष्ट्रपति और ली कचीयांग प्रधानमंत्री चुने गए हैं. इन दोनों नेताओं ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद की है.

इसलिए कूटनीति के ख्याल से उनपर इस युद्ध के कड़वे अनुभवों का बोझ नहीं है. लेकिन ये भी सच है कि 1962 के युद्ध के बाद से दोनों देशों के आपसी संबंध बहुत समतल धरातल पर नहीं चले हैं.

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर चीन की सैन्य गतिविधियां और समय-समय पर घुसपैठ की घटनाएं होती रही हैं.

चीन से तिब्बत की आज़ादी का आंदोलन चला रहे दलाई लामा को राजनीतिक शरण और तिब्बतियों के विरोध आंदोलन को मूक समर्थन देने की भारतीय नीति को चीन पसंद नहीं करता.

विवाद के मुद्दे

चीन से भारत में आने वाली ब्रह्मपुत्र नदी के पानी के बहाव को कथित रूप से नियंत्रित कर चीन अक्सर विवाद को बढ़ावा देता रहा है.

हाल ही में लद्दाख में चीनी घुसपैठ की घटना ने दोनों देशों के बीच के संबंधों को कई हफ्ते तक गर्माए रखा.

सीमा पर घुसपैठ और सैन्य गतिविधियों के ऐसे दबावपूर्ण माहौल में ये सवाल उठना लाज़मी है कि क्या भारत और चीन कभी अपने सीमा विवाद को परे रखकर आगे बढ़ना चाहेंगे.

Image caption चीनी प्रधानमंत्री ली के स्वागत में लगे दोनों देशों के झंडे

रक्षा मामलों के विशेषज्ञ राहुल बेदी कहते हैं कि भारत के साथ संबंधों में चीन की नीति दबाव के साथ मधुरता के अभिनय की रही है.

"चीन बहुत ही समझदार और गहराई वाला मुल्क है. वो सीधे-सीधे लड़ाई में यकीन नहीं करता. पिछले दस साल में उसने जो अपना सैन्य विकास किया है उसमें उसकी नीति दूर से ही दुश्मन को नियंत्रित करने की रही है और सीमा पर गतिविधि बढ़ाने के लीवर का इस्तेमाल वो केवल भारत को चौकान्ना रखने के लिए करता रहा है."

साथ ही चीन भारत के पड़ोसी देशों में भी अपना प्रभाव बढ़ा रहा है जिसे विशेषज्ञ एक बड़ा ख़तरा मानते हैं.

रक्षा विशेषज्ञ कोमोडोर उदय भास्कर कहते हैं, "पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह हो, या श्रीलंका का हम्बंटोटा या बर्मा में चीन ने जिस प्रकार निवेश किया है, बांग्लादेश में जिस तरह अपना प्रभाव बढ़ाया है उससे भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं."

पाकिस्तान के साथ चीन के रिश्ते सर्वकालिक दोस्ती के रहे हैं. पाकिस्तान को वो आर्थिक मदद देने के साथ-साथ सैन्य मदद भी करता है.

लेकिन भारत के साथ अमरीका के बेहतर होते संबंध और ईरान के चाबहार बंदरगाह को चलाने के लिए भारत ने उसके साथ जो 10 लाख डॉलर का समझौता किया है उससे चीन की चिंताएं भी बढ़ी हैं.

रक्षा तैयारी

राहुल बेदी सीमा पर भारत की सैन्य सक्रियता के बारे में कहते हैं, "भारत ने चीन से सटी सीमा पर और लद्दाख में आठ लैंडिंग ग्राउंड विकसित की है. हिंदुस्तान सीमा पर 70,000 सैनिकों का माउंटेन स्ट्राइकिंग कोर खड़ा कर रहा है. तो भारत की तरफ से हो रहे सैन्यीकरण की वजह से भी चीन की चिंताएं बढ़ गई हैं."

लब्बोलुवाब ये है कि सीमा पर सैन्य गतिविधियों और एशियाई क्षेत्र में अपने प्रभाव विस्तार को देखते हुए दोनों देश एक-दूसरे को शक की नज़रों से देखते रहे हैं.

ऐसे में प्रधानमंत्री ली कचीयांग के दौरे का फलितार्थ क्या होगा? क्या संबंध और तनावपूर्ण होंगे या ऐसे दौरों से रिश्तों की कड़वाहट कम होगी और दोनों देश सहयोग के दूसरे बिन्दुओं पर ध्यान केंद्रीत करेंगे?

Image caption तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा का चीन पिछले 50 साल से विरोध कर रहा है.

कोमोडोर उदय भास्कर कहते हैं कि पंचशील के बाद चीन ने जब भारत पर हमला कर दिया तो दोनों देशों के बीच अविश्वास की एक गहरी खाई पैदा हुई.

लेकिन युद्ध के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर समझौते के बाद से दोनों देशों ने विवाद के मुद्दों को भरसक हाशिए पर रखकर सहयोग के धरातल की खोज करने की कोशिश की है.

लेकिन भरोसा इतना कभी नहीं बन पाया कि सीमा पर सैनिक शक्ति बढ़ाने की रणनीतिक मजबूरी को नज़रअंदाज़ कर वो कोई आपसी सहयोग की दिशा में दिल खोल कर आगे बढ़ सकें, लेकिन कोशिश लगातार जारी रही है.

कोमोडोर उदय भास्कर कहते हैं, "चीन और भारत दोनों ही देशों ने अपने सीमा विवाद को अलग रखकर व्यापार को बढ़ाने की कोशिश की है. मुझे उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार जल्दी ही 100 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा. लेकिन भारत की तरफ से ये व्यापारिक संबंध बहुत असंतुलित है. लेकिन मेरा व्यक्तिगत मानना है कि दोनों देशों के बीच ये व्यापार-वाणिज्य, निवेश और आधारभूत संरचना जैसे जो आर्थिक मामले हैं उन्हें जितना आगे बढ़ाया जा सकता था, बढ़ा लिया गया है. जब तक राजनैतिक, सामरिक और सुरक्षा के मामलों पर किसी प्रकार का हल नहीं होगा और संतुलन नहीं होगा तब तक आर्थिक हितों को और आगे बढ़ाना संभव नहीं हो सकेगा."

हासिल क्या होगा?

तो फिर ऐसे में प्रधानमंत्री ली कचीयांग के दौरे से हासिल क्या होगा? इसके बारे में रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी कहते हैं कि इस दौरे का प्रतीकात्मक महत्व ज्यादा है, हासिल बहुत कुछ नहीं होना है.

Image caption 1962 में चीन ने पंचशील के सिद्धांतों का उल्लंघन कर भारत पर हमला कर दिया था.

वो कहते हैं, "चीन भारत आकर मीठी-मीठी बातें करेगा, ऊंची-ऊंची बातें करेगा. भारत भी उसी तर्ज़ पर जवाब देगा क्योंकि भारत की प्रतिक्रिया चीन प्रेरित है. चीन एजेंडा तय करता है और भारत उसका अनुसरण करता है. भारत अपनी बातें बहुत कम आगे बढ़ाता है."

इसकी वजह बताते हुए राहुल बेदी कहते हैं, "भारत चीन से संबंधों के मामले में घबराता है क्योंकि उसके सामने 1962 की लड़ाई का उदाहरण है. दूसरी बात ये कि चीन और भारत की आर्थिक, रक्षा और कूटनीतिक क्षमता में ज़मीन-आसमान का अंतर है. इसलिए प्रधानमंत्री ली की भारत यात्रा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रस्तावित चीन यात्रा के बारे में पॉस्चरिंग के तहत कहा यही जाएगा कि भारत और चीन के संबंध आगे बढ़ गए हैं. लेकिन हक़ीक़त ये है कि दोनों देशों के बीच तनाव और सहयोग के छद्म का जो माहौल है वो चलता ही जाएगा."

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