कोलकाता के 'भद्रलोक' का ममता से मोहभंग क्यों

  • 21 मई 2013
कलकत्ता
Image caption कुछ बुद्धिजीवियों के अनुसार ममता ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है

दिन 29 दिसंबर साल 1997. जगह कोलकाता का श्यामबाजार. उस दिन वहां तिल धरने को जगह नहीं थी. तृणमूल कांग्रेस का जन्म हो रहा था. जोश और ख़ुशी से माहौल था. सिर्फ सियासत के नहीं, बल्कि साहित्य, कला, थियेटर के कई नामी लोग बहुत उम्मीद और उत्साह से ममता के साथ थे.

पार्क स्ट्रीट के एक बुज़ुर्ग नागरिक अनिक चट्टोपाध्याय वहां मौजूद थे. "कोलकाता में उस दिन एक आंदोलन का माहौल था. पूरे राज्य से कांग्रेस के छोटे-बड़े नेता आ धमके थे. ममता 'दीदी' के कांग्रेस पार्टी से अलग हो कर नयी पार्टी की स्थापना के ऐलान से लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी थी"

उन्होंने उसी तरह का जश्न वाला माहौल दो साल पहले 20 मई के दिन भी देखा जब ममता बनर्जी की पार्टी ने वामपंथी मोर्चे को सत्ता से उखाड़ फेंक कर राज्य के प्रशासन की बाग डोर संभाली थी. "हम सब पिछली सरकार के गुंडों से तंग आ गए थे. उम्मीद की एक किरन फूट पड़ी थी. लगता था अब गुंडाराज ख़त्म हो जाएगा".

( ममता बनर्जी का सियासी सफरनामा)

दो साल बाद अनिक के अनुसार ममता सरकार ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. "गुंडाराज वापस आ गया है बल्कि कहिये कि वही गुंडे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं". अनिक इतने डरे थे कि उन्होंने अपनी तस्वीरें उतरवाने से साफ़ मना कर दिया.

साथ क्यो छोड़ गए बुद्धिजीवी

Image caption फ़ेसबुक पर कुछ माखौल उड़ाते पन्नों के खिलाफ़ तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने कार्रवाई की है.

दो साल पहले ममता बनर्जी की भारी जीत के उस जश्न में शामिल बहुतेरे लोग उनका साथ छोड़ चुके है, कई उनमें से नामीगिरामी भी हैं.

कबीर सुमन तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने. वे बांग्ला के मशहूर गायक हैं. आज वे इस कदर बागी हो गये हैं, कि उनके गीत भी ममता बनर्जी के खिलाफ परचम उठा रहे हैं. उन्होंने बाकायदा मुहिम छेड़ रखी है. कबीर सुमन को मायूसी इस बात से है कि ममता बनर्जी सरकार में कुछ लोग भ्रष्ट हैं, मगर ममता उनके खिलाफ क़दम नहीं उठा रही है.

( ममता पर भरोसा, साथियों पर नहीं)

थिएटर अभिनेता कौशिक सेन भी पहले मुख्यमंत्री के साथ थे. अब उनसे काफी मायूस हो गए हैं. "दो साल में हमें कोई चमत्कार की आशा नहीं थी लेकिन ममता बनर्जी की तुनक मिजाजी और उनके ग़लत दावों से हम हैरान हैं." हाल में पार्क स्ट्रीट में चलती गाड़ी में बलात्कार कांड का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, "हम इस बलात्कार का ज़िम्मेदार सरकार को नहीं ठहरा रहे थे. हम सिर्फ ये चाहते थे कि पुलिस अपनी कार्रवाई ढंग से करे. लेकिन ममता बनर्जी ने हम बुद्धिजीवियों पर लोगों को भड़काने का इलज़ाम लगाया और इस बलात्कार के मामले को ये कह कर सियासी रंग दे दिया कि ये उनकी सरकार के खिलाफ एक साजिश है"

ममता है 'कंगाल'

कांग्रेस पार्टी के नेता और प्रसिद्ध वकील अरुणाभ घोष का कहना है, "ममता बनर्जी के पास दिमाग नहीं." घोष कहते हैं ममता बनर्जी 'ऊंचे विचारों से महरूम हैं'.

Image caption घोष एक समय में ममता की ही पार्टी के विधायक होते थे

लेकिन घोष एक समय में उनकी पार्टी के विधायक होते थे और उनके करीबी साथियों में से एक थे. तब उन्हें ममता बनर्जी में ये बुराइयाँ क्यूँ नहीं नज़र आती थीं? "हम उन से बहुत बहस करते थे. उनके ग़लत विचारों और पालिसी का विरोध करते थे लेकिन अब उनके निकट सारे 'येस मैन रह गए हैं"

लेखक महाश्वेता देवी, फिल्म मेकर मृणाल सेन, विश्वविद्यालयों के ढेर सारे प्रोफ़ेसर जो कभी ममता बनर्जी के साथ थे अब उन से ने केवल अलग हो गए हैं बल्कि उनके खिलाफ आवाज़ भी उठा रहे हैं.

( कैसा रहा ममता के बंगाल का एक साल)

लेकिन ऐसा भी नहीं कि राज्य के सारे बुद्धिजीवी ममता बनर्जी से को अलविदा कह रहे हैं. कौशिक सेन कहते हैं, "अब समस्या ये है कि बुद्धिजीवियों को दोबारा एक प्लेटफार्म पर लाना कठिन साबित हो रहा है. ये गुट विभाजित हो कर रह गया है. कई लोग अभी ममता बनर्जी के साथ हैं"

उनके समर्थन में बोलने वालों में जगमय देवी कॉलेज की प्रिंसिपल गार्गी नाथ कहती हैं कि दो साल का समय बहुत कम है पिछली सरकार की ढेर सारी ग़लतियों को सुधारने के लिए. "उन्हें समय चाहिए. पिछली सरकार को 34 साल दिए इस सरकार को पांच साल तो दो."

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