पश्चिम बंगाल: दादागीरी के बदले अब दीदीगीरी?

  • 22 मई 2013
Image caption ममता बनर्जी की सरकार पर दो साल के अंदर ही उठने लगे हैं सवाल

परिवर्तन. ममता बनर्जी ने दो साल पहले इस शब्द का प्रयोग पश्चिम बंगाल विधान सभा की चुनावी मुहिम में बार-बार किया था. जनता वामपंथी मोर्चे के 34 साल राज से तंग आ चुकी थी.

इस चुनावी मंत्र ने खूब काम किया और उन्होंने भारी बहुमत से सत्ता हासिल कर ली.

दो साल पहले हुए चुनाव के दौरान और इससे दो साल पहले हुए संसद के चुनाव में ममता बनर्जी ने ग्रामीण इलाकों में एक ज़बरदस्त नारा दिया था, ‘माँ, माटी और मानुष’ यानी माँ, मिट्टी और आम जनता.

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस नारे ने भी ममता बनर्जी को सत्ता में लाने में मदद की.

दो साल बाद कई लोग अब कह रहे हैं परिवर्तन का मतलब है 'अपरिवर्तन'.

'माँ, माटी और मानुष' का नारा अब उन्हीं के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जाने लगा है. लोग कह रहे हैं कि ममता की सरकार वामपंथी मोर्चे की सरकार की नकल है.

ममता सरकार या गुंडा राज

सॉल्टलेक सिटी के निवासी और पेशे से वकील हिमांशु सेन कहते हैं, "दो साल में कुछ भी नहीं बदला. ममता सरकार और पिछली सरकार में हमें कोई फर्क नहीं दिखाई देता."

स्थानीय कॉलेज की एक छात्रा सुदेषना घोष कहती हैं, “तृणमूल कांग्रेस एक व्यक्ति की जागीर है और वो हैं ममता बनर्जी. उनके ख़िलाफ़ बोलने का मतलब आप जेल भी जा सकते हैं, पिछली सरकार में होती थी दादागीरी और इस सरकार में हो रहा है दीदीगीरी. दोनों में कोई फर्क नहीं."

मैं पिछले हफ्ते एक मंत्री के दफ्तर में जलपाईगुड़ी से आए एक नौजवान और उसके पिता से मिला. मंत्री व्यस्त थे. हमने बाप-बेटे से पूछा कि ममता सरकार पिछली सरकार से कितनी अलग है? कोई परिवर्तन देखा? दोनों एक साथ बोले, “इस सरकार में भी गुंडा राज है और उस सरकार में भी था.”

मैंने कहा आप मंत्री से मिलने आए हैं. आपको डर नहीं लगता इस तरह खुलकर सरकार की आलोचना करने से?

बेटे ने कहा, "डर पहले भी लगता था नई सरकार के राज में भी लगता है.”

उसके पिता ने कहा, "भ्रष्टाचार पहले भी आम था और आज भी आम है."

इस तरह के विचार कई जगह सुनने को मिले. बल्कि इससे भी तीखी प्रतिक्रियाएं सुनने को मिलीं.

'सबसे ख़राब सरकार'

अम्बिकेश महापात्रा जाधवपुर विश्वविद्यालय के एक शिक्षक हैं. इन्हें पिछले साल पुलिस ने ममता बनर्जी के कुछ कार्टून अपने दोस्तों को ईमेल करने के इल्ज़ाम में गिरफ्तार कर लिया था. उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा आज भी चल रहा है.

वो कहते हैं, "ये सरकार पिछली सरकार से भी ख़राब है. बल्कि ये पश्चिम बंगाल में अब तक की सब से ख़राब सरकार है."

थिएटर अभिनेता कौशिक सेन भी इसी तरह के विचार प्रकट करते हुए कहते हैं, "ये सरकार वामपंथी मोर्चे की तरह नहीं है बल्कि उससे भी ख़राब है. झूठे दावे, भ्रष्टाचार और तानाशाही से लोग बेजार हो चुके हैं."

ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ लोगों की ये भी शिकायत है कि वे अपनी पार्टी के अंदर भ्रष्ट नेताओं को सह रही हैं और पार्टी में भ्रष्टाचार को हटाने की कोशिश भी नहीं कर रही हैं.

प्रोफेसर महापात्रा कहते हैं, “वो ख़ुद ईमानदार हो सकती हैं, लेकिन उनके साथी नहीं.”

जयनगर गाँव की काश्तकार और शारदा चिटफंड घोटाले की पीड़ित मोनोबिना दत्त कहती हैं कि उनके गांव और आसपास के गांवों के जो लोग पहले वामपंथी मोर्चे में थे, अब तृणमूल कांग्रेस में आ गए हैं.

'ममता को वक्त मिले'

मोनोबिना दत्त कहती हैं, “इनमें से अधिकतर चिटफंड के एजेंट हैं और हम जब उनसे अपने पैसे मांगते हैं और वो हमें डराते धमकाते रहते हैं.”

लेकिन ममता बनर्जी के साथी और शहरी विकास मंत्री फ़िरहाद हकीम कहते हैं कि तृणमूल सरकार को पिछली सरकार से तुलना करना उचित नहीं होगा.

Image caption पश्चिम बंगाल के आम लोगों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं

हकीम कहते हैं, "लोगों का गुस्सा समझ में आता है लेकिन हमें पिछली सरकार की इतने सालों की गंदगी को हटाने में समय चाहिए. दो साल में आप हमारे खिलाफ मायूसी ज़ाहिर करें ये सही नहीं."

ममता बनर्जी के आलोचक भी ये मानते हैं कि उन्हें और समय चाहिए. प्रोफेसर महापात्र कहते हैं, "उनकी सरकार पांच सालों के लिए निर्वाचित हुई है उन्हें पांच साल मिलने चाहिए.”

कौशिक सेन भी उन्हें पांच साल देने को तैयार हैं अगर सरकार आलोचना को बर्दाश्त करे, भ्रष्टाचार को दूर करे और आम लोगों की ज़िन्दगी बेहतर बनाने में अधिक दिलचस्पी दिखाए.

ममता बनर्जी व्यक्तिगत रूप से आज भी बेदाग हैं और ग्रामीण इलाकों में दो साल बाद भी उन पर से लोगों का पूरी तरह से भरोसा नहीं उठा है. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं अब उनके पास अधिक समय नहीं है. उन्हें अपने ख़िलाफ़ उठ रही आवाज़ों को सुनने की जरूरत है.

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