क्या यूपी में चल पाएगा मोदी का करिश्मा?

Image caption भारतीय जनता पार्टी के अंदर मोदी का कद लगातार बढ़ रहा है

कर्नाटक चुनाव में धक्का खाने के बाद भाजपा तेजी से चुनाव के मोड में आ गई है. अगले महीने 8-9 जून को गोवा में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने जा रही है, जिसमें लगता है गिले-शिकवे होंगे और कुछ दृढ़ निश्चय.

मंगलवार को नरेन्द्र मोदी का संसदीय बोर्ड की बैठक में शामिल होना और उसके पहले लालकृष्ण आडवाणी के साथ मुलाकात करना काफी महत्वपूर्ण है. मोदी ने अपने ट्वीट में इस मुलाकात को ‘अद्भुत’ बताया है.

भारतीय जनता पार्टी किसी नेता को आगे करके चुनाव लड़ेगी भी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है. कर्नाटक के अनुभव ने इतना ज़रूर साफ किया है कि ऊपर के स्तर पर भ्रम की स्थिति पार्टी के लिए घातक होगी.

मोदी का बढ़ता कद

मोदी का संसदीय बोर्ड की बैठक में आना और खासतौर से अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया जाना इस बात की ओर इशारा कर ही रहा है कि मोदी का कद पार्टी के भीतर बढ़ा है.

उधर बिहार में 27 अक्तूबर को होने वाली हुंकार रैली में मोदी के जाने की घोषणा भी नीतीश कुमार के लिए कठोर संदेश है.

इस महीने के पहले हफ्ते में लालू यादव के एक दुर्घटना में चोटिल हो जाने के बाद नरेन्द्र मोदी का उनका हाल-चाल पूछना भी एक दूसरे प्रकार का संदेश है.

अमित शाह को अच्छा चुनाव प्रबंधक माना जाता है. पर उनका अब तक का अनुभव केवल गुजरात का है. यूपी गुजरात के मुकाबले बड़ा प्रदेश तो है ही, साथ में वहाँ नरेन्द्र मोदी के प्रति बेरुखी रखने वाला पार्टी संगठन भी है.

सन 2012 के विधानसभा चुनाव में मोदी को उत्तर प्रदेश में नहीं आने दिया गया था. उस पराजय के बाद ही नरेन्द्र मोदी का भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश हुआ था.

पिछले साल मुंबई में हुई पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में मोदी शामिल हुए और संजय जोशी हटाए गए थे.

अजनबी हैं अमित शाह

फिलहाल अमित शाह को सबसे पहले यहाँ अपने मित्र खोजने होंगे. इसलिए उनके साथ तीन सहप्रभारी भी जोड़े गए हैं, ताकि उन्हें कामकाज में दिक्कत पेश न आए.

इनमें बिहार के पूर्व विधायक मोदी-समर्थक रामेश्वर चौरसिया, उत्तराखंड के त्रिवेंद्र सिंह रावत और सत्येंद्र सिंह कुशवाहा हैं.

कंग्रेस हो या बीजेपी दोनों जानते हैं कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश होकर जाता है. यहाँ की 80 सीटों पर किसी भी दावेदार की निगाहें होनी चाहिए.

यूपी में भाजपा कमज़ोर हो चुकी है, पर उसके कई वरिष्ठ नेताओं का दखल वहाँ है.

Image caption मोदी के करीबी अमित शाह को सौंपा गया है उत्तर प्रदेश का प्रभार

मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र, लाल जी टंडन जैसे वरिष्ठ नेताओं से लेकर विनय कटियार, लक्ष्मी कान्त वाजपेयी और वरुण गांधी तक सब यहाँ प्रभावशाली हैं. पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का भी यह अपना राज्य है. यह उनकी ताकत से ज्यादा कमज़ोरी है.

नेताओं की कमी नहीं

नेताओं की बहुतायत भ्रम पैदा करती है. प्रदेश में यह पार्टी धड़ेबाजी की शिकार है और वैचारिक फोकस भी साफ नहीं है. पार्टी को अपनी छवि में बड़ा बदलाव करना होगा और कोई बड़ा जोखिम भी मोल लेना होगा.

अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी यों ही नहीं बनाया गया होगा. इसके पीछे नरेन्द्र मोदी का हाथ है. और इससे यह भी साफ है कि नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं या नहीं, यह सवाल अब भी खुला है.

हो सकता है कि वे अटल बिहारी वाजपेयी की लखनऊ सीट से लड़ें या गुजरात की किसी सीट से या हो सकता है कि वे लोकसभा चुनाव लड़ें ही नहीं. वस्तुतः अनेक बातें चुनाव के बाद तय होंगी. इसमें भावी गठबंधन और भावी नेता शामिल हैं.

किसके लिए है ख़तरा

जैसा कि कांग्रेस के लिए उचित है उसने अमित शाह के बहाने मोदी और भाजपा पर हमला बोला है. कांग्रेस विधान मंडल दल के पूर्व नेता प्रमोद तिवारी और प्रदेश की पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर रीता बहुगुणा जोशी ने कहा कि शाह को प्रभारी बनाना उत्तर प्रदेश के लिए खतरे की घंटी है.

इससे सांप्रदायिकता बढ़ेगी और इसका नुकसान भाजपा को उठाना होगा. कांग्रेस कहीं इसे अपने लिए खतरे की घंटी तो नहीं मान रही है?

नफा-नुकसान देखना पार्टी का काम है, पर संभव है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का पहला विरोध पार्टी के भीतर से हो. विरोध न भी हो तो उन्हें अपने अनुकूल माहौल बनाना होगा.

मोदी के उदय के पहले ही कुछ इस किस्म के सवाल अचानक हवा में उछले हैं :-

  • क्या मोदी हिंसक-हिन्दुत्व का एजेंडा लेकर आ रहे हैं?
  • क्या भाजपा रामलला का फॉर्मूला फिर से लागू करेगी?
  • क्या मोदी के उत्तर प्रदेश प्रवेश से मुसलमान वोटर एकमुश्त वोट देंगे?
  • मुसलमान वोटर एक ओर जाएगा तो क्या हिन्दू वोट किसी दूसरी ओर जाएगा?

सवर्ण वोट बैंक

Image caption हिंदू मतदाताओं के बीच मोदी ट्रंप कार्ड साबित हो सकते हैं

उत्तर प्रदेश का सवर्ण वोटर भी वोट बैंक में तब्दील हो गया है. इसका उदाहरण है हाल में ब्राह्मणों को लुभाने के लिए हुए सम्मेलन. मायावती की पार्टी ने भी ब्राह्मणों और ठाकुरों के ऐसे ही सम्मेलन किए थे.

यह वोटर भाजपा के पास भी जा सकता है, पर यह वोटर चाहता क्या है? मंदिर या आर्थिक गतिविधियाँ?

पिछली 31 मार्च को भाजपा संसदीय बोर्ड में जिस दिन नरेन्द्र मोदी शामिल किए गए उसी दिन आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अहमदाबाद में अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने का सवाल फिर से उठाया.

इससे ऐसा लगता है कि मोदी को हिन्दुत्व के एजेंडा के साथ पेश किया जाएगा. पर उत्तर प्रदेश में यह प्रयोग लम्बे समय से फेल हो रहा है.

मोदी का सुशासन हिन्दू चाशनी से लिपटा ज़रूर है, पर वह शुद्ध हिन्दुत्व नहीं है. सन 2008 के नवम्बर में गुजरात के कई शहरों में अवैध ज़मीन पर बने मंदिरों को जब तोड़ा गया, तब मोदी के हिन्दुत्व पर सवाल भी उठे थे.

कुछ लोगों का कहना था कि मोदी अपनी सेक्युलर छवि बना रहे हैं. अभी तक मोदी कड़क प्रशासक की छवि बनाते आए हैं. इसमें दो राय नहीं कि भाजपा का मूलाधार हिन्दू वोटर है. वह वोटर मंदिर बनाने पर अड़ा होता तो भाजपा का पराभव क्यों होता?

क्या यूपी में सफलता संभव है?

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में भाजपा को सबसे ज्यादा 33.3 फीसदी वोट 1993 के चुनाव में मिले थे. जबकि सीटें 177 मिलीं. जबकि 1991 के चुनाव में 31.45 फीसदी वोट पर उसे 221 सीटें मिलीं थीं.

विधान सभा चुनाव में वोट शेयर के आधार पर भाजपा का सबसे खराब प्रदर्शन 2012 का था जब उसे 15 फीसदी वोट मिले. कांग्रेस को उस चुनाव में 11.65 फीसदी वोट मिले थे. सपा को 29 और बसपा को 26 फीसदी के आसपास वोट मिले थे.

लोकसभा चुनाव में भाजपा को सन 2004 में 22.2 और 2009 में 17.5 फीसदी वोट मिले थे. इस लिहाज से सन 2012 का चुनाव भाजपा के लिए बॉटम आउट था. यानी न्यूतम सीमा पर पहुँचना.

यूपी नहीं तो कुछ नहीं

भाजपा को दिल्ली की कुर्सी हासिल करनी है तो यूपी से ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करनी ही होंगी. यूपी में विफलता का मतलब है पूरे अभियान का विफल होना.

Image caption राजनाथ सिंह का घरेलू राज्य है उत्तर प्रदेश. मोदी- राजनाथ की जोड़ी कमाल दिखा पाएगी?

यहाँ चार कोने का मुकाबला होने के कारण एक या दो फीसदी वोट ज्यादा हासिल होने से सारी कहानी बदल जाती है. भाजपा को यहाँ 20 से 25 फीसदी वोटों के सहारे कम से कम 20 से 30 सीटों का इंतज़ाम करना होगा.

अगला चुनाव किसी लहर पर नहीं होने वाला. ज्यादा से ज्यादा नकारात्मक चुनाव होगा.

प्रदेश के शहरी मध्य वर्ग को सुशासन, रोज़गार और आर्थिक गतिविधियों का भरोसा दिलाने वाली पार्टी सफल भी हो सकती है. पर यहाँ वोटर से ज्यादा पार्टी मायने रखती है.

क्या पार्टी संगठन इस काम के लिए तैयार है? इन सवालों के जवाब जल्द मिलने लगेंगे.

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