जेल में पैदा हुए बेटे ने दिलाई माँ को आज़ादी

  • 24 मई 2013

ढलती हुई शाम के धुंधलके के बीच एक उम्रदराज औरत कच्चे चूल्हे पर रात के खाने की तैयारी कर रही है. चूल्हे में लकड़ियों की आँच है और उस पर चढ़ी कड़ाही में रखा तेल गर्म हो चुका है.

वह कटी हुई भिंडियां कड़ाही में डाल देती है. चूल्हे से निकलते दम घोंटने वाले धुएं ने जिंदगी के 60 साल देख चुकीं विजय कुमारी की आँखें नम कर दी थीं.

लेकिन मालूम पड़ता था कि चूल्हे की आँच की उन्हें कोई फिक्र न थी और वे लगभग मगन भाव से खाना पका रही थीं.

अगर यह खाना उनके बेटे कन्हैया के लिए नहीं होता तो विजय कुमारी लखनऊ की उस महिला जेल की रसोई में अब भी खाना बना रही होतीं.

जहां उन्हें कोर्ट से जमानत मिल जाने के बावजूद गरीबी की वजह से अपनी जिंदगी के 19 साल गुजारने पड़े थे.

पांच महीने का गर्भ

अपना हाल सुनाती हुईं विजय कुमारी कहती हैं, "मैं एक अनपढ़ औरत हूं. मुझे नहीं पता कि मैं कब जेल भेजी गई थी लेकिन यह कोई 20 बरस पुरानी बात है."

विजय कुमारी को फिलहाल कानपुर के पुनर्वास केंद्र में सहारा मिला है.

उस पुनर्वास केंद्र के चेयरमैन एच रहमान बताते हैं कि 80 के दशक में विजय कुमारी अपने परिवार के साथ अलीगढ़ में रहा करती थीं.

वह कहते हैं, "उन्होंने जो दस्तावेज मुहैया कराये हैं, उसके मुताबिक उन पर अपने पड़ोसी के ढाई साल के बच्चे की हत्या का आरोप लगाया गया था. यह घटना 17 अक्टूबर 1989 की है. अलीगढ़ की एक निचली अदालत में मामले की सुनवाई पांच सालों तक चली और दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें लखनऊ जेल भेज दिया गया."

जेल जाने के वक्त विजय कुमारी पांच महीने के गर्भ से थीं.

मुचलके की रकम

उनके पति कांति प्रसाद ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से विजय कुमारी के लिए जमानत तो ले ली लेकिन अदालत में जमा कराने के लिए मुचलके का इंतजाम न कर सके.

कड़ी मेहनत के बाद कन्हैया अपनी माँ को जमानत दिला पाने में कामयाब हो पाए.

अमूमन गुमसुम सी रहने वाली विजय कुमारी यह पूछे जाने पर कि क्यों उनके पति या परिवार वाले उनके लिए मुचलके का इंतजाम नहीं कर पाए, थोड़ी तल्ख हो जाती हैं.

वह कहती हैं, "मेरे पति ने अदालत में कहा कि मुचलका जमा करने के लिहाज से वह बहुत गरीब आदमी है. और जैसे-जैसे दिन गुजरते गए मेरा परिवार आगे बढ़ता गया लेकिन मैं पूरी तरह से भुला दी गई."

इस बीच विजय कुमारी ने जेल में एक बेटे को जन्म दिया. उसके परिवार वालों की जिंदगी में भी बहुत कुछ होता रहा.

विजय बताती हैं, "कुत्ते के काटने की वजह से मेरे बड़े बेटे की मौत हो गई. मेरे पति ने दूसरी शादी कर ली. मेरी बेटी का ब्याह हो गया. किसी ने मुझे याद नहीं रखा."

विजय ने अपने बेटे का नाम कन्हैया रखा. हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म भी जेल में ही हुआ था. लेकिन वह नहीं चाहती थीं कि उनका बेटा भी जेल में बड़ा हो.

पुनर्वास केंद्र में शरण

कन्हैया जब चार साल का था तो विजय ने अपने बेटे को लखनऊ के बाल सुधार गृह भेज दिया. उसे उम्मीद थी कि एक दिन उसका बेटा उसे जेल से रिहा कराएगा.

कन्हैया पिछले साल 2012 जुलाई में 18 साल का हो गया और नियमों की वजह से उसे बाल सुधार गृह छोड़ना पड़ा.

इसके बाद कन्हैया को कानपुर में किशोर लड़कों के लिए चल रहे उत्तर प्रदेश रक्षा एवं पुनर्वास केंद्र में शरण मिली.

कन्हैया ने इस केंद्र में दर्जी का काम सीखा और उसे कानपुर के ही एक कारखाने में काम मिल गया. यह 2012 के अक्टूबर महीने की बात है.

पुनर्वास केंद्र के चेयरमैन रहमान बताते हैं, "उसने कड़ी मेहनत की ताकि वह पैसे इकठ्ठा कर अपनी माँ को आजाद करा सके."

दूसरी तरफ विजय कुमारी ने कहीं सुना कि अरविंद कुमार सिंह नाम के एक वकील ने जेल के अन्य कैदियों को जमानत दिलाने में मदद की थी.

विजय ने कन्हैया को एडवोकेट सिंह की मदद लेने के लिए कहा.

जमानत और रिहाई

अपनी उम्र से छोटे दिखने वाले कन्हैया थोड़ी तुतलाहट के साथ कहते हैं, "उनसे मिलने के लिए मैं कई बार इलाहाबाद गया. उन्होंने मदद का भरोसा भी दिया. जो थोड़े-बहुत पैसे मैंने कमाए थे, वह इलाहाबाद जाने में ही खर्च हो गए."

विजय कुमारी को जेल से रिहा होने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा.

आखिरकार चार मई को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विजय कुमारी को जमानत दे दी और उसे जेल से रिहा कर दिया गया. अदालत की पीठ ने मुचलके की रकम जमा करने से उसे राहत दे दी थी.

पुनर्वास केंद्र के वाइस चेयरमैन बीबीएल श्रीवास्तव कहते हैं, "अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से विजय कुमारी को वाजिब मुआवजा देने के लिए कहा है. कोर्ट ने सरकार से उन लोगों के बारे में एक रिपोर्ट देने के लिए भी कहा है जो जमानत मिल जाने के बावजूद भी जेल में दिन काट रहे हैं."

विजय कुमारी और कन्हैया ने कानपुर में बसने का फैसला किया है. वे उस पुनर्वास केंद्र पर लंबे समय तक नहीं रह सकते थे. कन्हैया ने रहने के लिए किराये पर एक जगह तलाश ली है.

कन्हैया कहते हैं, "मैंने कानपुर में रहने का तय किया है. मैं इस शहर में काम खोज सकता हूं."

जिंदगी से अपनी उम्मीदों के बारे में विजय कुमारी कहती हैं, "मैं कन्हैया को एक इज्जत की जिंदगी जीते हुए देखना चाहती हूं. उसके पिता ने भले ही उसे छोड़ दिया हो लेकिन मैं उसे अपनी पारिवारिक संपत्ति में अपना वाजिब हिस्सा लेते हुए देखना चाहती हूं."

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