‘स्पीड ब्रेकर के नाम से ही डर लगता है...’

Image caption संपत्ति के साथ दो बार स्पीड ब्रेकरों के कारण बड़ी दुर्घटनाएं हुई

चंद पैसे बचाने के लिए 58 वर्षीय संपत्ति हकीम ने टैक्सी के बजाय बस पकड़ कर रेलवे स्टेशन पहुंचने में समझदारी समझी.

लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि चंद पैसे बचाने के लिए उन्हें इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी.

बस अभी एक किलोमीटर भी नहीं चली थी कि ड्राइवर के सामने ऐसा स्पीड ब्रेकर आया जिसे पार करते हुए बस यूं उछली कि पीछे की सीट पर बैठी संपत्ति बस के अगले हिस्से में आकर गिरीं.

नतीजा ये कि उनकी रीढ़ की हड्डी पर कई फ्रैक्चर आए, जिसके बाद वे चार महीने तक बिस्तर पर लेटने को मजबूर हो गईं.

उस हादसे को याद करते हुए संपत्ति कहती हैं, “झटका ऐसा लगा कि मेरी कमर बिलकुल नहीं हिल पा रही थी. न तो मैं उठ पा रही थी और न ही बैठ पा रही थी. उस दुर्घटना के आठ महीने बाद भी मुझे उठने-बैठने में दिक्कत होती है. एक छोटे से स्पीड ब्रेकर ने इतनी भयानक तकलीफ दे डाली. अब तो स्पीड ब्रेकर सामने दिखते ही डर लगने लगता है.”

एक नहीं, दो हादसे

वैसे तो सड़कों पर स्पीड ब्रेकर इसलिए लगाए जाते हैं ताकि तेज़ गति से वाहन चला रहे ड्राइवर की गति धीमी की जा सके और दुर्घटना की आशंका कम की जा सके.

लेकिन संपत्ति के लिए स्पीड ब्रेकर जानलेवा से कम साबित नहीं हुए.

पढ़िए क्या है आदर्श स्पीड ब्रेकर

चौंकाने वाली बात ये है कि संपत्ति के साथ ये पहली दुर्घटना नहीं थी जो स्पीड ब्रेकर की वजह से हुई.

2011 में वे कलकत्ता में एक ऑटो में सवार थी कि एक स्पीड ब्रेकर पर ऑटो वाला अपना नियंत्रण खो बैठा.

झटका ऐसा लगा कि वे ऑटो से बाहर जाकर गिरीं और पीछे से आ रहा दूसरा वाहन उनके हाथ पर से गुज़र गया.

संपत्ति को लगा था कि वे अपना हाथ खो चुकी हैं, लेकिन डॉक्टरों ने बड़ी मशक्कत कर उन्हें बचा लिया.

संपत्ति जैसे कई मामले दिल्ली के ऑर्थोपेडिक डॉक्टरों के पास आते हैं, ख़ासतौर पर वो बूढ़े लोग जो बाइक या स्कूटर पर सफर करते हैं.

इंसान की कीमत

दिल्ली के जाने-माने ऑर्थोपेडिक डॉक्टर अनूप सरीन ने बताया, “कुछ लोग बस की सबसे पिछली सीट पर बैठने का ख़ामियाज़ा भुगतते हैं, तो कुछ बाइक या स्कूटर की पिछली सीट पर बैठने का. ज़्यादातर मामलों में रीढ़ की हड्डी को नुकसान पहुंचता है और कुछ मामलों में शरीर के निचले भाग में फ्रैक्चर आ जाता है. कुछ लोग स्पीड ब्रेकरों की वजह से ज़िंदगी भर बिस्तर के मोहताज हो जाते हैं.”

उनका कहना था कि भारत में सड़क सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जाता और सड़क पर चलने वाले लोगों की जान की कीमत बहुत कम है.

उन्होंने कहा, “दुखद बात ये है कि सड़क पर चलने वालों को चेतावनी देने के लिए कोई साइनबोर्ड भी नहीं लगे होते, जिसे देख कर वे गति कम कर लें.”

ऑर्थोपेडिक डॉक्टर परनामी ने बताया कि जिन लोगों को स्पीड ब्रेकर से झटका लगने से गरदन या रीढ़ की हड्डी में दिक्कत आती है, उनके लिए आमतौर पर ये ज़िंदगी भर का दर्द बन कर रह जाता है.

डॉक्टर सरीन के विचारों से इत्तेफाक रखते हुए डॉक्टर परनामी ने कहा, “विदेश में सड़क सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाता है, जबकि यहां स्थिति ऐसी नहीं है. यहां कहीं ऊंचे तो कहीं नीचे स्पीड ब्रेकर हैं, जिनका शिकार कोई भी हो सकता है. और फिर इनसे बचा भी तो नहीं जा सकता !”

यानी स्पीड ब्रेकरों से बचने का तरीका आपको खुद ही ढूंढना होगा...कम से कम तब तक, जब तक भारत में सुरक्षा मानकों को लागू नहीं किया जाता.

क्या आपके आसपास के इलाके में भी बनाए गए हैं कुछ ‘बेतुके’ कमर-तोड़ स्पीड ब्रेकर, जिनसे आपको परेशानी होती है? अगर हां तो हमें एक तस्वीर खींच कर भेजिए hindi.letters@bbc.co.uk पर. इसके अलावा आप हमारे फेसबुक पेज या ट्विटर पर भी तस्वीरें भेज सकते हैं.

(स्पीड ब्रेकरों की अगली कड़ी में पढ़िए – कौन सा बिज़नेस है जो स्पीड ब्रेकरों की बदौलत फल-फूल रहा है?)

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