इस बार क़िस्मत ने साथ नहीं दिया महेंद्र कर्मा का

Image caption महेंद्र कर्मा पर कई बार जानलेवा हमले हुए

वर्ष 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में जब दंतेवाडा से महेंद्र कर्मा की हार हुई तो वो उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा झटका था. कर्मा की दहाड़ खामोश होने लगी और आहिस्ता आहिस्ता सबने उनसे और सलवा जुडूम से पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया.

वो अपने दल में और खासतौर से बस्तर की राजनीति में अलग-थलग पड़ने लगे. सलवा जुडूम के शुरू होने से पहले और परवान चढ़ने के दौर में कर्मा को बस्तर के शेर के रूप में देखा जाता रहा.

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उनका राजनीतिक जीवन काफी उतार चढ़ाव से भरा रहा क्योंकि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी में रहकर आम आदिवासी, मजदूर, किसान, जंगल और ज़मीन के मुद्दों को लेकर संघर्ष करने वाले महेंद्र कर्मा पर कई संगीन आरोप लगने लगे.

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उन पर आरोप था कि उन्होंने आदिवासियों का संहार करवाया, आदिवासी समाज में नफरत घोली. कर्मा पर यह भी आरोप लगते रहे कि उनकी वजह से ही बड़े पैमाने पर बस्तर से आदिवासियों का पलायन शुरू हो गया.

अलग-थलग पड़ गए

सलवा जुडूम से जुड़े हथियारबंद विशेष पुलिस अधिकारियों के आतंक से महेंद्र कर्मा को आदिवासियों का एक बड़ा तबका खलनायक के रूप में भी देखने लगा था.

महेंद्र कर्मा ने 1990 के दशक में भी नक्सलियों के खिलाफ एक अभियान चलाया था जिसे 'जनजागरण अभियान' नाम दिया गया था.

कर्मा इन आरोपों का खंडन करते रहे कि उनकी वजह से बड़े पैमाने पर बस्तर के इलाके से आदिवासियों का पलायन शुरू किया और उन्होंने आदिवासियों को आपस में लडवाया.

उनका कहना था कि नक्सलियों की मुखालफ़त करने की वजह से ही उन पर ये आरोप लगते रहे हैं. वो कहते थे कि नक्सली अपनी विचारधारा से काफी दूर हो गए हैं और उन्होंने एक राजनीतिक आतंकवाद शुरू कर दिया है.

2008 के विधानसभा चुनाव से पहले तक जब वो विपक्ष के नेता थे तो उन्हें बस्तर का मुख्यमंत्री कहा जाता था. मगर विधानसभा के चुनाव में उनकी हार के बाद सबने उनसे और सलवा जुडूम से किनारा कर लिया. सबसे पहला साथ छोड़ा उनके अपने दल कांग्रेस ने.

बाद में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने भी अपने आप को सलवा जुडूम से अलग करना शुरू कर दिया.

'माओवादियों के दुश्मन'

सलवा जुडूम के शिविरों में रह रहे विशेष पुलिस अधिकारियों और शरणार्थियों को मिलने वाली सरकारी सुविधाएं एक-एक कर कम की जाने लगीं.

नौबत यहाँ तक आ पहुंची कि इन शिविरों में रह रहे आधे से ज्यादा लोग या तो वापस अपने गाँव लौट गए या फिर वापस माओवादियों के साथ जा मिले.

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सलवा जुडूम पूरी तरह ख़त्म हो गया.

मैंने एक बार साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा था कि अगर वो मानते हैं कि सलवा जुडूम लोकप्रिय अभियान है तो फिर वो चुनाव क्यों हारे. इस पर उन्होंने कहा था, "मुझे तो हारना ही था क्योंकि सबने मिलकर मुझे जान बूझकर हरवाया है."

महेंद्र कर्मा को माओवादी अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे क्योंकि वो उनकी विचारधार को चुनौती देते आ रहे थे. यही वजह है कि उन पर कई बार हमले हुए. माओवादियों के हमले में उनका एक बेटा भी मारा गया था.

पिछले साल नवंबर में भी उनका काफिला माओवादियों के बारूदी सुरंग के चपेट में आ गया था. मगर वो बाल बाल बच निकले थे. इस बार किस्मत नें उनका साथ नहीं दिया.

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