क्यों विकट होती जा रही है नक्सली समस्या?

  • 26 मई 2013

छत्तीसगढ़ में शनिवार को हुए हमले के बाद कई सवाल हवा में तैर रहे हैं. ये सवाल राजनीति, सुरक्षा और क़ानून व्यवस्था से जुड़े हुए हैं.

इनमें आरोप हैं, प्रत्यारोप है और नाराज़गी भी.

राजनीतिक दलों के नेता एक बार फिर 'लोकतंत्र पर हमले' का नारा उछाल रहे हैं. आमतौर पर ऐसे नारे किसी भी गंभीर सवाल को हल्का कर देते हैं.

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोगों के मन में एक धारणा बनी हुई है कि हमारे नेताओं ने लोकतंत्र को सत्ता हासिल करने का एक ज़रिया बना लिया है.

सवाल पूछे जा रहे हैं कि नेता मारे गए तो लोकतंत्र याद आया लेकिन जब सुरक्षाकर्मी मारे जाते हैं तब क्या लोकतंत्र ख़तरे में नहीं पड़ता?

सवाल यह भी है कि जिस बस्तर में 12 में से 11 विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत हुई हो, जहाँ कांग्रेस का सांसद न हो वहाँ कांग्रेस के नेताओं से नक्सलियों की इतनी नाराज़गी क्यों?

कांग्रेस तो पिछले दस बरसों से विपक्ष में बैठी हुई है फिर उससे नक्सलियों का ऐसा बैर?

महेंद्र कर्मा ज़रुर नक्सलियों के कट्टर दुश्मन रहे हैं लेकिन ये हमला सिर्फ़ कर्मा पर हुआ हमला नहीं है.

कुछ वरिष्ठ पत्रकार मानते हैं कि इन अवधारणाओं और सवालों के बावजूद इस बार ये नारा सच के क़रीब है.

इन हमलों को इस समय भले ही कांग्रेस नेताओं पर हमले के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन जो नक्सली सिद्धांतों और दुश्मन की उनकी परिभाषा से अवगत हैं वो जानते हैं कि ये सिर्फ़ संयोग हो सकता है कि हमले के शिकार हुए नेता कांग्रेस पार्टी के थे.

हो सकता था कि उनकी जगह भाजपा के नेता होते.

नक्सली आख़िरकार हर राजनीतिक दल को अपना दुश्मन ही मानते हैं. उनकी लोकतंत्र में बिलकुल आस्था नहीं है.

यही वजह है कि बस्तर में नक्सलियों ने भाजपा के वरिष्ठ सांसद बलीराम कश्यप के बेटे की हत्या की थी. इससे पहले पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू पर भी हमले हो चुके हैं.

सरकार विफल रही?

लेकिन 'लोकतंत्र पर हमले' के नारे के सच होने के बाद भी ये सवाल अहम है कि क्या ये राज्य सरकार की विफलता नहीं है?

इस सवाल का यही जवाब हो सकता कि ये राज्य की रमन सिंह सरकार की विफलता ही है, क्योंकि क़ानून व्यवस्था राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है.

राज्य सरकार की जिम्मेदारी तब और बढ़ जाती है जब प्रशासन की जानकारी में ये बात थी कि कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा बस्तर के संवेदनशील इलाक़ों में आयोजित हो रही है.

कांग्रेस के नेता ये सवाल पहले से ही उठा रहे थे कि जब रमन सिंह की विकास यात्रा अभूतपूर्व सुरक्षा में हो रही है तो परिवर्तन यात्रा के लिए सुरक्षा व्यवस्था शून्य क्यों है?

आश्चर्यजनक तथ्य है कि मुख्यमंत्री अपने पिछले कार्यकाल में नक्सलियों के सबसे बड़े दुश्मन दिख रहे थे. उसी मुख्यमंत्री ने अपने दूसरे कार्यकाल में नक्सली समस्या को एकाएक हाशिए पर डाल दिया.

रमन सिंह की विकास यात्राओं में न तो नक्सली समस्याओं का ज़िक्र है और न ही उनसे लड़ने के वादे.

वो अब विकास पुरुष बनने की आस लिए दिखते हैं. और लगातार नरेंद्र मोदी के बरक्स अपनी छवि चमकाने की कोशिश में रहते हैं.

रमन सिंह के कथित विकास का सच ये भी है कि उनके दो कार्यकाल के बाद भी बस्तर में विकास तो दूर उसके एक बड़े हिस्से में सुरक्षा बल तक का पहुँचना संभव नहीं हो पाया है.

नक्सली ख़ुद स्वीकार कर चुके हैं कि नक्सलियों के ख़िलाफ़ कथित स्वत:स्फ़ूर्त जनआंदोलन 'सलवा जुड़ूम' से सबसे ज़्यादा फ़ायदा नक्सलियों को ही हुआ.

ये भी अब ज़ाहिर हो चुका है वो दरअसल रमन सिंह सरकार का ही आंदोलन था.

आंकड़े बताते हैं कि इसका सबसे अधिक नुक़सान बस्तरवासी आदिवासियों को ही हुआ. कभी वो नक्सलियों के हाथों मारे गए तो कभी सुरक्षा बलों या एसपीओ के हाथों.

राष्ट्रपति शासन की मांग

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने शनिवार की रात ही आनन फ़ानन में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है.

ये मांग और नेताओं की तरफ़ से भी उठ रही है.

अब तक प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री के साथ उनकी कार में सफ़र करने को तैयार हो जाने वाले राज्यपाल शेखर दत्त भी अपनी रिपोर्ट के जरिए केंद्र सरकार से इसकी सिफ़ारिश कर सकते हैं.

हो सकता है कि परिभाषाओं के दायरे में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए ये उपयुक्त मामला भी हो.

लेकिन राष्ट्रपति शासन लगाने न लगाने की बहस के बाहर ये अब दीवारों पर लिखी इबारत है कि रमन सिंह सरकार का क्या होना है.

हो सकता है कि कांग्रेस को चार महीने के लिए राष्ट्रपति शासन की राह आसान लगे लेकिन रमन सिंह ने पहले से ही कांग्रेस की राह आसान करनी शुरु कर दी थी. और इस घटना ने तो उन कोशिशों पर मुहर लगा दी है.

ये श्रेय दिवंगत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल को दिया जाना चाहिए कि उन्होंने पिछले एक बरस में हताश कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सड़क पर निकलना सिखा दिया था.

इस घटना के बाद सड़क पर उतरे कार्यकर्ताओं को राजनीति का पाठ पढ़ाने की ज़रुरत नहीं बचेगी.

क्यों बढ़ रही है समस्या

कहाँ क्या खर्च हो रहा है इसका कोई हिसाब नहीं है. क्योंकि जहाँ कथित तौर पर खर्च हो रहा है वहाँ तो पुलिस तक नहीं जा पाती.

इस घटना से कांग्रेस के कार्यकर्ता कोई पाठ सीखें ना सीखें, रमन सिंह कुछ करें या न करें मगर ये सवाल एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है कि क्या राजनीतिज्ञों में नक्सली समस्या को हल करने की इच्छा शक्ति है?

ऐसी कौन सी वजहें हैं कि यह समस्या दशक दर दशक हल होने की बजाय और विकट होती जाती है?

नक्सल समस्या का हल नहीं निकलने के पीछे दो वजहें दिखती हैं. एक तो ये कि राजनीतिक दलों में इस बता पर सहमति ही नहीं है कि ये समस्या सामाजिक आर्थिक समस्या है या क़ानून व्यवस्था की.

इस सवाल पर पार्टियों के बीच भी विवाद है और पार्टियों के भीतर भी. जरूरी है कि इस पर एक न्यूनतम सहमति बने.

ऐसा होने से कम से कम आदिवासियों को राहत मिलेगी जो हर हाल में कट रहे हैं.

नक्सलवाद का अर्थशास्त्र

दूसरा सवाल इसके अर्थशास्त्र का है. नक्सल प्रभावित हर ज़िले को केंद्र और राज्य सरकार इतना पैसा देती है कि अगर उसे पूरी तरह खर्च किया जाए तो ज़िलों की तस्वीर बदल जाए.

लेकिन आश्चर्य है कि इतने पैसों के बावजूद बस्तर की बहुसंख्य आबादी बिना बिजली और शौचालय के रहती है. अस्पताल जाने के लिए मीलों चलती है और दवाओं के लिए नक्सलियों पर अभी भी निर्भर करती है.

कहाँ क्या खर्च हो रहा है, इसका कोई हिसाब नहीं. क्योंकि जहाँ पैसे कथित तौर पर खर्च हो रहे हैं वहाँ तो पुलिस भी नहीं जा पाती.

ज़ाहिर है कि ये पैसा नेता-अफ़सर और ठेकेदारों की तिकड़ी बाँट कर खा रही है.

इस पैसे में से एक बड़ा हिस्सा नक्सलियों को भी जाता है. हर अफ़सर उनको रंगदारी टैक्स की तरह पैसे देता है. यहाँ तक पुलिस के लोग भी उन्हें गोलियाँ आदि देते हैं.

नक्सली इलाक़ों के व्यापारियों से नक्सली भी पैसा वसूलते हैं और अफ़सर भी. इसके बदले दोनों अक्सर आदिवासियों के असल शोषण से आँखें मूंदे रहते हैं.

इस अर्थशास्त्र का तोड़ निकले और जवाबदेही तय हो तो शायद कोई रास्ता निकले. पैसा सही जगह खर्च हो. और वो विकास हो जिसके अभाव में नक्सलवाद को तेजी से पनपने का मौका मिल रहा है.

( ये लेखक के निजी विचार हैं)

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