माओवादियों की चिट्ठी के पीछे का 'संदेश'

  • 28 मई 2013
माओवादियों की चिट्ठी

छत्तीसगढ़ में हिंसा को सही ठहराने के लिए लिखे गए पत्र से माओवादी क्या संदेश देना चाह रहे हैं?

हमले पर जारी छह-पन्नों के अपने वक्तव्य में से पहले चार पन्नों में माओवादियों ने महेंद्र कर्मा की हत्या पर स्पष्टीकरण दिया है, साथ ही निर्दोषों की मौत पर खेद भी व्यक्ति किया.

महेंद्र कर्मा को कई नामों से संबोधित किया गया है, और ये भी दावा किया गया कि उनकी मौत के बाद समूचे बस्तर में जश्न मनाया गया.

इन सबसे महेंद्र कर्मा और सलवा जुडूम के प्रति माओवादियों की घृणा साफ़ झलकती है.

माओवादी प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी के लिखे इस पत्र में माओवादियों ने महेंद्र कर्मा के राजनीतिक जीवन पर विस्तार से चर्चा की. उनके दादा, पिता का भी ज़िक्र किया गया है. उन्होंने महेंद्र कर्मा पर उनके परिवार पर इलाके के लोगों का सालों से शोषण करने का आरोप भी लगाया है.

साथ ही उन्होंने "किसानों, छात्र-बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों, मीडियाकर्मियों" सहित सभी से कहा कि वो सरकार से ऑपरेशन ग्रीनहंट बंद करने की मांग करें.

स्पष्ट है कि इस पत्र के माध्यम से माओवादी अपनी कार्रवाई को सही ठहराना चाह रहे हैं और ये संदेश देना चाह रहे हैं कि वो अपने ऑपरेशन जारी रखेंगे. लेकिन इस हिंसा के कारणों और निपटने के तरीकों पर मतभेद अब भी साफ़ देखे जा सकते हैं.

सबूत

प्रोफ़ेसर हरगोपाल उन लोगों में से थे जो सरकार और माओवादियों के बीच वार्ताकार रहे. वो कहते हैं कि इन हमलों पर चर्चा के लिए इसके कारणों को ध्यान में रखकर विवेचना करनी होगी.

आरोप लगते रहे हैं कि सलवा जुडूम के कार्यकर्ताओं ने आदिवासियों के साथ उतनी ही हिंसा बरती जितना शनिवार को देखने को मिली.

प्रोफ़ेसर हरगोपाल बताते हैं कि जब वो वार्ताकार बीडी शर्मा के साथ सुकमा के कलेक्टर ऐलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के सिलसिले में बातचीत करने माओवादी-प्रभावित इलाकों में स्थित गाँव गए थे, तो गाँववालों ने उन्हें सलवा जुडूम के कथित अत्याचारों की कहानियाँ सुनाई थी.

वो कहते हैं, “आप विश्वास नहीं कर सकते कि कई सौ आदिवासियों ने हमसे मुलाकात की. एक महिला के पति के हाथ-पाँव बांधकर उसकी धोती में आग लगा दी गई थी. एक दूसरी महिला के नवविवाहित पुत्र का सिर काट दिया गया था. वो लोग बहुत गुस्से में थे.”

प्रभावशाली हथियार का अंत

लेकिन उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस प्रमुख और नक्सल आंदोलन पर किताब लिख चुके प्रकाश सिंह नक्सल हिंसा के खिलाफ़ सलवा जुडूम को एक प्रभावशाली हथियार बताते हैं.

वो कहते हैं, “मैने सलवा जुडूम को ज़मीन पर काम करते हुए, कैंपों में काम करते देखा है. मैंने 100 से ज्यादा कार्यकर्ताओं से बात की है. राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन की रिपोर्ट में साफ़ लिखा है सलवा जुडूम का जन्म नक्सल हिंसा और ज्यादतियों के कारण हुआ था.”

प्रकाश सिंह के अनुसार सलवा जुडूम ने उन्हीं के साथ ज़्यादती की जिन्होंने उनके साथ ज्यादती की और “अगर इसे थोड़ी दिशा दे दी जाती तो बहुत अच्छा रहता.”

मानवाधिकार कार्यकर्ता इस ओर इशारा करते रहे हैं कि मीडिया की ओर से सलवा जुडूम की हिंसा पर विवेचना नहीं होती, जबकि माओवादी हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है.

प्रोफ़ेसर हरगोपाल के मुताबिक पिछले कुछ दिनों में इलाके में इतनी मौतें हो चुकी हैं कि ये न तो सरकार के लिए ठीक है, न ही माओवादी आंदोलन के लिए.

हालाँकि इस घटना के बाद भी वो माओवादी हिंसा को आतंकवादी हिंसा कहने से गुरेज़ करते हैं.

प्रोफ़ेसर हरगोपाल कहते हैं, “अभी तक किसी आतंकवादी ने ये नहीं कहा कि मुझसे गलती हो गई. आतंकवादी ये नहीं कहते कि हमें माफ़ कर दो. वो ये नहीं कहते है कि हम निर्दोषों को नहीं मारते. आतंकवादियों और माओवादियों की भाषा में बहुत फ़र्क है.”

जानकारों के अनुसार माओवादी सलवा जुडूम को अपने अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा मानते थे और उसे खत्म करने को आतुर थे.

प्रकाश सिंह के अनुसार, “माओवादियों ने अपने दस्तावेज़ों में लिखा है कि जबसे ये आंदोलन शुरू हुआ है, तबसे इतना ज्यादा खतरा उन्हें किसी चीज़ से नहीं हुआ है, जितना सलवा जुडूम से हुआ है.”

उनकी नाराज़गी रामचंद्र गुहा और अरुंधति रॉय जैसे बुद्धिजीवियों से भी है.

वो कहते हैं, “नक्सल हिंसा से परेशान लोगों का आक्रोश सलवा जुडूम के रूप में निकला था लेकिन देश का पढ़ा-लिखा वर्ग कुछ बुद्धिजीवियों की बात पर भरोसा करता है. नक्सलियों ने बुद्धिजीवियों का प्रयोग करके सलवा जुडूम के खिलाफ़ प्रोपेगैंडा शुरू किया.”

अपने वक्तव्य में माओवादियों ने कुछ “निर्दोष” लोगों और “निचले स्तर के कार्यकर्ताओं” की मौत पर खेद भी व्यक्त किया. माओवादियों का ये कहना कि वो निर्दोषों की जान नहीं लेना चाहते थे, कितना सही है?

कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बातचीत में कहा है कि पहले गोलियाँ माओवादियों की ओर से चलाई गईं. सवाल ये कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों पर गोलियाँ चलाने से क्या नक्सलियों को अंदाज़ा नहीं था कि हमले में निर्दोष भी मारे जाएंगे?

प्रकाश सिंह के अनुसार हाल में नक्सली दबाव में थे और उनका प्रसार 220 जनपदों से घटकर 173 में हो गया था. उनकी केंद्रीय कमेटी के लोग गिरफ्तार हुए थे और उन पर अपने अस्तित्व को जीवित रखने का दबाव था. और ये हमला शायद इसी दबाव का नतीजा था.

भविष्य

Image caption माओवादियों में महेंद्र कर्मा के खिलाफ़ बहुत गुस्सा था

लेकिन आगे का रास्ता क्या है?

प्रकाश सिंह के अनुसार भारत सरकार को माओवादियों के खिलाफ़ अपनी नीति में स्पष्टता लानी होगी.

वो कहते हैं, “दिग्विजय सिंह कहते हैं विकास करो. चिदंबरम सशस्त्र कार्रवाई की बात करते थे. चिदंबरम पर दवाब पड़ने के बाद अभियान में शिथिलता आ गई. सशस्त्र बल को पता नहीं कि उन्हें कितनी कार्रवाई करनी है, कितनी नहीं. अगर कार्रवाई के दौरान कुछ हो गया तो हमें कौन बचाएगा.”

उधर प्रोफ़ेसर हरगोपाल के अनुसार सरकार को समझना होगा कि लोगों में इतना ग़ुस्सा क्यों है.

वो कहते हैं, “इस बात के विश्लेषण की ज़रूरत है कि स्थिति इतनी खराब कैसे हो गई. सरकार को आदिवासियों की समस्याओं को सुलझाना होगा और सलवा जुडूम के खिलाफ़ कार्रवाई करनी होगी. जो लोग घर छोड़कर भाग गए हैं, उनकी ज़िंदगी के बारे में सोचना पड़ेगा.”

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