अब राजनीतिक दल भी आरटीआई के दायरे में

Image caption केंद्रीय सूचना आयोग के फ़ैसले के बाद सभी राजनीतिक दल आरटीआई के दायरे में आएंगे.

राजनीतिक दलों को अब अपने चंदे और खर्च की जानकारी सार्वजनिक करनी होगी.

सूचना आयोग ने एक फैसले में कहा है कि राजनीतिक दल सरकार से वित्तीय मदद प्राप्त करते हैं और इसलिए वे जनता के प्रति जबावदेह हैं.

आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल और अनिल बैरवाल ने सूचना आयोग के समक्ष अलग-अलग शिकायतें दर्ज करा राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के तहत लाने की मांग की थी.

सूचना आयोग ने दोनों शिकायतों पर एक साथ सुनवाई करते हुए राजनीतिक दलों को खर्च और चंदे का ब्यौरा सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध करवाने का आदेश दिया है.

किराया

6 सितंबर 2011 को सूचना आयोग के समक्ष दायर अपनी शिकायत में सुभाष चंद्र अग्रवाल ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण दिल्ली में बेशकीमती सरकारी जमीनें रियायती किराये पर मुहैया करावाई गई हैं. इसलिए पार्टियां जनता के प्रति जबावदेह हैं.

वहीं 14 मार्च 2011 को सूचना आयोग के समक्ष दायर की गई अपनी शिकायत में अनिल बैरवाल ने तर्क दिया था कि चूंकि कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी पर जनता का पैसा खर्च होता है इसलिए ये राजनीतिक दल आरटीआई की धारा 2(एच) के तहत आती हैं.

दोनों शिकायतों पर सुनवाई करते हुए मुख्य सूचना आयुक्त ने 31 जुलाई 2012 को तीन सदस्यीय बेंच गठित करने का आदेश दिया था.

इस बेंच में सूचना आयुक्त श्रीमती अन्नापूर्णा दीक्षित और सूचना आयुक्त श्री एमएल शर्मा शामिल थे. मुख्य सूचना आयुक्त श्री सत्येंद्र मिश्र इसके अध्यक्ष थे.

बेंच के समक्ष सबूत पेश करते हुए सुभाष चंद्र अग्रवाल ने बताया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने दफ्तर 24 अकबर रोड का किराया मात्र 42,817 रुपये देती है.

भारतीय जनता पार्टी अपने दफ्तर 11 अशोक रोड का किराया मात्र 66,896 रुपये ही देती है.

Image caption राजनीतिक दलों को अब हिसाब देना होगा कि पैसा कहां से आया और कहां खर्च हुआ.

उन्होंने अन्य पार्टियों के दफ्तरों के किराए का ब्यौरा भी सूचना आयोग के समक्ष पेश किया.

फ़ैसला

श्री अनिल बैरवाल ने पार्टियों को मिलने वाली टैक्स छूट का ब्यौरा उपलब्ध करवाया.

सूचना आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई सूचना के मुताबिक बीजेपी को साल 2006 से 2009 के बीच 141.25 करोड़ रूपये की टैक्स छूट दी गई.

वहीं कांग्रेस पार्टी को क़रीब 300 करोड़ रुपये की टैक्स छूट दी गई.

अपने फैसले में सूचना आयोग ने कहा, 'भारत के मौजूदा कानून राजनीतिक दलों को अपनी कमाई और खर्च का ब्यौरा जनता को उपलब्ध करवाने के लिए मजबूर नहीं करते हैं. ऐसे में नागरिकों के पास इस जानकारी को हासिल करने का एकमात्र ज़रिया पार्टियों द्वारा आयकर विभाग के समक्ष दायर आयकर रिटर्न ही है.”

आयोग ने कहा, “राजनीतिक पार्टियों के चंदे के बारे में जानकारी इकट्ठा करने में जनता की दिलचस्पी रहती है. इससे वोट देते वक्त सही फैसला लेने में भी मदद होगी. लोकतंत्र के सुचारू रूप से चलने के लिए पारदर्शिता जरूरी है. राजनीतिक दल राजनीतिक शक्ति के निर्वाह में अहम भूमिका निभाते हैं ऐसे में उनका पारदर्शी और जनता के प्रति जबावदेह होना जनहित में है.”

सूचना आयोग ने अपने फैसले में कहा है कि कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सीपीआई, एनसीपी जैसी पार्टियां केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता लेती हैं इसलिए यह सूचना के अधिकार की धारा के अंतर्गत आती हैं.

सूचना आयोग ने राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के तहत लाते हुए राजनीतिक पार्टियों को छह सप्ताह के अंदर जनसूचना अधिकारी और अपीलीय प्राधिकरण तैनात करने और मांगे जाने पर चार सप्ताह के भीतर जानकारी उपलब्ध करवाने का आदेश दिया है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार