बीसीसीआई की बैठक से क्या हुआ हासिल?

Image caption रविवार को चेन्नई में बीसीसीआई की बैठक से बाहर आते बोर्ड अध्यक्ष श्रीनिवासन

चौतरफा दबाव के बाद आनन-फानन में की गई बीसीसीआई की आपात बैठक का नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा.

हालांकि इस बैठक से ये साबित ज़रूर हो गया कि भारतीय क्रिकेट श्रीनिवासन की मुट्ठी में बंद है और निकट भविष्य में यह मुट्ठी खुलने वाली नहीं है.

रविवार को चेन्नई में हुई इस आपात बैठक से पहले फिक्सिंग में दामाद के फंसने के बाद विवादों में घिरे बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के इस्तीफे के कयास लगाए जा रहे थे.

लेकिन बैठक के बाद श्रीनिवासन और मजबूत होकर सामने आए.

दिखावे की बैठक

श्रीनिवासन पर सवाल उठाने वालों को तो कोई जवाब नहीं मिला लेकिन देश को यह पता जरूर चल गया कि क्रिकेट भ्रष्टाचार के दलदल में बुरी तरह धंस चुका है और इसका साफ-सुथरी छवि लेकर बाहर निकलना अब इतना आसान नहीं है.

बैठक का एकमात्र नतीजा यह रहा कि पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के मौजूदा अध्यक्ष जगमोहन डालमिया श्रीनिवासन के रबड़ स्टांप होंगे.

यह स्पष्ट है कि यह बैठक आईपीएल मैचों में स्पॉट फिक्सिंग की तरह ही फिक्स थी. इससे यह भी साफ हो गया कि क्रिकेट बोर्ड के अधिकांश सदस्य श्रीनिवासन की मुट्ठी में हैं.

श्रीनिवासन बोर्ड के सभी सदस्यों को फायदा दिलाते हैं और बदले में वह श्रीनिवासन की हर जायज़-नाजायज़ मांग के आगे नतमस्तक हो जाते हैं.

बीसीसीआई के संविधान के मुताबिक कोई बोर्ड सदस्य व्यापारिक या फायदे का काम नहीं कर सकता था. लेकिन श्रीनिवासन ने अपनी आईपीएल टीम बनाने के लिए बोर्ड का संविधान ही बदलवा दिया.

सच यह है कि आपात बैठक सिर्फ मीडिया दबाव के कारण हुई. बोर्ड सदस्यों को यह दिखाना पड़ गया कि वह कुछ कर रहे हैं. दिखावे के लिए की गई बैठक में वही प्रस्ताव आए जो श्रीनिवासन चाहते थे.

एक फिक्स ड्रामे के तहत एक गड़े मुर्दे को जिंदा कर उसे कुछ समय के लिए जिम्मेदारी दे दी गई ताकि श्रीनिवासन को यह भरोसा रहे कि बोर्ड का काम देखने वाला व्यक्ति उनके प्रभाव में ही रहेगा.

जांच की बात कहकर मुश्किल हालात का सामना करने को टाला जा रहा है. लेकिन जांच भी बोर्ड से ही प्रभावित रहेगी.

मुमकिन है कि दो महीने बाद जांच दल अपनी रिपोर्ट में श्रीनिवासन को क्लीन चिट देते हुए कहे कि फिक्सिंग में गुरुनाथ के साथ उनकी कोई भूमिका नहीं थी.

ऐसा भी हो सकता है कि रिपोर्ट में कहा जाए कि गुरुनाथन का सीएसके से कोई संबंध ही नहीं है.

यानी जांच रिपोर्ट के बाद श्रीनिवासन का वापस आना पक्का है.

चुनौतियां

Image caption जगमोहन डालमिया

मौजूदा हालात बीसीसीआई के लिए चुनौतीपूर्ण और उसे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर फैसला करना होगा -

1. आईपीएल आने के बाद बोर्ड के सामने सबसे बड़ी चुनौती हितों का टकराव है.

श्रीनिवासन बोर्ड अध्यक्ष भी हैं और उनकी अपनी आईपीएल टीम भी है.

बोर्ड अध्यक्ष की जिम्मेदारी देश में क्रिकेट को आगे बढ़ाने की है जबकि फ्रेंचाइजी मालिक की मुख्य काम अपना फायदा ज्यादा से ज्यादा बढ़ाना है.

श्रीनिवासन बोर्ड अध्यक्ष के रूप में जो फैसले लेते हैं उनसे लगता है कि उनकी मुख्य चिंता अपनी टीम चैन्ने सुपर किंग्स का फायदा तय करना है.

बोर्ड को यह मानना पड़ेगा कि बोर्ड के संवीधान में बदलाव कर गलती की गई है और श्रीनिवासन को बोर्ड के अध्यक्ष पद और टीम के मालिकाना हक में से एक को चुनना पड़ेगा.

उनसे कहा जाए कि या तो आप अपनी फ्रेंचाइजी चलाइये या फिर बोर्ड में रहिए.

2. आईपीएल भी एक बड़ा मुद्दा है.

फ्रेंचाइजी मालिकों पर मनी लॉंड्रिंग और प्रवर्तन निदेशालय के मामले दर्ज है. स्वयं बोर्ड के खिलाफ भी केस चल रहा है.

बोर्ड को चाहिए कि वह स्वयं जांच करवाए और जो लोग गलत हैं उन्हें आईपीएल से बाहर करे.

3. तीसरा बड़ा मुद्दा रवि शास्त्री और सुनील गावस्कर जैसे बड़े खिलाड़ियों को कांट्रेक्ट दिए जाने का है.

बोर्ड ने तमाम खिलाड़ियों को कमेंट्री करने के कांट्रेक्ट दे रखे हैं.

यानि क्रिकेट संबंधी विषयों पर स्वतंत्र आवाज बन सकने वाले तमाम लोगों को बोर्ड ने बांध लिया है.

यह लोग बोर्ड को आईना दिखाकर उसकी गलतियां बता सकते थे लेकिन बोर्ड ने उन्हें ही अपने कांट्रेक्टों में बांध कर अपने खिलाफ स्वतंत्र आवाजों को खामोश कर दिया है.

Image caption गुरुनाथ मयप्पन, बीसीसीआई अध्यक्ष श्रीनिवासन के दामाद

यह पुराने खिलाड़ी न अब बोर्ड की आलोचना कर सकते हैं और न ही खुलकर सच बयां कर सकते हैं.

4. खिलाड़ियों के साथ कांट्रेक्ट करने वाली कंपनियां भी बोर्ड के सामने बड़ा मुद्दा है.

उदाहरण के तौर पर महेंद्र सिंह धोनी के साथ अनुबंध करने वाली कंपनी रिति स्पोर्ट्स में स्वयं धोनी की 15 फीसदी हिस्सेदारी है.

यह कंपनी धोनी की तमाम व्यवसायिक गतिविधियां देखने के साथ-साथ भारतीय क्रिकेट टीम के पांच अन्य खिलाड़ियों के व्यवसायिक हितों का भी प्रबंधन देखती है. जडेजा, सुरेश रैना और आरपी सिंह जैसे खिलाड़ियों के साथ इसका कांट्रेक्ट है.

साथ ही यही कंपनी सीएसके के इवेंट मैनेजमेंट का काम भी देखती है.

बोर्ड को यह सोचना चाहिए कि यदि कप्तान स्वयं एजेंट बन जाएंगे तो क्या वह ईमानदार रह पाएंगे?

टीम के चुनाव में कप्तान की अहम भूमिका होती है. जाहिर है अपनी कंपनी द्वारा अनुबंधित खिलाड़ियों को वह टीम में रखना चाहेंगे.

5. बीसीसीआई को यह भी तय करना होगा कि सरकार द्वारा प्रस्तावित स्पोर्ट्स बिल से उसे क्या दिक्कते हैं. वह क्यों आरटीआई के दायरे में नहीं आना चाहती.

रबर स्टांप

मौजूदा हालात से निकलने के लिए बीसीसीआई को ऐसे ही आयोग बनाकर सुझाव मांगने चाहिए जैसे दिल्ली रेपकांड के बाद जस्टिस वर्मा की कमेटी से सुझाव मांगे गए थे.

बोर्ड को विश्वसनीय लोगों को क्रिकेट बोर्ड की कार्यप्रणाली के अध्ययन की जिम्मेदारी देकर मौजूदा हालात से निकलने के लिए सुझाव मांगने चाहिए.

लेकिन जगमोहन डालमिया से कोई ठोस कदम उठाने की उम्मीद नहीं की जा सकती.

बीसीसीआई के अंतरिम अध्यक्ष के रूप में डालमिया का मुख्य कार्य श्रीनिवासन का रबड़ स्टांप बनना और जांच दल की रिपोर्ट आने के बाद उन्हें क्लीन चिट देना ही रहेगा.

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