बाघों की कब्रगाह बनता जा रहा कार्बेट लैंडस्केप

उत्तराखंड राज्य के विश्वप्रसिद्ध जिम कार्बेट टाइगर अभयारण्य में पिछले छह दिनों में तीन टाइगरों के शव मिलने से वन विभाग में हड़कंप मचा हुआ है.

लेकिन न तो अभी तक ये पता चला है कि इन बाघों की मौत किस कारण हुई, और न ही इस सिलसिले में टाइगर रिज़र्व के किसी अधिकारी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की गई है.

कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व के तराई वाले इलाक़े में बाघों के मारे जाने की ये कोई पहली घटना नहीं है. पिछले छह महीने में यहाँ बाघों के सात शव बरामद किए जा चुके हैं.

लेकिन जो लोग बाघों की रक्षा के लिए तैनात किए गए हैं उन्हें इस बात की भनक तक नहीं लग पा रही है कि मौत का कारण क्या है.

खानापूर्ति

कुल मिलाकर लगभग 1300 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व में 2010 की गणना के मुताबिक़ लगभग 175 टाइगर बच गए हैं. जबकि पूरे उत्तराखंड में बाघों की संख्या 227 बताई गई है.

जानकार कहते हैं कि जिस गति से रामनगर के आसपास बाघ मर रहे हैं उससे इनके एकदम ख़त्म हो जाने का ख़तरा बढ़ गया है.

छह महीने में मरे सात बाघों में से पांच के शव क्षत-विक्षत हालत में बरामद हुए हैं। किसी भी मौत की न तो गुत्थी सुलझ सकी और न ही किसी की गिरफ्तारी हुई।

विभागीय सूचना के मुताबिक 18 जनवरी को कार्बेट के झिरना रेंज व अमानगढ़ रेंज की सीमा में बाघ और 2 मार्च को दैचोरी रेंज में बाघ व गुलदार के क्षत विक्षत शव बरामद हुए.

तीनों की मौत का कारण जहर से होने की आंशका जताई गई है. फिर आठ मार्च को दैचोरी रेंज में बाघ का शव मिला इसे भी जहर से मौत होने की आंशका जताई गई.

स्थानीय सूत्रों के मुताबिक़ 18 अप्रैल को तराई वन प्रभाग के बैलपड़ाव रेंज में एक बाघिन की फंदे में फँसी लाश बरामद हुई.

इसी तरह 27 मई को कार्बेट की ढेला रेंज में और 28 मई व 1 जून को तराई की आमपोखरा रेंज में बाघों का क्षत-विक्षत शव बरामद हुए.

अधिकारियों से पूछे जाने पर वो सिर्फ़ इतना कहते हैं कि मृत बाघों का बिसरा जाँच के लिए भेज दिया गया है और जाँच रिपोर्ट का इंतज़ार किया जा रहा है.

लेकिन तथ्य ये है कि बाघों की लाशें इतनी सड़ गल चुकी होती हैं और बिसरा इतनी देरी से निकाला जाता है कि वो जाँच के लायक़ ही नहीं रहता.

अटकलें

Image caption पिछले छह महीने में बरामद सात लाशों में से पांच क्षत-विक्षत स्थिति में मिलीं थीं. (सभी तस्वीरें- जितेंद्र पपने)

तराई डिविज़न के प्रभागीय वन अधिकारी राहुल ने बीबीसी से कहा, “बाघों के कोई भी अंग सुरक्षित न होने के कारण बाघों की हड्डी का सेंपल भेजा जा रहा है.”

वहीं कार्बेट पार्क के उपनिदेशक डा सांकेत बडोला ने आबादी के नजदीक दो बाघों की मौत पर चिंता जताते हुए कहा कि पानी के उन स्रोतों की निगरानी रखनी होगी जहाँ जंगली जानवर पानी पीने आते हैं.

उन्होंने आदेश दिया है कि वाटरहॉलो की मानीटरिंग रिपोर्ट रोजाना वायरलेस से देनी होगी.साथ ही गश्त की रिपोर्ट हर सप्ताह मुख्यालय को देनी होगी.

रामनगर के आसपास टाइगरों को मारने के लिए कई तरह के तरीक़े अपनाए जाते हैं.

बाघों की खाल, हड्डियाँ और दाँत आदि अंगों का व्यापार करने के लिए उन्हें मारने वाले शिकारी तीखे दाँत वाले लोहे के औज़ार का इस्तेमाल करते हैं जिसे स्थानीय भाषा में कड़का कहा जाता है.

ये एक तरह का कड़ा चिमटा होता है जिसमें टाइगर का पैर फँस जाता है तो फिर निकल नहीं पाता. आसपास छिपे शिकारी फिर बल्लम से टाइगर पर हमला बोल देते हैं और उसकी खाल और दूसरे अंगों को वहीं निकाल कर फ़रार हो जाते हैं.

लेकिन कई बार स्थानीय लोग अपने जानवरों पर हुए हमले का बदला लेने के लिए बाघों को ज़हर देकर मार डालते हैं.

पिछले दिनों बरामद किए गए कुछ बाघों में उनके अंग अपनी जगह मौजूद थे, जिससे अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि शायद उनकी मृत्यु ज़हर के कारण हुई हो.

लेकिन ये सभी अटकलें हैं. वन अधिकारी, जाँचकर्ता और सरकारी अमला ये पता लगाने में अब तक नाकाम रहा है कि जिम कॉर्बेट पार्क के टाइगर ख़ुद मर रहे हैं या फिर उन्हें मारा जा रहा है.

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