पार्टी दफ़्तरों का किराया आपको हैरान कर देगा

  • 5 जून 2013

सूचना का अधिकार मिलने के बाद से ही जनता की दिलचस्पी राजनीतिक पार्टियों की आमदनी और खर्च का ब्यौरा हासिल करने में रही है. लेकिन सूचना के अधिकार से बाहर होने के कारण राजनीतिक पार्टियाँ जवाबदेही से हमेशा बचती रहीं.

अब तक पार्टियों को मिलने वाले चंदे का ब्यौरा हासिल करने के लिए पार्टियों द्वारा चुनाव आयोग के समक्ष पेश की गई आमदनी और आयकर विभाग में भरे गए आयकर रिटर्न की जानकारी मांगी जाती थी.

03 जून 2013 को केंद्रीय सूचना आयोग ने एक अहम फैसला सुनाते हुए राजनीतिक पार्टियों को जनता के प्रति जबावदेह करार दिया और उन्हें अपने खर्च और आमदनी की जानकारी सार्वजनिक करने काआदेश दिया.

लेकिन यह फैसला इतना आसान नहीं था. इससे पहले 2009 में भी सूचना आयोग के समक्ष राजनीतिक पार्टियों को जनता के प्रति जवाबदेह तय करने का मुद्दा आया था लेकिन उस बार फैसला राजनीतिक पार्टियों के हक में रहा था.

केंद्रीय सूचना आयोग ने देश की छह बड़ी राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लाने का फैसला आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल और अनिल बैरवाल की अलग-अलग शिकायतों पर एक साथ कार्रवाई करते हुए दिया.

सूचना के अधिकार की लड़ाई

सुभाष चंद्र अग्रवाल ने भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सूचना के अधिकार के तहत चुनावी मेनिफेस्टो की कॉपी और पूरे किए गए व अधूरे रह गए वादों की जानकारी मांगी थी.

सुभाष अग्रवाल ने देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों से सदस्यों द्वारा पार्टी फंड में दिए गए चंदे की जानकारी भी मांगी थी. लेकिन अग्रवाल को इन सामान्य सवालों के जबाव नहीं मिल सका था.

केंद्रीय सूचना आयोग के फैसले के बाद बीबीसी से बात करते हुए सुभाष चंद्र अग्रवाल ने कहा, "मैंने करीब 6 हजार आरटीआई दायर की हैं जिनमें करीब दस प्रतिशत मामलों में मुझे सूचना आयोग पहुंचना पड़ा जहां से अधिकतर निर्णय मेरे पक्ष में आए. अपने अनुभव के आधार पर मैंने पार्टियों को सरकार से मिलने वाली आर्थिक मदद से संबंधित तथ्य सूचना आयोग के समक्ष पेश किए थे जिन्हें नकारा नहीं जा सकता था. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) की याचिका पर भी साथ ही सुनवाई की गई थी. एडीआर ने राजनीतिक दलों को मिलने वाली टैक्स छूट और सरकारी विज्ञापन में मिलने वाली छूट का ब्यौरा दिया था. सूचना आयोग ने हमारी बात समझी और देशहित में फैसला दिया."

राजनीतिक दलों के आरटीआई के दायरे में आने पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने मंगलवार को कहा कि आरटीआई जानकारी सूचना प्राप्त करने के लिए है इसके जरिए किसी को उत्पात नहीं मचाने दिया जाएगा.

विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के बयान पर सुभाष अग्रवाल ने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण बयान है. इससे पहले से ही हजारों संस्थाएं आरटीआई के दायरे में थी, उनमें से किसी ने ऐसी बात नहीं कही. संसद ने ही कानून बनाकर देश को सूचना का अधिकार दिया और अब जब यही कानून संसद में बैठने वालों और राजनीतिक दलों के बारे में जानकारी मांगने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है तो उन्हें दिक्कत हो रही है."

राजनीतिक पार्टियां सीआईसी के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटा सकती हैं. इस संभावना पर सुभाष चंद्र अग्रवाल कहते हैं, "हम हाईकोर्ट में कैविएट दायर करने की तैयारी कर रहे हैं ताकि एक्स-पार्टी स्टे ऑर्डर को रोका जा सके, हालांकि कोर्ट का क्या रुख होगा यह बाद की बात है. लेकिन अब हम राजनीतिक दलों से आरटीआई के जरिए जबाव मांगेगे."

देशहित का फ़ैसला

सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने इस फैसला का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों को पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया. उन्होंने कहा, "यह देश के लिए अहम फैसला है. राजनीतिक पार्टियां यदि इसके खिलाफ अपील भी करेंगी तो हमें उम्मीद है कम से कम उनकी आमदनी और खर्च को सावर्जनिक ही रखा जाएगा. पारदर्शिता राजनीतिक दलों की पहली जिम्मेदारी है."

अरुणा ने आगे कहा, "हमें लगता है कि सरकार से फंड प्राप्त करने वाली तमाम संस्थाओं को आरटीआई के अंतर्गत लाना चाहिए भले ही वह एनजीओ हो, ट्रेड यूनियन हो, आंदोलन है, कोई धार्मिक संस्था हो. सरकार से रियायती दरों पर जमीन हासिल करने वाली प्रत्येक संस्था को आरटीआई के दायरे में होना ही चाहिए. 1996 में जस्टिस सावंत ने जब आरटीआई का पहला ड्राफ्ट बनाया था तब उन्होंने पब्लिक का पैसा और संपत्ति इस्तेमाल करने वाली तमाम संस्थाओं को इसमें शामिल किया था."

पॉश इलाके में नाममात्र किराया

दिल्ली के पॉश इलाके की सबसे अहम प्रॉपर्टियों में देश की बड़ी राजनीतिक पार्टियों के दफ्तर हैं. इन विशाल दफ्तरों का मासिक किराया आपको हैरान कर सकता है-

  • 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस के दफ्तर का मासिक किराया मात्र 42,817 रुपए है. पार्टी के पास 3 और दफ्तर भी हैं, जिनमें 26 अकबर रोड का किराया 3015 रुपए, 5 रायसीना रोड का किराया 34,189 रूपए और CII/109, चाणक्यपुरी का किराया मात्र 8078 रूपए है.
  • 11 अशोक रोड स्थित बीजेपी के दफ्तर का किराया मात्र 66,896 रुपए है. पार्टी की दिल्ली इकाई के 14, पंडित पंत मार्ग स्थित ऑफिस का किराया मात्र 15077 रूपए है.
  • 10, डॉ. बी.डी. मार्ग स्थित नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के दफ्तर का मासिक किराया मात्र 1320 रूपए है.
  • 4, जी.आर.जी. रोड को बसपा सुप्रीमो बहन मायावती ने 1320 रूपए की मासिक दर पर किराए पर लिया है.
  • 8, तीन मूर्ति लेन में सीपीआई (एम) के राष्ट्रीय महासचिव प्रकाश करात रहते हैं. उसका मासिक किराया मात्र 1550 रूपए है.
  • 8, कॉपरनिकस मार्ग स्थित समाजवादी पार्टी के दफ्तर का किराया मात्र 12138 रूपए है.

प्लॉट भी आबंटित

कांग्रेस को सरकार की ओर से दो प्लॉट दिए गए हैं जिनका बाजार मूल्य इस समय करीब 1036.41 करोड़ रूपए है. भारतीय जनता पार्टी को भी दो प्लॉट दिए गए हैं जिनका बाजार मूल्य करीब 557.23 करोड़ रूपए है.

सीपीआई (एम) को को दिए गए प्लॉट का बाजार मूल्य लगभग 240.94 करोड़ रूपए है जबकि सीपीआई को 78.41 करोड़, राष्ट्रीय जनता दल को 122.92 करोड़, समाजवादी पार्टी को 261.36 करोड़, जदयू को 129.12 करोड़, एआईएडीएमके को 65.08 करोड़ औऱ एआईटीसी को 64.56 करोड़ रुपए बाजार मूल्य के प्लॉट दिए गए हैं.

इसके अलावा इन पार्टियों को आयकर में भी बड़े पैमाने पर छूट मिलती रही है.

जबकि इस दौरान राजनीतिक पार्टियों को करोड़ों रुपये चंदा भी मिलता रहा है.

साल 2011 में कांग्रेस को 8,04,49,284 रुपए, एनसीपी को 13,55,000 रुपए, सीपीआई को 1,98,11,465 रुपए का चंदा मिला था. इस साल भाजपा, सपा और बसपा ने चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को उपलब्ध नहीं करवाई थी.

वहीं साल 2009-10 में कांग्रेस को 84,80,21,238 रुपए, भाजपा को 93,90,53,133 रुपए, एनसीपी को 3,03,00,000 रुपए, सीपीआई को 86,67,852 रुपए, सपा को 1,94,07,173 रुपए का चंदा मिला था.

बसपा ने इस साल भी चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को उपलब्ध नहीं करवाई थी.

पार्टियों के बहाने

Image caption भारतीय मार्क्सवादी पार्टी ने भी सूचना के अधिकार को राजनीतिक दलों पर लागू करने पर विरोध जताया है

आरटीआई के जबाव में सीपीआई की ओर से परस्पर विरोधी जबाव देते हुए जहां एबी वर्धन ने अनिल बैरवाल को भेजे जबाव में सीपीआई को लोक प्राधिकरण करार दिया था वहीं सुधाकर रेड्डी ने अपने जबाव में कहा था कि राजनीतिक पार्टियां आरटीआई के दायरे में नहीं आती हैं.

एनसीपी की ओर जबाव देते हुए अधिवक्ता एए तिवारी ने बहाना बनाया था कि पार्टी को राष्ट्रीय टीवी और रेडियो पर फ्री एयरटाइम दिया जाना सरकारी मदद नहीं है क्योंकि दुनियाभर की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में यह आम प्रचलन है.

जानकारी देने से बचने के लिए एनसीपी ने कहा था कि उसे मिलने वाले कुल फंड का मात्र 1.55 प्रतिशत ही सरकार से मिलता है. हालांकि इस आंकड़े को सूचना आयोग के समक्ष साबित करने के लिए पार्टी ने कोई विश्ववसनीय जानकारी नहीं पेश की थी.

एनसीपी ने तो यह तक कहा था कि यदि राजनीतिक दलों को लोक प्राधिकरण करार दे दिया गया तो आरटीआई राजनीतिक बदले लेने का साधन बन कर रह जाएगी. राजनीतिक विरोधी पार्टियों के दफ्तर में हजारों की तादाद में आरटीआई डालकर पार्टी का वक्त और संसाधन बर्बाद कर सकते हैं.

भाजपा और कांग्रेस ने तो स्पष्ट कह दिया था कि व ह लोक प्राधिकरण नहीं है इसलिए कोई जानकारी नहीं देंगे. वही सीपीआई (एम) ने खुद को लोक प्राधिकरण तो नहीं माना था लेकिन सरकार से मिली जमीन की जानकारी जरूर दे दी थी.

स्थापित राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनौती बन रहे अरविंद केजरीवाल ने इस मामले में भी बाकी पार्टियों को चुनौती देते हुए अपनी पार्टी की आय और व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया है.

उन्होंने फैसले का स्वागत करते हुए कांग्रेस और बीजेपी को अपनी आय और व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक करने की चुनौती दी है. देखना यह है कि यह महत्वपूर्ण फैसला लंबी कानूनी लड़ाई में उलझ जाएगा या जनता को राजनीतिक पार्टियों के बारे में हर जरूरी जानकारी दिलाएगा.

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