ऑनलाइन शॉपिंग के लिए कितना तैयार भारत

भारत में इंटरनेट यूज़र्स की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और साथ ही बढ़ रहा है ई-कॉमर्स का बाज़ार भी. कंपनियां ट्रेन टिकट से लेकर कपड़े और इंश्योरेंस तक बेच रही हैं.

इसी कड़ी में बुधवार को अमरीकी कंपनी अमेज़न भी शामिल हो गई. अमेज़न ने भारत के लिए अपनी नई सेवा शुरू की है जिसमें ऑनलाइन खरीददारों को किताब, फ़िल्मों की डीवीडी, गैजेट, मोबाइल फ़ोन और कैमरे सहित और भी कई सामग्रियां खरीदे जाने की सुविधा उपलब्ध होगी.

भारत में ई-कॉमर्स का कारोबार तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन इसी के साथ ये ख़तरा भी बना हुआ है कि ये बस बुलबुला भर न साबित हो.

अमेज़न से पहले ई-कॉमर्स बाज़ार में बड़े तौर पर जबॉन्ग दाखिल हुई थी. कंपनी का कहना है कि तब से अब तक उन्होंने 50,000 उत्पाद बेचें हैं जिसमें से 50 फ़ीसदी से अधिक बिक्री छोटे शहरों में हुई है. वो मानते हैं कि भारत में ई-कॉमर्स के लिए काफ़ी संभावनाएं हैं.

भारत 'आकर्षक' बाज़ार

जबॉन्ग के सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) कहते हैं, “भारत ढांचागत रूप से काफ़ी आकर्षक है, क्योंकि यहां भारी संख्या में युवा खरीददार हैं, उनकी आशाएं है और ये एक ऐसा बड़ा देश हैं जहां ज्यादा मॉल्स नहीं है. लेकिन यहां के लोगों को बड़े ब्रांड की चीज़ें चाहिए होती हैं और इंटरनेट पर ये मिलता है, जो सबके पास उपलब्ध है.”

Image caption भारत में भी ऑनलाइन शॉपिंग का चलन बढ़ा है.

भारत में इंटरनेट का प्रयोग करने वाले खरीददारों को एक बटन से सामान खरीदने का तरीका मिल गया है और अब तो कई लोग अपने मोबाइल फोन से भी वेबसाइट खोलते हैं.

हालांकि इन सबके बीच सर्वाधिक लोकप्रिय यात्रा के लिए टिकट बेचने वाली वेबसाइटें हैं. रिसर्च कंपनी कॉमस्कोर के अनुसार भारत में इंटरनेट का प्रयोग करने वाले हर पांच में से एक व्यक्ति भारतीय रेल की टिकट बुकिंग वेबसाइट यूज़ करते हैं.

लेकिन रिटेल वेबसाइट भी ज्यादा पीछे नहीं हैं और नए दौर के उत्पादों से वो युवाओं को खुद से जोड़ रहीं है.

ग्राहकों तक पहुचना 'कठिन'

एक अनुमान के मुताबिक करीब एक करोड़ लोग वर्तमान में ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं जबकि दस करोड़ से ज़्यादा लोग ई-शॉपिंग करने के लिए तैयार है. लेकिन इन खरीददारों तक पहुंच पाना आसान नहीं है.

भारत में सबसे बड़ी समस्या मूलभूत सुविधाओं की कमी है. जबॉन्ग जैसी कई कंपनिया एक व्यापार मॉडल पर काम करती हैं, जिसमें निर्माताओं से उत्पाद खरीद कर कंपनिया गोदामों में स्टोर कर देती है और उम्मीद करतीं है कि कोई ऑनलाइल ग्राहक उसे खरीद लेगा.

दूसरे व्यापार मॉडल में कंपनियां बाज़ार से सामान तभी खरीदते हैं जब उन्हें कोई ऑनलाइन ऑर्डर मिलता है. ये तरीका पहले वाले से थोड़ा कम खर्चीला होता है हालांकि इसमें समय ज्यादा लगता है.

लेकिन कंपनियां को चिंता इस बात की है कि ऐसे व्यापार कितने दिन चलेगा.

'भारत की पहली ई-कॉमर्स वेबसाइट'

भारत की सबसे पहली ई-कॉमर्स वेबसाइट इंडिया प्लाज़ा के मालिक के वैथीस्वरन कहते हैं, “अभी तक जिन कंपनियों ने ई-कॉमर्स पर निवेश किया है उन्होंने बिक्री बढ़ाने की बात की है, लेकिन मुनाफ़े पर ध्यान नहीं दिया. अब अचानक इन निवेशकों को लगता है कि उन्हें उनके निवेश पर उचित मुनाफ़ा नहीं मिल पाएगा. लिहाज़ा अब वो मुनाफ़े पर जोर दे रहीं है, पर दुर्भाग्यवश ज्यादातर कंपनियों ने सिर्फ गोदाम बनाकर लोगों को काम पर रखा है.”

वैथीस्वरन के अनुसार उनकी कंपनी काफ़ी दिनों से सिर्फ इसीलिए चल रही है क्योंकि उन्होंने दाम कम रखे हैं.

साल 1999 में जब उनकी कंपनी ने काम शुरू किया था तब 30 लाख से भी कम इंटरनेट यूजर्स थे. इसमें से भी केवल 20,000 लोग ऑनलाइन शॉपिंग करते थे.

अब भारत दुनिया के तीन सबसे तेज़ी से बढ़ रहे इंटरनेट बाज़ारों में से एक है. पिछले साल इंटरनेट का प्रयोग यहां 41 फ़ीसदी बढ़ा.

इंटरनेट का प्रसार बढ़ा

गूगल इंडिया के प्रबंध निदेशक राजन आनंदन ने कहा, “भारत में 14 करोड़ इंटरनेट यूज़र्स में से केवल ढ़ाई करोड़ ऑनलाइन व्यापार करते हैं. जबकि चीन में 18 करोड़ ऑनलाइन खरीददारी करते हैं.”

भारत में नए खरीददारों को रिझाने के लिए कंपनियों को विज्ञापन और डिस्काउंट स्कीमों पर निवेश करना पड़ेगा.

एक अनुमान के अनुसार कंपनियां विज्ञापन के ज़रिए हर ऑनलाइन ग्राहक पर 15 से 50 डॉलर खर्च कर रही है.

इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के एक आंकड़े के अनुसार साल 2005 में शुरू की गई कंपनी ई-बे इंडिया हर मिनट में छह बिक्रियां करती हैं, जबकि फ्लिपकार्ट हर मिनट 20 बिक्रियां करती है.

ई-कॉमर्स में 'मुनाफ़ा नहीं'

लेकिन चिंता की बात ये है कि इन वेबसाइटों को अभी भी मुनाफ़ा नहीं हो रहा है और इसके लिए निवेशकों का दबाव बढ़ता जा रहा है.

‘शेर सिंह’ और ‘एक्सक्लूसिव.इन’ के मालिक संजय गुलरिया कहते हैं, “बाज़ार में लोगों की हार और जीत तो होगी ही. भारत में अभी बाज़ार उतना बड़ा नहीं है इसलिए कोई न कोई तो पिछड़ेगा ही. बड़ी कंपनियों को ही सबसे ज्यादा फायदा होगा, उन्ही की बिक्री बढ़ेगी.”

संगठित रिटेल पूरे बाज़ार का सिर्फ 5 फ़ीसदी है और ई-कॉमर्स इसे पीछे छोड़ता हुआ दिख रहा है, खासतौर पर छोटे शहरों में जहां ज्यादा मॉल नहीं है.

लोगों की आमदनी बढ़ने और इंटरनेट यूज़र्स की संख्या में बढ़ोत्तरी के साथ ही खरीददारी सिर्फ एक क्लिक दूर है. लेकिन कंपनियों को मुनाफ़ा कमाने के लिए उनकी उम्मीद से ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ सकता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार