इंफ़ोसिस में नारायण मूर्ति का करिश्मा चलेगा?

Image caption बदले परिवेश में इंफोसिस को बुलंदी पर पहुँचाना नारायण मूर्ति जैसी शख्सियत के लिए भी काफी चुनौतिपूर्ण है.

भारत की प्रमुख आउटसोर्सिंग फर्म इंफोसिस के संस्थापकों में शामिल करिश्माई अरबपति 66 वर्षीय नारायण मूर्ति ने कंपनी की जिम्मेदारी छोड़ने के एक दशक के बाद कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में वापसी की है.

उनके इस फ़ैसले ने उद्योगजगत और निवेशकों को चकित कर दिया.

मूर्ति ने बताया कि यह एक ऐसा कदम था, जिसके बारे में उन्होंने खुद सपने में भी नहीं सोचा था.

इसके साथ ही कॉरनेल और हावर्ड में शिक्षित उनके 30 वर्षीय पुत्र रोहन मूर्ति को भी कार्यपालक सहायक के तौर पर कंपनी में शामिल किया गया है. रोहन कंप्यूटर साइंस में पीएचडी हैं और कंपनी के सबसे बड़े व्यक्तिगत शेयरधारकों में शामिल हैं.

मूर्ति की वापसी एक तरह से लड़खड़ा रही इंफोसिस को संभालने की एक कोशिश है, जो नवंबर में उद्योग की वरीयता में तीसरे स्थान पर खिसक गई थी. तुलनात्मक रूप से बेहतर प्रदर्शन कर कॉग्नीजैंट टेक्नालॉजीज उससे ऊपर निकल गई थी.

निवेशकों में उत्साह

Image caption मूर्ति की वापसी की घोषणा के बाद इंफोसिस के शेयरों में भारी उछाल देखा गया.

निवेशकों ने मूर्ति की वापसी हाथो-हाथ लिया और इंफोसिस के शेयर नौ प्रतिशत तक चढ़ गए, जो पिछले छह महीने में सबसे अधिक है. हालांकि, कारोबार के अंत में शेयर चार प्रतिशत बढ़त के साथ बंद हुए.

इंफोसिस, जो एक समय में भारत के सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की अगुआई करती थी, हाल के दिनों में उसका भरोसा टूटता दिखा. आमदनी में कमी, कर्मचारियों द्वारा कंपनी छोड़ने और मनोबल में गिरावट के रूप में इसके लक्षण दिखाई देने लगे.

इस साल अप्रैल में कंपनी के तिमाही नतीजों की घोषणा के तुरंत बाद कंपनी के शेयर 20 प्रतिशत गिर गए.

इंफोसिस की पहचान न्यूयार्क के नैसडैक शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने वाली पहली कंपनी से अमरीका की अदालत द्वारा कर्मचारियों के वीजा मसले पर समन पाने वाली पहली कंपनी की बन गई.

कठिन डगर

मूर्ति जैसे ट्रैक-रिकॉर्ड वाले नायक के लिए भी कंपनी का कायाकल्प करना काफी चुनौतीपूर्ण है.

सलाहकार फर्म गार्टनर में शोध विभाग के कंट्री मैनेजर पार्थ अयंगर ने बताया, “पिछले कुछ वर्षों में हताशा का सामना करने के बाद इंफोसिस ने काफी मात्रा में बाजारी की गति, विश्वसनीयता और स्वीकृति को खो दिया है.”

उन्होंने कहा कि यहाँ तक कि मूर्ति को होते हुए भी यहाँ से वापसी करना काफी मुश्किल होगा.

इंफोसिस को सफल बनाने के कारण भारत के महानतम उद्यमी के रूप में मूर्ति एक आदर्श बन गए.

उम्मीदों के प्रतीक

Image caption मूर्ति ने छह इंजीनियरों के साथ महज 250 डॉलर से इंफोसिस की स्थापना की.

एक अध्यापक का बेटा, जिसकी परवरिश मध्य-वर्गीय परिवेश में हुई और उसने छह अन्य इंजीनियरों के साथ महज 250 डॉलर के निवेश से इंफोसिस की स्थापना की.

इसे अरबों डॉलर की फर्म बनाने के साथ ही मूर्ति उस उद्योग का चेहरा बन गए, जिसने भारत को वैश्विक प्रौद्योगिकी शक्ति के रूप में पहचान दिलाई.

इंफोसिस से मूर्ति के इस्तीफे के साथ ही भारतीय आउटसोर्सिंग का स्वर्णकाल पूरा हुआ. इस दौरान उद्योग ने 30-40 प्रतिशत वार्षिक दर से वृद्धि दर्ज. कुल राजस्व 2012 में बढ़कर 108 अरब अमरीकी डॉलर हो गया.

कंपनियों ने बड़ी संख्या में नियोजन किया, जिससे हजारों की संख्या में नई उम्र के इंजीनियरों को रोजगार की गारंटी मिली. वर्ष 2002 में जब मूर्ति ने कार्यपालक की भूमिका छोड़ी तो इंफोसिस 37 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही थी.

हालाँकि, हाल में कंपनी तिमाही दर तिमाही निराशाजनक खबरें दे रही थी.

नई रणनीति

Image caption इस साल अप्रैल में इंफोसिस के तिमाही नतीजों की घोषणा के तुरंत बाद कंपनी के शेयर 20 प्रतिशत गिर गए.

इंफोसिस के सह-संस्थापक सीईओ एसडी शिबुलाल ने “इंफोसिस 3.0” के नाम से एक अत्यधिक प्रचारित रणनीति पर काम किया, जिसके नतीजे सुखद नहीं रहे. कंपनी बेहद कम मार्जिन के साथ उच्च गुणवत्ता वाले कंसल्टिंग प्रोजेक्ट्स के सहारे चल रही थी.

हालांकि नई रणनीति कारगर साबित नहीं हो सकी. पिछले तीन वर्षों के दौरान इंफोसिस लगातार कमजोर पड़ती गई, और वित्त वर्ष 2013 के दौरान वह केवल 6.6 प्रतिशत की दर से बढ़ी.

वित्त वर्ष 2014 के दौरान 156,000 कर्मचारियों और 7 अरब डॉलर आमदनी के साथ अनुमान है कि कंपनी का प्रर्दशन उद्योग के मुकाबले कमतर रहेगा.

ऐसे मुश्किल दौर में निवेशक “इंफोसिस 4.0” का इंतजार कर रहे हैं, जो कंपनी के संस्थापक की पिछली कृति “मूर्ती 1.0” से बढ़कर हो.

अनोखा उदाहरण

Image caption नारायण मूर्ति ने एक ऐसे वक्त में इंफोसिस की कमान दोबारा थामी है, जब अधिकतर कॉरपोरेट दिग्गज सेवानिवृत्त हो जाते है.

इस दौरान वापसी के साथ ही मूर्ति को काफी कुछ साबित करना है. एक देश में जहाँ ऐसे कई उदाहरण हैं कि राजनीति, खेल और सिनेमा में उम्रदराज लोग अपने पदों से चिपके हुए हैं, मूर्ति ने ऐसे वक्त में वापसी की है जब ज्यादातर भारतीय कॉरपोरेट दिग्गज सेवानिवृत्त हो जाते हैं.

चुनौतीपूर्ण बाजार दशाओं में कंपनी को उबारना और बेताब निवेशकों के लिए जादुई परिणाम हासिल करना आसान नहीं होगा.

पिछले साल दो बार राजस्व के अनुमानों पर खरा न उतरने के बाद इंफोसिस ने तिमाही बिक्री और आय के अनुमान बताना बंद कर दिया.

मूर्ति ने अपनी वापसी की घोषणा के चार दिन बाद बीबीसी को बताया कि अनुमान जताने के बजाए अपने काम पर ध्यान देंगे.

इंफोसिस के पूर्व सीएफओ मोहनदास पई ने बताया कि “बिक्री पर फोकस करने और एक टीम के रूप में काम करने के लिए इंफोसिस को एक प्रेरणास्पद नेतृत्व की दरकार है.”

कड़ी प्रतिस्पर्धा

मूर्ति इंफोसिस की अग्रणी भूमिका से जब हटे थे, तब से उद्योग का परिदृश्य काफी बदल गया है. समय भी उनका साथ नहीं देता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है, क्योंकि मूर्ति को किसी भी बड़े बदलाव के लिए कम से कम दो से तीन साल की ज़रूरत होगी.

गार्टनर के अयंगर कहते हैं कि आईटी क्षेत्र के लिए आवश्यक फूर्ती की तुलना 100 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही कार के टायर बदलने से की जा सकती है. ऐसे में इंफोसिस के सामने एफ1 ट्रैक पर ही कार का इंजन बदलने की चुनौती भी है, जबकि दूसरे प्रतिस्पर्धी 100 मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ लगा रहे हैं.

वह कहते हैं कि, “इंफोसिस पहले ही पिछड़ चुकी है, क्या वह समय रहते उबर सकेगी और रफ्तार पकड़ लेगी. यह कहना काफी मुश्किल है.”

(ये लेखिका के निजी विचार हैं)(बीबीसी हिन्दी के क्लिक करें एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं. आप हमें क्लिक करें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

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