सियासी अखाड़े में नेताजी बनाम सीएम बेटा जी

घरेलू राजनीति के मज़े हैं. घर में सरकार, घर में ही विपक्ष, घर में तारीफ़ और घर में आलोचना! घर की सरकार तो ग़ैर की क्या दरकार?

भरापूरा परिवार, परिवार में सरकार, सरकार में परिवार. बेटा सीएम तो बाप प्रतीक्षा-पीएम.

बहू एमपी. नाती, पोते, चाचा, ताऊ, भतीजे, भांजे...इत्ती बड़ी यूपी, इत्ती जनता, इत्ते नेता, नेताओं के नेताजी!

एक दिन मौज में आकर नेताजी ने बेटे जी को अपनी पुरानी साइकिल देते हुए हुक्म दिया कि बुढ़ापे में ज़रा यूपी की सैर करादे.

आज्ञाकारी बेटे ने साइकिल के कैरियर पर बिठा, गोद में लैपटॉप देकर साइकिल क्या घुमाई कि यूपी की जनता लट्टू हो गई.

सब बलाइयाँ लेने लगे. बाप हो तो ऐसा, बेटा हो तो ऐसा. नज़र न लगे.

देखते-देखते साइकिल-लैपटैप यात्रा ने यूपी के लोटेक में हाईटेक साइकिल सरकार बनवादी.

साइकिल हिट. लैपटॉप हिट, सब कहने लगे कि वो आई साइकिल वो उतरा लैपटॉप.

समाजवादी समय

Image caption अखिलेश को उनके पिता सार्वजनिक रूप से फटकार लगाते रहते हैं.

यह यूपी का समाजवादी साइकिल छाप समय था. सड़क नहीं थी. साइकिल थी, बिजली नहीं थी.

लैपटॉप था, लाल टोपी में समाजवाद था. टोपी में लैपटॉप था.

साइकिल की तरह सरकार चलने लगी. चूंचरर मरर! .चूंचरररमरर! बेटा जी पेडल मारता, पिताश्री पीछे कैरियर पर बैठता.

इधर बाल बच्चे लटकते हैं, हेंडिल पर चाचे ताउ बैठते.

साइकिल पुरानी, वज़न ज़्यादा. सड़कों पर मायावती के हाथी वाले गड्ढे. साइकिल क्या करती?

सैफ़ई से निकलते ही साइकिल हुई पंक्चर.

नेताजी ने पंक्चर जोड़ने वाला सुलोचन सोल्यूशन देते हुए कहा- बेटा गढढन ते बचाय कैं निकरो! बेलेंस रक्खो! हम हैं न!

बेटा जी फिर पेडल मारे. चूँचरर मरर चूँचरर मरर. चली साइकिल. साइकिल पर लैपटॉप. लैपटॉप में नेताजी.

रेवड़ियों की तरह बंटने लगे लैपटॉप. बाल बच्चे सब लैपटॉप में मस्त!

यूपी का बोझ

नो पानी? नो प्रोब्लम! नो बिजली? नो मनी नो प्रोब्लम लैपटॉप तो मिला!

साइकिल लखनऊ के पास पहुंची थी कि फिर पंक्चर हो गई.

नेता जी ने फिर कहा: बेटे जी ठीक से चलाओ! सरकार है. अगर हमारा बोझ नहीं उठा सकते तो फिर यूपी का बोझ कैसे उठाओगे?

बेटे जी ने कहा, हे पिता श्री आप महान हैं. हम बालक हैं. ग़लती हो गई. हमें फटकारिए. आपकी फटकार अच्छी लगती है.

आज्ञा दीजिए! हमें इसी तरह सिखाते रहिए. क़सम आपकी मैं आपको निराश नहीं करूंगा.

यूपी की जनता ठहरी. अपने रोज़मर्रा के कामों में लग गई. कामकाज में झगड़े रगड़े. कहीं दंगे. कहीं फ़साद.

एक पुलिस अफ़सर मर गया. मीडिया चीख़ी: जनता लड़ गई! लड़ गई!

नेता जी ने फिर कहा: बेटा जी आपको साइकिल सहित सरकार दी. आप पेडल मारते ही हांफ़ रहे हैं. दमख़म दिखाइए. कुछ एक्शन करते दीखिए!

बेटा जी ने भरी सभा में अपने कान पकड़कर कहा: आपने सही कहा पिता श्री! हमारी आलोचना करते रहिए.

हमें आप न कहेंगे तो क्या बाहर का कहेगा? बाहर की हम नहीं सुननेवाले! आप हमें मुर्ग़ा बनाइए! हम बनेंगे मुर्ग़ा!

15 दिन गुज़रे कि फिर कहीं गुंडो ने एक पुलिस अफ़सर को मार दिया. मीडिया ने हल्ला किया. मरवा दिया, मरवा दिया.

नेता जी की नसीहत

Image caption कानून व्यवस्था को लेकर भी सरकार पर सवाल उठते रहते है.

नेता जी ने फिर भरी सभा में कहा: बेटा जी मीडिया झूठ बोलता है. उसे बोलने का मौक़ा काहे दे रहे हो.

अरे वो शिव्वू ज़रा मीडिया को देखियो तो. हम पीएम के कंडीडेट न होकर अगर सीएम होते तो पंद्रह दिन में सब ठीक कर देते!

बेटा जी ने कहा: आप महान हैं. आप धन्य हैं. आपके चरण कहां हैं. आप इस बालक को हमेशा वक़्त पर सावधान करते हैं. हम मुर्ग़ा बनने को तैयार हैं?

नेता जी बेटा जी पर प्यार उमड़ आया: मेरे नौनिहाल! मुर्ग़ा बनें तेरे दुश्मन! हमने असली घी खाया है. दंड पेले है.

कोई इधर उधर करता को तुरंत वहीं धोबीपाट देते!

तुम ठहरे डालडा वाले छोकरे. अरे ज़रा असली घी खाओ. डंड बैठक से पचाओ. सरकार को धोबीपाट से चलाओ.

सरकार ही तो है! उसकी क्या मजाल जो न चलेगी. हमें देखो. हम कुछ दिन बाद देश चलाने वाले हैं और तुम अभी से हांफ रहे हो. लो हम धक्का देते हैं.

हे पाठकों इस तरह चली यूपी में सरकार. सत्ता पक्ष घर में विपक्ष भी घर में. जिसे सरकार चलाने की ट्रेनिंग लेनी हो नेताजी के अखाड़े पहुंचे.

एक साथ ही सत्ता पक्ष और विपक्ष कैसे चलाया जाता है? उसके दांव पेच सीखे. वो भी फ्री में. अखाड़े के गेट पर बोर्ड टंगा है. नेताजी एंड संस!

जब एक बार एक ही सीन रिपीट होने लगा तो यूपी की खुर्राट जनता कहने लगी: यह तो नेता जी की नौटंकी है!

बाप फटकारता रहता है. बेटा कान पकड़ता रहता है. नौटंकी बंद करो!

घर में सत्ता, घर में विपक्ष

Image caption सरकार ने लैपटॉप बंटवाया लेकिन उसे चार्ज करने के लिए बिजली नहीं.

नेता जी ने फिर सभा बुलाई और बेटे जी को नसीहत दी: अगर हम होते तो पंद्रह दिन में सब ठीक कर दिया होता. एक तुम हो कि...

बेटे जी ने फिर कहा: आप धन्य हैं पिता श्री! फिर वक़्त पर आपने सहारा दिया.

आपकी इज़्ज़त हमारी इज़्ज़त है. आपको दिल्ली का पीएम न बनवाया तो क्या कहना.

मसखर यूपी! गली गली मसखरे! हर दिन कुछ न कुछ होने लगा है.

हर शाम नेता जी बेटे जो को कहने लगे: देखो ठीक से चलाओ अगर हम होते तो पंद्रह मिनट में सब ठीक कर देते.

इसी तरह सरकार चलती रही. बेटे की सरकार. बाप का विपक्ष. बेटा कुछ करता तो पिता आलोचना करते.

साइकिल चलती चूं चरर चरर

बेटे को सीएम बनाया खुद को पीएम की तरह पेश किया. बेटे ने पिता श्री की प्रतिभा पर प्रसन्न होकर साइकिल में हवा दी.

पिता ने कहा: बेटा काम कर, बेटा काम करने लगा.

पिता ने कहा सरकार चला वो, सरकार चलाने लगा. वह न भी चलाता तो भी एक दिन सरकार सरकार की तरह ही चलती.

लेकिन बुरा हो विपक्ष का. ज़रा सी बात होती तो कहने लगता कि सब गड़बड़ है.

(ये व्यंग्यकार के निजी विचार हैं)

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