उत्तराखंड: ‘मृतक की शॉल ओढ़कर दिन गुज़ारे'

अवधेश, उत्तराखंड बाढ़
Image caption अवधेश एक जून को ही केदारनाथ पहुँच गए थे.

उत्तराखंड में बारिश और भूस्खलन से मची तबाही इतनी विकराल हो चुकी है कि जिन लोगों को बचाया जा रहा है वे पीछे मुड़कर देखना भी नहीं चाहते.

सैकड़ों अब भी लापता हैं और हज़ारों की तादाद में लोग मदद की आस लगाए बैठे हैं.

लेकिन जो बचाए जा सकें हैं, उन्हें ज़िन्दगी दोबारा पटरी पर लाने में अभी ख़ासा वक़्त लगेगा.

अवधेश कुमार एक जून को ही केदारनाथ पहुंचे थे और शुक्रवार शाम तक वहीं फंसे हुए थे.

उत्तराखंड बाढ़ पर विंशेष

मंदिर से महज़ 200 मीटर दूर बैठे अवधेश ने कहा, "सोचा था बुढापे में एक तीर्थ कर लें, तो पुण्य मिलेगा. तीन दिन पहले खाने का सामान ख़त्म हो गया. एक बह गए व्यक्ति का शॉल ओढ़कर गुज़ारा किया. कसम खाई बाबू, कभी पहाड़ नहीं जाएँगे."

अवधेश का कहना है कि उनकी जान इसलिए बच पाई क्योंकि वे और उनकी पत्नी केदारनाथ मंदिर के पीछे एक धर्मशाला की पहली मंज़िल पर रुके थे.

बेरुखी

एक तरफ जहाँ पहाड़ से नीचे आने वालों को दवाएँ मुहैया कराई जा रहीं है, वहीं दूसरी तरफ लोगों के पास अपनी दर्द भरी दास्तान के पुलिंदे मौजूद हैं.

कई तीर्थयात्रियों और सैलानियों की शिकायत ये भी है कि स्थानीय लोगों ने पहले तो उनकी खूब देखभाल की, लेकिन बाद में उन्हें घर से जाने को कह दिया.

हालांकि सच ये भी है कि अभी तक मीडिया और अख़बारों में इस बात पर चर्चा ज्यादा होती रही है कि कितने यात्री बचे और कितने नहीं.

हकीकत ये भी है कि दर्जनों गाँव मलबे में दब चुके हैं और वहां रहने वाले सैकड़ों बाशिंदों का अभी तक पता नहीं चल पाया है.

समय से पहली हुई इस बारिश ने पूरे उत्तराखंड का जैसे मिजाज़ ही बदलकर रख दिया है.

प्रशासन और सरकार कह तो रही है कि हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन सच्चाई ये भी है कि खुद प्रशासन का कितना नुकसान हुआ है इसका अंदाजा ठीक-ठीक अभी उन्हें भी नहीं है.

( बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकतें हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार