उत्तराखंड: डायनामाइट से हुआ तबाही का इंतज़ाम?

Image caption प्रकृति के नियमों की अनदेखी करके बसाए गए गाँव और नगर ही आपदा के शिकार हुए हैं.

उत्तराखंड के कच्चे पहाड़ों में रहने वाले लोग परंपरागत तरीक़ों से अपने जंगलों, बुग्यालों और पहाड़ों को बचाने की कोशिश करते रहे हैं. दूसरी तरफ सड़कें, बाँध आदि के निर्माण के लिए विस्फोटकों का बेरोकटोक इस्तेमाल किया जा रहा है.

पर्यावरणविद, भू-वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा है कि पहले से ही कच्चे इन पहाड़ों में विकास के रोड रोलर ने विभीषिका की भूमिका तैयार कर दी थी.

दस्तावेजों के अनुसार गढ़वाल के जोशीमठ ब्लॉक में ही पिछले कुछ बरसों में हज़ारों किलो विस्फोटकों का इस्तेमाल करके पहाड़ों का पेट खोदा गया है.

सरकार और प्रशासन कहता है कि बड़े बाँधों, बड़ी पनबिजली परियोजनाओं और सड़क निर्माण के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल ज़रुरी है.

सरकार की ओर से मुहैया करवाए गए आँकड़ों के मुताबिक जोशीमठ ब्लॉक में पहाड़ कटाव के लिए साल 2006 से 2011 के बीच कुल 20,632 किलोग्राम विस्फोटक और 1,71,235 डेटोनेटरों का प्रयोग किया गया है.

जोशीमठ-गोपेश्वर के पहाड़ काफी संवेदनशील माने जाते हैं. बड़े पैमाने पर विस्फोटकों के प्रयोग से पहले से ही कच्चा हिमालय पहाड़ और भी कमजोर हो जाता है.

Image caption लोक निर्माण विभाग से प्राप्त दस्तावेज.

वरिष्ठ भू-वैज्ञानिक एवं जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस सांइटिफिक रिसर्च में मानद प्रोफेसर डॉ. खड्ग सिंह वल्दिया के अनुसार “इन विस्फोटों के कारण धरती में छोटे-छोटे भूकंप (माइक्रो अर्थक्वेक) आते हैं. जब बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, ट्रकें, बसें जाती हैं तब भी माइक्रो भूकंप आते हैं.

धरती की पुरानी दरारें इन माइक्रो भूकंपों से हिल जाती हैं. प्रतिदिन लाखों की संख्या में उठने वाले ये माइक्रो भूकंप पहाड़ों को कमजोर करते जाते हैं.”

उत्तराखंड में आई आपदा में व्यापक स्तर पर जान-माल का नुकसान होने की एक बड़ी वजह भू-स्खलन रही है.

विस्फोटकों का व्यापक प्रयोग इन भू-स्खलनों में हुई बढ़ोत्तरी का एक बड़ा कारण है.

विस्फोटकों का सर्वाधिक प्रयोग दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कें बनाने के लिए किया जाता है. साल 2000 में उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद राज्य में सड़क निर्माण में अत्यधिक तेजी आई है.

Image caption विस्फोटकों से पहाड़ी ढालें भंगुर हो जाती है जिससे भू-स्खलन बढ़ा है.

केंद्रीय विश्वविद्यालय, गढ़वाल में आपदा प्रबंधन शोध अधिकारी डॉ. एसपी सती कहते हैं कि “साल 2000 में उत्तराखंड में सिर्फ 8 हजार किमी रोड थी. आज यहाँ 23-24 हज़ार किमी सड़कों का निर्माण हो चुका है.”

ऐसा नहीं है कि विस्फोटकों का प्रयोग केवल इसी इलाके में किया जा रहा है.

आरटीआई कार्यकर्ता गुरुविंदर सिंह चढ्ढा को सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार दूसरे क्षेत्रों में भी विस्फोटक का प्रयोग किया जा रहा है.

हल्द्वानी, रामनगर, रानीखेत, टनकपुर इलाकों में भी पिछले पाँच सालों में तीन हज़ार किलोग्राम से ज़्यादा विस्फोटक और छब्बीस हज़ार से ज़्यादा डेटोनेटरों का प्रयोग किया जा चुका है.

अभी तो इस आपदा में स्थानीय लोगों को जो नुकसान हुआ है उसी का पूरा आकलन नही हो सका है. पर्यावरण को हुए नुकसान के आकलन में शायद वर्षों लग जाएँ.

सूचना के अधिकार के तहत जब लोक निर्माण विभाग के कई प्रखण्डों से जब यह पूछा गया कि इन विस्फोटकों से पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है तो इनमें से ज़्यादातर विभागों के खण्डीय सूचना अधिकारियों ने अपने जवाब में यह कहा कि 'इससे पर्यावरण को कोई क्षति नहीं पहुँचाई गई है या पहुँची है.'

हालाँकि गोपेश्वर के खण्डीय लोक सूचना अधिकारी ने अपने जवाब में कहा कि "पर्यावरण की क्षति को मापने का मानक खण्ड में उपलब्ध नहीं है."

बाँध और बिजली की चाह से उपजी त्रासदी

Image caption सड़कों के अंधाधुंध निर्माण से पर्यावरण को खतरा पहुँचा है.

पर्यावरणविद राज्य में बड़े बाँधों और बड़ी पनबिजली परियोजनाओं पर सवाल उठाते रहे हैं.

Image caption आपदा से सबसे ज़्यादा प्रभावित क्षेत्र में ही सबसे ज़्यादा बिजली परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं.

दस्तावेजों के अनुसार उत्तराखंड में इस समय कुल 12 बिजली परियोजनाएँ चालू हैं जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 508 मेगावाट के करीब अनुमानित है. इसके अलावा नौ बिजली परियोजनाएँ निर्माणाधीन हैं और अन्य 30 परियोजनाएँ प्रक्रिया में हैं.

ये सभी परियोजनाएँ पिछले दो दशकों के भीतर की है.

डॉ. एसपी सती बताते हैं कि केदारनाथ को छोड़ दिया जाए तो है तो निचले क्षेत्रों में आपदा का आकार जो बहुत विराट हुआ उसका बड़ा कारण पनबिजली परियोजनाओं से निकली गाद या मलबा था.

डॉ सती के अनुसार केवल श्रीनगर बाँध से पाँच लाख घनमीटर मलबा सीधे नदी में डाला गया है. इसके लिए किसी तरह के सुरक्षा कवच का प्रयोग नहीं किया गया. यह सारा मलबा नदी के पानी के साथ बहकर निचले इलाके में चला गया.

डॉ. सती का अनुमान है कि उत्तराखंड में विभिन्न नदियों पर करीब 70 नए बाँध निर्माणाधीन हैं.

उल्लेखनीय है कि आरटीआई से मिले दस्तावेजों के अनुसार उत्तराखंड सरकार द्वारा निर्मित, निर्माणाधीन एवं अनुमोदित 51 जलविद्युत परियोजनाओं में से सबसे ज़्यादा 31 परियोजनाएँ उत्तराखंड में आई विभीषिका में सबसे ज़्यादा प्रभावित गढ़वाल मण्डल के चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग एवं पौड़ी इलाके में हैं.

डॉ. सती के अनुसार यदि एक बाँध से दो लाख घनमीटर मलबा निकले तो भी सत्तर बाँधों से एक करोड़ चालीस लाख घनमीटर मलबा निकलेगा. यह मलबा उत्तराखंड के लिए विभीषिका का कारण बनता जा रहा है.

उत्तराखंड में मलबे की बढ़ोत्तरी के दूसरा सबसे बड़ा कारण सड़कों का अंधाधुंध निर्माण है.

डॉ. सती ने हमें बताया कि उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद पिछले एक दशक में उत्तराखंड में पन्द्रह-सोलह हजार किमी सड़कों का निर्माण हुआ है.

डॉ. सती कहते हैं कि “पहाड़ में एक किमी सड़क बनाने में 20-25 हजार घनमीटर मलबा एकत्रित होता है. आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि 15-16 हजार किमी सड़क बनाने में कितना मलबा इकट्ठा हुआ होगा. ये सारा का सारा मलबा ढालों में डाल दिया जाता है जो नालों के माध्यम से नदियों में जाता है”

"नदी का विस्तार बारिश से कहीं ज़्यादा इस अतिरिक्त मलबे से हुआ जो विशुद्ध तौर पर मानवजनित था."

उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े रहे शमशेर सिंह बिष्ट कहते हैं “मैदानी क्षेत्रों के तरीके से ही पहाड़ी क्षेत्रों में सड़के बनाएँगे तो कुछ देर के लिए तो सड़कें बन जाएगी लेकिन बाद में यही सड़क आप के लिए समस्या पैदा करेगी.”

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