दलित पुरोहित: क्या टूटेगी जाति की दीवार?

राजस्थान में दलितों के एक बड़े हिस्से ने अपने सामाजिक, पारिवारिक और धार्मिक कार्यों के लिए खुद के बीच से ही पंडित तैयार कर लिए हैं.

राजस्थान में दलित समुदाय के ये पुरोहित अपने समाज में कर्मकाण्ड और धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं.

ये दलित पुरोहित वैसे ही कर्मकाण्ड सम्पन्न करते हैं जैसे ऊँची जाति के ब्राह्मण. दलितों का कहना है इससे छुआछूत पर रोक लगेगी.

लेकिन कुछ दलित पंडितों का कहना है इतना सब करने के बाद भी उनके सामाजिक दर्जे में कोई सुधार नहीं हुआ है.

कुछ गलत नहीं

शादी विवाह के दिनों में इन दलित पंडितो की अपनी बिरादरी में बड़ी मांग रहती है.

कोटा के नाथूलाल वाल्मीकि समाज से हैं. मगर वे अपने नाम के आगे पंडित लिखते हैं.

Image caption भारत में अब भी धार्मिक कर्मकांड मुख्यतः ब्रह्माणों का ही काम माना जाता है

पंडित नाथूलाल जब वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हैं तो उनकी ध्वनि और भाव भंगिमा में पंडित होने के दर्शन होने लगते हैं. क्योंकि मन्त्र इन्सान की तरह ये नहीं देखते कि उसे स्वर देने वाला किस जाति धर्म से है.

नाथूलाल ने कर्म काण्ड, यज्ञ-हवंन और मंत्रोच्चार तब सीखा जब दलितों को धार्मिक अनुष्ठान के लिए पंडित नहीं मिले.

नाथूलाल को यह अपमानकारी लगा कि दलितों के एक वैवाहिक समारोह में पंडित वादा करके भी नहीं आए। इसके बाद उन्होंने पुरोहिताई का काम सीखने की ठान ली.

पंडित नाथूलाल ने न केवल खुद पुरोहिताई का काम सीखा बल्कि अपने समुदाय के करीब एक दर्जन लोगो को इस काम में प्रशिक्षित कर दिया.

वह कहते हैं- मैं अब गृह प्रवेश, पाणिग्रहण संस्कार, गृह शांति हवन जैसे काम सम्पन्न करता हूं. किसी के बच्चा पैदा होने पर कुंडली बना देता हूं, मुंडन संस्कार के लिए मुहूर्त का भी काम भी करता हूं.

पंडित नाथूलाल को इस काम से सामाजिक बराबरी का सुख मिलता है .

वह कहते हैं, ''मेरे लिए यह सुकून और सम्मान की बात है कि हरिजन होने के बावजूद भी मैं पंडितों के बराबर धार्मिक अनुष्ठान कराता हूं.. ये सब मैं निशुल्क करता हूं. कोई अगर दक्षिणा दे तो ले भी लेता हूं.

दलितों के पुरोहिती करने पर जयपुर में धर्म शास्त्रों के जानकार पंडित के के शर्मा कहते है- शास्त्रों में समाहित ज्ञान जाति बिरादरी में नहीं बंधा है. कोई भी व्यक्ति इस ज्ञान का इस्तेमाल कर पूजा पाठ और अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है. अगर दलित समाज के लोग ये कर रहे है तो कुछ भी गलत नहीं है.

कमज़ोर होगी दीवार

ये धर्मशास्त्र है. मगर समाज का यथार्थ कुछ अलग है.माथे पर पंडितों जैसा तिलक लिए नाथूलाल कहते हैं इतना करने के बाद भी छुआछूत उनका पीछा नहीं छोड़ती, ''मैं भी हिन्दू हूँ, पूरी तरह सात्विक जीवन जीता हूं, फिर भी हमें अछूत समझा जाता है। इससे मेरा दिल दुखता है. कुछ पंडित इसे ठीक नहीं मानते. वो सांमने दिखावे के तौर पर सम्मान देते हैं मगर पीठ पीछे बुराई करते हैं कि दलित होकर पंडित का काम कर रहा है.

Image caption लादूराम बैरवा अंग्रेजी के अलावा कई अन्य विषयों में एमए हैं

लेकिन दलित अधिकार के प्रवक्ता पी एल मीमरोठ इसे एक अच्छी शुरुआत मानते हैं. वह कहते हैं इससे समाज में बड़ा बदलाव आएगा, '' बिलकुल इससे बड़ा फर्क पड़ा है. पहले लोग जुबान नहीं खोलते थे.चेतना की कमी थी. दरअसल भू मंडलीकरण से चीजें बदली हैं. दलित पहले गांव तक सीमित थे. भू मंडलीकरण के साथ वो शहरों में आने लगे. उनकी आर्थिक हालत सुधरी है और सोच में बदलाव आया है. न केवल वाल्मीकि समाज बल्कि दलितों में जाटव, बैरवा और धोबी समाज में भी इस तरह प्रयास हुए है और उनके अपने लोग पंडित बनकर कार्य सम्पन कराते हैं.”

जयपुर के लादूराम बैरवा ने अंग्रेजी सहित कई विषयों में एमए तक तालीम हासिल की है.

वह अब विवाह विधि और ज्योतिष में पारंगत हैं। वह कहते हैं, “पंडित दलितों के धार्मिक पारिवारिक अनुष्ठान में आना पसंद नहीं करते हैं। लिहाजा दलितों ने अपने स्वयं के लोगो को पुरोहिताई का प्रशिक्षण दिलवा दिया है।” श्री बैरवा बताते हैं कि जयपुर में अलग-अलग दलित बिरादरियो के करीब एक दर्जन लोग पुरोहिताई में निपुण हैं.

दलितों को यकीन है उनके इन प्रयासों से ऊंच-नीच और छुआछूत की सदियों पुरानी दीवार टूटे न सही, मगर कमजोर जरूर होगी.

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