केदारनाथ: वह चमत्कारी कुंड और नदी में बहते होटल

  • 29 जून 2013
(जियॉलॉजिकल सर्वे द्वारा 1882 में खींची गई केदारनाथ मंदिर की तस्वीर)

दिल में अब भी कहीं एक बारीक सी उम्मीद बाक़ी है कि वो पानी का छोटा सा कुंड शायद अब भी बचा रह गया हो.

केदारनाथ मंदिर की ओर मुँह करके खड़े हों तो दाहिने हाथ की ओर... धर्मशालाओं की क़तारों के पीछे जहाँ से पहाड़ तनिक ऊँचा सा उठता है.

वहीं पत्थर की मंदिरनुमा छतरी के भीतर पानी का प्राकृतिक स्रोत. अंदर बस इतनी जगह कि एक आदमी बमुश्किल खड़ा हो सके.

मुझे अकेले वहाँ जाने की इजाज़त नहीं थी लेकिन फिर भी मैं गया क्योंकि मुझे किसी ने बताया कि वो चमत्कारिक कुंड है. अंदर खड़े होकर बोलो– हर हर गंगे तो भगवान प्रतीक में जवाब देते हैं और पानी के कुंड से बुलबुले निकलते हैं.

'हर हर गंगे'

मैं भगवान के इस प्रतीकात्मक जवाब की पड़ताल करने ही चुपचाप वहाँ गया था और अंदर पहुँचकर ज़ोर से कहा – हर हर गंगे.

कुंड से एक साथ दर्जनों बुलबुले सतह पर आकर तैरने लगे. ये भगवान का जवाब था या हिमालय के उस हिस्से की नाज़ुकी जहाँ आवाज़ से होने वाली जुम्बिश भी असर डालती है.

मेरे बचपन की स्मृति में अब भी केदारनाथ मंदिर के आसपास कुछ दुकानें और धर्मशालाएँ ही हैं.

उन स्मृतियों में गौरीकुंड भी है. और वहाँ रात के ख़ामोश अँधेरे में डूबी हुई, शांत और निश्चल कुछ एक हलकी इमारतें भीं.

केदारनाथ मंदिर (फ़ाइल फोटो)

और एक तप्तकुंड – कड़कड़ाती ठंड में नहाने के लिए उस तप्तकुंड में पैर डालें तो लगे जैसे खौलते पानी में पैर डाल दिया हो, पर कुंड में पूरे उतर जाएँ तो पानी गुनगुना लगे.

मेरी बचपन की स्मृति का गौरीकुंड कितना अलग है. वहाँ इतने होटल कहाँ?

टेलीविज़न की तस्वीरें देखकर लगा जैसे दिल्ली और गुड़गाँव की ग्रुप हाउसिंग सोसाइटीज़ को सीधे उखाड़ कर गौरीकुंड में रोप दिया गया हो.

लकी गेस्ट हाउस, बॉम्बे होटल... जैसे नाम. ख़बर आई कि एक दो नहीं, गौरीकुंड में पूरे चालीस होटल मंदाकिनी में बह गए- चालीस होटल.

मेरी बचपन की स्मृति में गौरीकुंड से केदारनाथ का वो चौदह किलोमीटर लंबा पैदल रास्ता भी है – ख़तरनाक पहाड़ी रास्ता. जिस सँकरे से रास्ते ख़च्चर पर बैठकर जाने से बेहतर अपने पैरों पर भरोसा करना हो.

कई बरस बाद अख़बार वालों ने बुज़ुर्ग अमिताभ बच्चन को इसी रास्ते पर कमज़ोर गढ़वाली क़हारों के कंधे पर टिकी डोली पर तीर्थयात्रा करने वाली तस्वीरें छापी थीं.

विकास का फ़ायदा?

हिमालयी सुनामी के सामने जो आया वह न बचा

सात किलोमीटर पैदल चलने के बाद दम मारने के लिए बनाया गया पड़ाव – रामबाड़ा.

चाय की कुछ दुकानें, उनके आसपास सुस्ताते तीर्थयात्री और कुछ घोड़े-ख़च्चर वाले.

हिमालय का ये हिस्सा तब कितना शांत, कितना प्राकृतिक था.

तब उत्तराखंड नहीं बना था. उसके विकास की परियोजना नहीं बनी थी.

पहाड़ को विकास के रास्ते पर धकियाने वाले नेता तब देहरादून नहीं लखनऊ में होते थे– पहाड़ से बहुत दूर.

अब विकास पहाड़ की नस नस में बह रहा है. बिजली बनानी ज़रूरी है.

पनबिजली परियोजनाएँ चलाने के लिए पहाड़ों में सुरंगें खोदना ज़रूरी है.

तीर्थयात्री आते हैं, देसी और विदेशी सैलानी आते हैं, ज़मीन के ख़रीदार आते हैं. सब कहाँ रहेंगे?

एक दो मंज़िला होटल से कैसे काम चलेगा? नदी किनारे इतनी ख़ाली ज़मीन है – नदी ने तो रास्ता बदल दिया है. ख़ाली ज़मीन का इस्तेमाल क्यों न किया जाए?

नदी किनारे बने घर, होटल उसके प्रबल प्रवाह में बह गए

छह, सात, आठ मंज़िले होटल बनें तो कम जगह में ज़्यादा सैलानियों को ठहराया जा सकता है.

और क्यों न इस विकास का फ़ायदा स्थानीय लोग उठाएँ? कवियों का काम सिर्फ़ कविता लिखना ही हो– ये किसने कहा है?

लेखक और अध्यापक भी अगर इस विकास के तरफ़दार हुए और मुनाफ़े पर नज़र मारने लगे तो क्या बुराई है?

वो प्लेटो के ज़माने के कवि-लेखक नहीं, नए विकासशील भारत के रचयिता हैं. उनके बेटे क्यों फटेहाल कविपुत्र कहलाएँ?

क्यों न वो पैसा कमाने के लिए ठेकेदारी करें, होटल या हॉस्पिटैलिटी बिज़नेस में जाएँ और विकास का फ़ायदा उठाएँ?

ज़ख़्मी पहाड़, टूटे पुल और मारे गए या लापता लोगों की तस्वीर को पृष्ठभूमि में रखकर एक बार फिर इस वाक्य पर ग़ौर करें– विकास का फ़ायदा !!

मेरे दिल में अब भी एक कमज़ोर सी उम्मीद बची हुई है. केदारनाथ का मंदिर बच गया.

हो सकता है वो छोटा सा कुंड भी बच गया हो, जहाँ एक बार में सिर्फ़ एक ही आदमी खड़ा हो सकता था. और उसकी आवाज़ भी धरती को कँपकँपा देती थी.

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