'भ्रष्टाचार गलत, तो चालान पर 100 रुपये देना सही कैसे'

भारत का मध्य वर्ग
Image caption भारत में मध्य वर्ग का दायरा लगातार बढ़ रहा है

भारत में मध्य वर्ग का दायरा तेजी से बढ़ रहा है. उसकी सोच में भी बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन ये बदलाव बड़ा ही पेचीदा है.

जब मैंने मध्यवर्ग पर अपनी किताब लिखी थी, तो कुछ हद तक वो मध्य वर्ग की आलोचना भी थी. दरअसल ये वर्ग प्रभावशाली होते हुए भी अपनी ही दुनिया में मगन था. अगर उसकी पानी, बिजली और घर की आम जरूरतें पूरी होती रहें तो बाकी चीजों से उसे कोई लेना देना नहीं था.

लेकिन 1991 के बाद से भारत में हुए आर्थिक सुधार का सबसे बड़ा फायदा मध्य वर्ग को हुआ. उसका दायरा बढ़ा और आमदनी बढ़ी. कुछ आंकड़ों के हिसाब से अब मध्य वर्ग की संख्या 17 करोड़ है. इनमें ऐसे परिवार भी शामिल हैं जहां एक से ज्यादा सदस्य कमाते हैं और उनकी मासिक आमदनी एक लाख रुपये है.

भारत के मध्य वर्ग में हर साल शामिल होने वाले लोगों की संख्या ऑस्ट्रेलिया की समूची जनसंख्या से ज्यादा है. अनुमान है कि भारत में 2015 तक मध्य वर्ग की संख्या 29 करोड़ के आसपास हो जाएगी. ये बड़ा जनसमुदाय है जो पूरे देश में फैला है.

कैसे आया बदलाव

भारत का यही मध्य वर्ग अखबार पढ़ता है, वही समाचार चैनल देखता है और वहीं इस शिक्षा प्रणाली की उपज है. इसके कुछ अखिल भारतीय सरोकार भी हैं. और कई चीजों की वजह से उनके नजरिए में बदलाव आया है.

मेरे ख्याल से पहला बदलाव जैसिका लाल केस से आया है. जब उस मामले को रफा दफा करने की कोशिश की गई, तो मध्य वर्ग पहली बार अपने छोटे छोटे घरौंदों से बाहर निकला. इसके बाद अन्ना हजारे के आंदोलन ने मध्य वर्ग को भ्रष्टाचार जैसे सार्वजनिक मुद्दे पर सक्रिय किया.

आम आदमी का आंदोलन मध्य वर्ग की उपज है. भले ही वो सफल हुआ हो या नहीं, लेकिन उसमें एक आक्रोश है, एक असंतोष है. और इसीलिए वो कुछ सार्वजनिक मुद्दों पर अपनी बात कहना चाहता है.

इसमें दो चीजों का खास तौर से योगदान है. पहला है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और दूसरा मोबाइल व सोशल मीडिया. खासकर सोशल मीडिया के जरिए मध्य वर्ग कुछ मुद्दों पर आपस में जुड़ गया है.

आमदनी बढ़ने के साथ मध्य वर्ग के सामाजिक नजरिए में भी बदलाव आया है. अब लोग अंतरजातीय विवाह या लड़के-लड़कियों की दोस्ती पर पहले की तरह नहीं चौंकते हैं.

धूप छांव

Image caption आमदनी के आधार पर मध्य वर्ग में शामिल होने वाले लोगों की सोच में बदलाव धीरे धीरे ही आ रहा है

लेकिन मध्यवर्ग में आ रहे बदलाव को एक पैमाने पर नहीं मापा जा सकता. एक मध्यवर्गीय परिवार में किसी मुद्दे पर अलग अलग राय देखने को मिलती है. कई बार युवा पीढ़ी का रवैया भी बहुत कट्टरपंथी नजर आता है.

खास तौर से जो लोग अभी मध्य वर्ग में दाखिल हुए हैं, उनका पहनावा, रहन सहन और अपेक्षाएं भले बदल जाएं लेकिन उनकी सोच रातों रात नहीं बदलती है.

अगर आप दहेज पर कोई सर्वेक्षण करें तो ज्यादातर युवा कहेंगे कि इस बारे में जो माता पिता कहें, वहीं करना चाहिए जबकि सार्वजनिक मंच पर उन्हें ये कहने में परहेज नहीं होगा कि दहेज गलत है.

इसी तरह कौमार्य का मुद्दा अब मध्य वर्ग में एक तबके के लिए अहम नहीं रही है. लेकिन एक तबका अब ऐसा भी है जो महिलाओं की समानता की बात करने के बावजूद अपनी निजी जिंदगी में उस बदलाव को जगह नहीं देना चाहता है और न इसे जरूरी समझता है.

इस तरह मध्य वर्ग में परिवर्तन और परिवर्तन का आभाव धूप छांव जैसी स्थिति है जो साथ साथ चल रही है. इसलिए भारत बहुत जटिल है. अगर कोई मध्य वर्ग में आ जाता है तो उसका ये मतबल नहीं है कि वो ऊपरी तबके के उदारवाद से खुद को जोड़ लेगा.

सभ्यताओं का टकराव

मध्य वर्ग के जो लोग अपने ड़्राइंगरूम में बैठकर भ्रष्टाचार की आलोचना करते हैं, वही अपना चालान कटते समय पुलिस को 100 रुपये थमाना या अपनी किसी फाइल को आगे बढ़ाने के लिए किसी को ‘खिलाना पिलाना’ बुरा नहीं समझते हैं.

आज सभ्यताओं का टकराव हो रहा है. जो लोग मध्य वर्ग में नए-नए प्रवेश करते हैं उनके पास पैसा होता है लेकिन अभी उसी पहुँच और समता के स्तर पर लैंगिंक मेलजोल का अवसर नहीं होता है.

फिल्में देखदेख कर उन्हें लगता है कि हर लड़की उपलब्ध है जबकि असलियत कुछ और होती है. वो एक नई दुनिया में प्रवेश करते हैं जहाँ पुराने रीति-रिवाजों के मायने बिल्कुल ही बदल जाते हैं.

वे देखते हैं कि असलियत में पब में, डिस्को में पुरुष और महिलाएँ मिल रहे हैं. तो एक टकराव होता है और उनका जो व्यवहार है, उसे इस संदर्भ में ही आप समझ सकते हैं.

कब होगी क्रांति

Image caption भारत में आर्थिक सुधारों के बाद लोगों की खर्च करने की क्षमता में वृद्धि हुई है

जब बदलाव वास्तविक उदारवादी मूल्यों और कॉस्मोपॉलिटिज्म पर आधारित होता है तो यह मध्य वर्ग ही नहीं, देश के लिए भी सही होता है. लेकिन अगर यह बदलाव दिखावे का हो, अगर यह बदलाव पूर्ण न हो तो फिर ये बहुत ही अप्रत्याशित पाखंड को जन्म देता है, जो भारतीय मध्य वर्ग की खासियत है.

यह एक संक्रमण काल है, उसमें अभी मध्य वर्ग में न संपूर्ण क्रांति आई है, न सोच में पूरी तरह से बदलाव आया है. न ही वो अब सामाजिक और व्यापक मुद्दों से उस तरह से जुड़े हैं.

दिल्ली में निर्भया मामले में एक बलात्कार के बाद युवा पीढ़ी रायसीना हिल पर चढ़ गई. दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में रोज बलात्कार हो रहे हैं, लेकिन वो उनकी जिन्दगी से जुड़ी शख्सियत या किरदार के साथ हुआ तो आक्रोश उत्पन्न हुआ.

इस समय मध्य वर्ग बदलाव से गुजर रहा है. सबसे बड़ी क्रांति तब होगी जब मध्य वर्ग यह समझेगा कि जिस तरह का बदलाव वह चाहता है, वह केवल मध्य वर्ग के लिए ही संभव नहीं है. उसको अपने नीचे वाले तबकों के विषयों से जुड़ना होगा, तब बदलाव क्रांति का रूप लेगा.

(पवन वर्मा कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके हैं और उन्होंने मध्य वर्ग पर 'द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास' नाम की किताब भी लिखी है)

(बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी से बातचीत पर आधारित)

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