आरटीआई से घबराए 'राजनीतिक दल' कानून के कवच में?

  • 1 जुलाई 2013
चुनावी घोषणाप्तर जारी करते यूपीए के नेता.
Image caption आरटीआई के तहत कांग्रेस से चुनावी मेनिफेस्टो की कॉपी और पूरे किए गए व अधूरे रह गए वादों की जानकारी भी मांगी जा चुकी है

केंद्रीय सूचना आयोग ने पिछले महीने भारत के छह बड़े राजनीतिक दलों को लोक प्राधिकरण मानते हुए आरटीआई के तहत जबावदेह करार दिया था. सूचना आयोग ने पारदर्शिता को राजनीतिक शक्ति के निर्वाह के लिए जरूरी बताया था.

सूचना आयोग के इस फैसले पर राजनीतिक दलों ने विरोध जताया था. अब भारतीय मीडिया में खबरें आ रही हैं कि केंद्र सरकार एक अध्यादेश पारित करवाकर राजनीतिक दलों को लोक प्राधिकरण की परिभाषा से बाहर कर सकती है. यदि ऐसा हुआ तो राजनीतिक दल सूचना के अधिकार के दायरे से भी बाहर हो जाएंगे.

इस संभावित अध्यादेश को जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की पूर्व सदस्य अरुणा रॉय राजनीतिक दलों की घबराहट का नतीजा मान रही हैं.

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घबराहट

अरुणा कहती हैं, "सरकार चाह रही है कि अध्यादेश लाकर राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार से बाहर रखे. मुझे लगता है अध्यादेश लाने की जरूरत नहीं है, अदालत में जाकर भी सूचना आयोग के फैसले को चुनौती दी जा सकती है. अध्यादेश लाने का मतलब सिर्फ यही है कि राजनीतिक दल घबरा रहे हैं. सवाल यह भी उठ रहा है कि राजनीतिक दल क्या छुपाना चाहते हैं."

अरुणा कहती हैं, "मौजूदा माहौल में यदि कोई भी सूचना के अधिकार से बाहर रहने की कोशिश करेगा तो जनता को लगेगा कि कुछ न कुछ ऐसा है जिसे छुपाया जा रहा है. आरटीआई के दायरे से बाहर होने का असर राजनीतिक दलों की छवि पर भी पड़ेगा."

Image caption कांग्रेस सीआईसी के फैसले को अव्यवहारिक मानती है.

सूचना आयोग ने आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल और अनिल बैरवाल की याचिका पर यह अहम फैसला दिया था. केंद्र सरकार के अध्यादेश लाने की संभावना पर सुभाष अग्रवाल इसे भी चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं.

सुभाष अग्रवाल कहते हैं, "सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर निकलने के लिए केंद्र सरकार के अध्यादेश लाने की तैयारी से साबित होता है कि सूचना आयोग का फैसला बिलकुल सही था. राजनीतिक दल समझ गए हैं कि इस फैसले को कोर्ट में चुनौती देने पर हार होगी इसलिए सब एकजुट होकर अध्यादेश लाना चाहते हैं. हमने इस अध्यादेश को चुनौती देने की तैयारी कर ली है."

सुभाष अग्रवाल सवाल करते हैं कि यदि राजनीतिक दल लोक प्राधिकरण नहीं हैं और आरटीआई के दायरे से बाहर रहना चाहते हैं तो वह रियायती दरों पर मिली जमीनें और सरकार से मिलने वाली रियायतों को वापस क्यों नहीं कर देते. क्यों न राजनीतिक दलों को दी जाने वाली टैक्स और अन्य छूटें समाप्त कर दी जाए?

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अव्यवहारिक फैसला?

हालांकि कांग्रेस सूचना आयोग के फैसले पर ही सवाल करती है. कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने कहा, "यह सीआईसी का एक अव्यवहारिक फैसला है. राजनीतिक दल अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों की जानकारी साझा नहीं कर सकते. एक अफवाह यह भी फैलाई जा रही है कि राजनीतिक दल अपनी वित्तीय जानकारियां छुपाना चाहते हैं. सच यह है कि हम अपनी सभी आर्थिक गतिविधियों की जानकारी चुनाव आयोग और आयकर विभाग को देते हैं. इस तरह हम पहले से ही आरटीआई के दायरे में हैं."

‏मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को अभी संभावित अध्यादेश के बारे में सरकार की ओर से कोई भी अधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है.

पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, "अध्यादेश के बारे में पूरी जानकारी के बाद ही हम इस विषय पर कुछ कहेंगे लेकिन जहां तक पारदर्शिता का सवाल है तो हम अपनी सभी महत्वपूर्ण वित्तीय जानकारी चुनाव आयोग और आयकर विभाग को उपलब्ध कराते हैं. लेकिन राजनीतिक दलों को लोक प्राधिकरण मानना एक बड़ा मुद्दा है जिसके कानूनों पहलुओं पर हम विचार करेंगे."

वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी खुद को सूचना के अधिकार से बाहर मानती हैं. हालांकि पार्टी अपनी वित्तीय जानकारियाँ माँगने पर लोगों को उपलब्ध करवाती है.

पार्टी के महासचिव सुधाकर रेड्डी ने एक आरटीआई के जबाव में कहा, "हमारी समझ के अनुसार, हम अब तक सूचना कानून का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन हम आपके सवालों का जवाब देते हैं."

'जनहित में फैसला'

Image caption भाकपा मानती है कि वह आरटीआई का हिस्सा नहीं है.

तीन जून को दिए अपने फैसले में सूचना आयोग ने कहा था, "राजनीतिक पार्टियों के चंदे के बारे में जानकारी इकट्ठा करने में जनता की दिलचस्पी रहती है. इससे वोट देते वक्त सही फैसला लेने में भी मदद होगी. लोकतंत्र के सुचारू रूप से चलने के लिए पारदर्शिता जरूरी है. राजनीतिक दल राजनीतिक शक्ति के निर्वाह में अहम भूमिका निभाते हैं, ऐसे में उनका पारदर्शी और जनता के प्रति जबावदेह होना जनहित में है."

आरटीआई के दायरे से बाहर रहने की राजनीतिक पार्टियों की जिद जनता के मन में कई सवाल पैदा कर रही है. हालांकि संभावित अध्यादेश के बारे में अभी सरकार की ओर से कोई अधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है.

माना जा रहा है कि अध्यादेश जारी करने की तारीख संसद के सत्र पर निर्भर करेगी. यदि मानसून सत्र से पहले विशेष सत्र नहीं बुलाया गया तो सरकार अध्यादेश जारी कर सकती है. सरकार अगले सत्र में सूचना के अधिकार कानून का ही संशोधन विधेयक पेश कर सकती है.

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