शिमला समझौते पर भारी पड़ी थी बेनज़ीर की खूबसूरती

ठीक 41 साल पहले भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हुआ था. उस वक्त समझौते से ज़्यादा चर्चा बेनज़ीर की हुई थी, जो अपने पिता के साथ भारत आईं थीं.

1972 में भारत-पाकिस्तान शिमला शिखर बैठक में पहले बेगम भुट्टो ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के साथ शिमला आने वाली थीं लेकिन ऐन मौके पर उनकी तबियत खराब हो गई.

तब भुट्टो ने उन दिनों अमरीका से गर्मियों की छुट्टी में पाकिस्तान आईं अपनी 19 वर्षीय बेटी बेनज़ीर से शिमला चलने को कहा था.

बेनज़ीर ने अपनी आत्मकथा 'डॉटर ऑफ़ द ईस्ट' में लिखा है कि विमान में बग़ल में बैठे उनके पिता ने उन्हें समझाया कि इस यात्रा के दौरान 'तुम्हें बिल्कुल भी मुस्कराना नहीं है'.

भारतीय लोगों को ये आभास नहीं होना चाहिए कि उनकी ज़मीन पर पाकिस्तान के 93,000 युद्धबंदियों के रहते, बेनज़ीर को इस यात्रा में मज़ा आ रहा है.

लेकिन साथ ही भुट्टो ने ये भी कहा, “तुम्हें दुखी भी नहीं दिखना है क्योंकि इससे ये संदेश जाएगा कि पाकिस्तानी खेमे में मातम का माहौल है.”

बेनज़ीर ने उनसे पूछा, "साफ़ साफ़ बताइए मुझे कैसा दिखना चाहिए." भुट्टो बोले, “न तुम्हें खुश दिखना है और न ही दुखी.” बेनज़ीर ने कहा ये तो बहुत मुश्किल काम है. भुट्टो ने जवाब दिया, “बिल्कुल भी नहीं.”

इंदिरा को आया गुस्सा

Image caption 1972 में भुट्टो के आने से पहले इंदिरा ने खुद से देखा था सारा इंतज़ाम

उधर इंदिरा गाँधी सिर्फ ये देखने के लिए एक दिन पहले शिमला पहुँचीं कि हिमाचल भवन में भुट्टो और उनके शिष्टमंडल के रहने का इंतज़ाम ठीक ढंग से किया गया है या नहीं.

इंदिरा के सचिव पीएन धर लिखते हैं कि इंदिरा ने जब भुट्टो के कमरे में अपनी तस्वीर लगी देखी तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया. उन्होंने तुरंत उसे वहां से हटवाया ताकि पाकिस्तान के राष्ट्रपति को ये न लगे कि वो लगातार उन पर नज़र रखे हुए हैं.

इसके बाद उन्होंने भुट्टो के टॉयलेट का भी मुआयना किया. ये देख कर वो थोड़ा खुश हुईं कि वहाँ रखी प्रसाधन की सारी चीज़ें भारत की बनी थीं.

धर अपनी किताब 'इंदिरा गांधी, द एमरजेंसी एंड इंडियन डेमोक्रेसी' में लिखते हैं, "इंदिरा ने टिप्पणी की, 'भुट्टो को पता होना चाहिए कि भारत की अर्थव्यवस्था लोगों की ज़रूरतें पूरा करने में सक्षम है.'”

बेनज़ीर ने लिखा है कि जैसे ही वो शिमला के हैलीपैड पर उतरीं, सबसे पहले जिस बात पर उनका ध्यान गया वो था कि इंदिरा गांधी की क़द काठी कितना छोटी है. मिलते ही बेनज़ीर ने उनका अभिवादन किया, “अस्सलामवाले कुम.” इंदिरा ने मुस्करा कर जवाब दिया, “नमस्ते.”

बेनज़ीर की ख़ूबसूरती का असर

भुट्टो के निजी सचिव ख़ालिद हसन लिखते हैं कि शिमला के लोगों में बेनज़ीर जितनी हिट हुईं, उतने स्वयं भुट्टो भी नहीं. वो जहाँ भी जातीं लोग उनको घेर लेते.

एक दिन जब वो शिमला के माल रोड पर कुछ ख़रीदारी करने निकलीं तो उनके चारों तरफ लोग इकट्ठा हो गए. हर कोई उनसे इंटरव्यू करना चाहता था. लेकिन भुट्टो ने अपने सचिव ख़ालिद हसन को निर्देश दे रखे थे कि ऐसे किसी अनुरोध को स्वीकार न किया जाए.

सिर्फ़ एक भारतीय पत्रकार दिलीप मुखर्जी को उनसे मिलने की अनुमति दी गई थी वो भी इसलिए क्योंकि उन्होंने भुट्टो की जीवनी लिखी थी.

मुखर्जी ने ख़ालिद से कहा कि उनसे ज़्यादा उनकी पुत्री जो कि बेनज़ीर की ही उम्र की हैं, उनसे मिलना चाहती हैं. खालिद ने इसके लिए भुट्टो की अनुमति मांगी. भुट्टो ने कहा कि अगर आप वहाँ खुद मौजूद रहें तो दिलीप अपनी बेटी को वहां ला सकते हैं.

दोनों लोग आए लेकिन बेनज़ीर ने उनकी बेटी की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया. उन्होंने अपने पिता के बारे में एक दो बातें ग़लत लिखने के लिए दिलीप मुखर्जी को आड़े हाथों ले लिया.

बेनज़ीर के मांगे हुए कपड़े

खालिद लिखते हैं कि भारतीय चाहते थे कि भुट्टो उस ज़माने की हिट फ़िल्म 'पाकीज़ा' देखें. भुट्टो को फ़िल्म में कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन उन्हें लगा कि उनके इनकार को कहीं ग़ुस्ताखी न मान लिया जाए इसलिए उन्होंने खालिद हसन से कहा कि वो बेनज़ीर के साथ माल रोड के हॉल में ये फ़िल्म देखें, दोनों ने ये फ़िल्म देखी और फिर उन्होंने भुट्टो साहब के लिए वहाँ की एक मशहूर किताब की दुकान से कुछ किताबें ख़रीदीं.

बेनज़ीर को इस बात से भी बहुत उलझन हो रही थी कि पूरे भारतीय मीडिया का ध्यान उनके कपड़ों पर लगा हुआ था. लेकिन किसी को इसका अंदाज़ा ही नहीं था कि बेनज़ीर वो सभी कपड़े अपनी दोस्त सामिया की बहन से उधार मांग कर लाई थीं.

ख़ुद बेनज़ीर के पास तो उनकी टी शर्ट्स और जींस ही थे जिन्हें वो हारवर्ड में पहना करती थीं. उधर उनके पिता और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल की समझ में ही नहीं आ रहा था कि भारतीय मीडिया बेनज़ीर को इतनी तरजीह क्यों दे रहा है.

इंदिरा को आई अपनी याद

फिर एक दिन भुट्टो ने ही इसका जवाब दिया, “शायद ऐसा कर भारतीय मुद्दों की गंभीरता से सबका ध्यान हटाना चाह रहे थे.”

बेनज़ीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “मुझे सबसे ज़्यादा परेशान ये चीज़ कर रही थी कि भोज के दौरान इंदिरा गांधी पूरे समय मुझे ही निहारती रही थीं.”

अपने तनाव को छिपाने के लिए उन्होंने इंदिरा से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने सिर्फ हां-ना में ही जवाब दिया. शायद वो याद कर रही थीं कि वो भी अपने पिता जवाहर लाल नेहरू के साथ इसी तरह के बड़े बड़े शिखर सम्मेलनों में जाया करतीं थीं. शायद वो बेनज़ीर में अपने आप को ढ़ूँढ़ रही थीं.

अचानक 2 जुलाई को भुट्टो ने कहा कि पैकिंग शुरू करो, "हम लोग कल पाकिस्तान वापस जा रहे हैं." बेनज़ीर ने पूछा, “बिना समझौता किए हुए?”

भुट्टो ने कहा, “हाँ, बिना समझौते किए हुए.”

भुट्टो का आखिरी दांव

सिर्फ भुट्टो को शाम चार बज कर तीस मिनट पर इंदिरा गांधी से एक औपचारिक मुलाकात करनी थी और रात में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल भारतीय प्रतिनिधिमंडल को विदाई भोज देने वाला था.

भुट्टो ने बेनज़ीर से कहा कि किसी से कहना नहीं. मैं इस बैठक में इंदिरा गांधी पर अपना आखिरी दांव चलने जा रहा हूँ.

Image caption भारत और पाकिस्तान के बीच 65 साल में भी रिश्ते सामान्य नहीं हो पाए हैं

थोड़ी देर में भुट्टो वापस आ गए. इस बार उनके चेहरे पर चमक थी. वो बोले, “अब लगने लगा है कि इंशाअल्लाह समझौता हो जाएगा.”

भुट्टो ने बेनज़ीर को बताया कि इंदिरा तनाव में अपने हैंडबैग के साथ खेल रही थीं और ये आभास दे रहीं थीं कि उनकी जीभ को प्याले की गर्म चाय बिल्कुल रास नहीं आ रही है. तभी उन्होंने एक लंबी सांस ली और आधे घंटे तक लगातार बोलते रहे. रात के खाने के बाद भी दोनों नेताओं के बीच लगातार बात होती रही.

लड़का है, लड़का है

पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने एक कोड ईजाद किया कि अगर समझौता हो जाता है तो वो कहेंगे कि लड़का हुआ है और अगर समझौता नहीं होता है तो कहा जाएगा कि लड़की पैदी हुई है.

रात के बारह बज कर चालीस मिनट पर बेनज़ीर अपने शयन कक्ष में थी तभी उन्हें ज़ोर का शोर सुनाई पड़ा, “लड़का है, लड़का है.”

वो नीचे की तरफ दौड़ीं लेकिन वहाँ पत्रकारों और कैमरामेनों का इतना बड़ा हुजूम था कि वो जब तक कमरे में पहुंचती ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो और इंदिरा गांधी शिमला समझौते पर दस्तख़त कर चुके थे.

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