उत्तराखंड: क्यों अटकी पड़ी है राहत सामग्री?

उत्तराखंड के बाढ़ पीड़ितों के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों से राहत सामग्री लेकर आए ट्रक प्रभावित गाँवों से दूर दिल्ली से देहरादून जाने वाली सड़क पर खड़े हैं क्योंकि आगे पहाड़ों में दुरुस्त रास्ते मौजूद नहीं हैं.

ये मेरी जानी-पहचानी सड़क है. बचपन के दिनों में मैं बस के ज़रिए इस सड़क से गुज़रा करता था.

उत्तराखंड बाढ़ पर विशेष

हालांकि अब ये ज़्यादा चौड़ी और बेहतर हो गई है. यहां आपको अब 20 रुपए में एक किलो आम मिल जाएगा जबकि शहरों में हम इसके लिए जमकर मोलभाव किया करते हैं और तब जाकर मामला 50 रुपए में पटता है.

त्रासदी के कारण तीर्थयात्रियों और सैलानियों से सुनसान हो चुके इस रास्ते का अर्थशास्त्र भी बदला है.

इस पूरी यात्रा में जो एक चीज़ आपको दिखाई देती है वो है राहत सामग्री से लदे ट्रक और ऐसे लोगों के समूह जो वास्तव में राहत कार्यों के प्रति गंभीर हैं.

देश भर से आए इन समूहों में युवाओं से लेकर व्यापारियों के संगठन तक शामिल हैं. ये ट्रक हर तरह के सामान से भरे हैं जिनमें खाने के पैकेटों से लेकर इस्तेमाल किए हुए अंतःवस्त्रों से लेकर गंदे कपड़े तक शामिल हैं.

अटका पड़ा है सामान

Image caption कई जगह राहत सामग्री रास्ते में ही अटकी पड़ी है

ट्रक इसलिए खड़े नहीं हैं कि इस सामान की किसी को जरूरत नहीं है बल्कि वे इसलिए खड़े हैं कि वे आगे नहीं जा सकते.

इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने सामान को इकट्ठा किया और इलाक़े के भूगोल, संस्कृति और सड़क मार्ग की जानकारी के बिना यहां आ गए.

'रामबाड़ा तो सब बह गया'

आप ऐसे लोगों से भी मिलते हैं जिन्हें वापस जाकर सैकड़ों लोगों को जवाब देना है कि जो सामान उनसे लिया था उसका क्या हुआ?

वे ट्रकों को खाली करने को बेकरार हैं और यहीं धोखाधड़ी की गुंजाइश बनती है. कुछ दुकानदार कथित तौर पर औने-पौने दाम पर ये सामान ख़रीदकर मोटा मुनाफ़ा बनाते हैं.

कई धार्मिक, सामाजिक और व्यापारिक संगठन भी यहां आए हैं जिन्हें इस इलाक़े और उसकी जरूरतों के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

'फ़ायदा उठाने से नहीं चूकते'

कुछ ऐसे सप्लायर भी यहां देखे जा सकते हैं जिनके लिए ये अपने घटिया माल को ऊंचे दाम पर बेचने का अच्छा मौक़ा है. कुछ कॉरपोरेट भी यहां आए हैं जिन्हें अपने पुराने पड़ चुके माल को खपाने का अच्छा अवसर मिला है लेकिन उनके इस सामान की यहां कोई जरूरत नहीं है.

कुछ अधिकारी भी यहां हैं जो अपने काम में व्यस्त हैं. कुछ तथाकथित अति विशिष्ट लोगों को भी यहां देखा जा सकता है जो एक बार भी नहीं सोचते कि हेलीपैड की जरूरत स्थानीय अधिकारियों से ज़्यादा प्रभावित क्षेत्रों में है.

राहत पर राजनीति

दुर्भाग्य से हर आपदा की लगभग यही कहानी होती है. आपदाओं से मेरा पहला परिचय इन्हीं पहाड़ों में हुआ था जब 1991 में उत्तरकाशी में भूकंप आया था और मास कम्युनिकेशन का उत्साही छात्र होने के कारण मैं अपनी कक्षाएँ छोड़कर यहां आया था.

ग्रामीण भारत से ये मेरा पहला परिचय था और मेरे लिए ये चौंकाने वाला अनुभव था. एक तरफ तो लोग बढ़-चढ़कर राहत कार्यों में हिस्सा ले रहे थे और दूसरी तरफ कुछ लोग इसे अपने गंदे कपड़ों को निपटाने के अवसर के रूप में देख रहे थे.

कैसे मिलेंगे शव?

Image caption मारे गए लोगों के शव कैसे मिलेंगे इसे लेकर काफ़ी चिंता है

ये आपदा कई मायनों में अलग है- भावनाओं से लेकर तबाही के पैमाने तक. सरकार शवों की गिनती कर हमें मृतकों की संख्या बताती है लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि इस भीषण बाढ़ में आप कैसे किसी शव को ढूंढ पाएंगे?

धार्मिक रीति से अंतिम संस्कार

स्थानीय लोग तथ्यों और आंकड़ों पर तार्किक सवाल पूछते हैं- “केदारनाथ में हर दिन 15000 लोग मौजूद रहते थे और इसके अलावा वहां जाने का रास्ता भी पूरा भरा रहता था. हम इनमें से कितनों को बचाने में कामयाब रहे?”

दुनिया पर्यटकों और श्रद्धालुओं को लेकर चिंतित है पर उन स्थानीय लोगों का क्या जिन्हें यहां से निकाला नहीं जाना है बल्कि यहां बसाया जाना है.

ये एक दीर्घकालिक चुनौती है. कई गांव की तो ये हालत है कि वहां सिर्फ महिलाएं और बच्चे रह गए हैं. इन गांवों के मर्द केवल पुरूषों के लिए मान्य पूजा को गए थे और वहां वे काल के गाल में समा गए. कुछ गांवों का अब अस्तित्व ही नहीं रहा.

जब हम ऐसे ही एक क्षेत्र में पहुंचे तो हमने सोचा कि सड़कों के अभाव में मानव श्रृंखला बनाकर और खच्चरों के जरिए गांवों तक पहुंचा जा सकता है.

जान पर खेलकर बचाया फँसे हुए जानवरों को

फिर हमें महसूस हुआ कि लोग तो जा चुके हैं और अनगिनत खच्चर बह गए हैं. उनकी न तो कोई गिनती हुई और न ही पोस्टमॉर्टम. स्थानीय लोगों के लिए वे आजीविका का साधन थे.

स्थानीय लोगों का क्या होगा?

Image caption सवाल ये उठाया जा रहा है कि स्थानीय लोगों का पुनर्वास कैसे किया जाएगा

यहां बहुत सारी राहत सामग्री है. कुछ प्रबंधन भी है तो कुछ कुप्रबंधन भी लेकिन हमें ये बात समझनी चाहिए कि आम आदमी को मीडिया के होहल्ले और राजनेताओं की यात्राओं से परे दीर्घकालिक मदद की जरूरत है.

ये तो अभी मॉनसून की शुरुआत है और हर बार बारिश के बाद हमें सड़कों पर टूट-फूट देखने को मिलती है. एजेंसियों और लोगों की भलमनसाहत के बावजूद इसकी अपनी सीमाएं हैं.

प्रभावित इलाक़ों तक पहुंच इस समय सबसे बड़ा मुद्दा है. कुछ स्थानों में बहुत छोटे वाहन पहुंच सकते हैं लेकिन वे ज़रूरत का सामान नहीं ले जा सकते.

सर्दियों से पहले हमें सारा काम निपटाना है लेकिन हमें संयम दिखाने की भी ज़रूरत है. इसके लिए हमें अगले कुछ महीने स्थानीय लोगों के साथ रहने की ज़रूरत है.

बहुत कुछ सड़कों की स्थिति और अगले कुछ हफ्तों के दौरान बारिश की स्थिति पर निर्भर करेगा. इस बार मौसम विभाग के अनुमान सही साबित हो रहे हैं. विभाग के मुताबिक इस इलाके में मौसम की स्थिति आने वाले दिनों में भी अच्छी नहीं रहेगी.

आखिरकार पर्यटक और श्रद्घालु यहां से कड़वी यादें लेकर चले जाएंगे लेकिन स्थानीय लोगों को इन्हीं पहाड़ों में अपना जीवन गुज़ारना है.

(अंशु गुप्ता एनजीओ गूँज के संस्थापक हैं और ये लेखक के निजी विचार हैं)

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