क्या भाजपा चेहरा बदल रही है?

  • 5 जुलाई 2013
भाजपा की अंदरूनी राजनीति

मीडिया रिपोर्टों पर भरोसा करें तो इशरत जहाँ मामले में चार्जशीट दाखिल होने के बाद सीबीआई और आईबी के भीतर व्यक्तिगत स्तर पर गंभीर चर्चा है.

ये न्याय की लड़ाई है या राजनीतिक रस्साकशी, जिसमें दोनों संगठनों का इस्तेमाल हो रहा है?

जावेद शेख उर्फ प्रणेश पिल्लै के वकील मुकुल सिन्हा हैरान हैं कि आईबी के स्पेशल डायरेक्टर राजेन्द्र कुमार का नाम सीबीआई की पहली चार्जशीट में क्यों नहीं है.

उन्हें लगता है कि राजेन्द्र कुमार का नाम न आने के पीछे राजनीतिक दबाव है.

इसका मतलब है कि जिस रोज सरकार सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई को आजाद पंछी बनाने का हलफनामा दे रही थी उसी रोज सीबीआई ऐसा आरोप-पत्र पेश कर रही थी, जिसके कारण उसपर सरकारी दबाव में काम करने का आरोप लगता है.

राजेन्द्र कुमार का नाम होता तो भाजपा को आश्चर्य होता. नहीं है तो मुकुल सिन्हा को आश्चर्य है.

अभी तफ्तीश ख़त्म नहीं हुई है. सीबीआई सप्लीमेंट्री यानि पूरक चार्जशीट भी दाखिल करेगी लेकिन इस मामले में अभी कई विस्मय बाकी हैं.

टेलीविजन चैनल

चार्जशीट दाख़िल होने के बाद भाजपा की प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कहा कि केन्द्र सरकार ने इशरत मामले में साल 2009 से पलटी खाई है. इसके पहले वह गुजरात पुलिस की बात से सहमत थी.

निर्मला सीतारमण की बात पर हैरानगी नहीं होती लेकिन इस बात को पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने क्यों नहीं कहा? निर्मला सीतारमण तो अपेक्षाकृत नई हैं.

कहाँ हैं भाजपा के वरिष्ठ नेता? आडवाणी जी ने अपने ब्लॉग में कुछ क्यों नहीं लिखा? सुषमा स्वराज ने जो तीन ट्वीट किए, तीनों खाद्य सुरक्षा-अध्यादेश की बाबत थे, सीबीआई की चार्जशीट पर नहीं.

इस चार्जशीट को लेकर बुधवार की रात टेलीविजन चैनलों पर भाजपा की ओर से आपत्तियां दर्ज कराने का काम कौन कर रहा था? महेश जेठमलानी, निर्मला सीतारमण, मीनाक्षी लेखी, किरण खेर और स्मृति ईरानी.

मध्य वर्गीय

नरेन्द्र मोदी भाजपा के अंतर्विरोधों को उजागर करने वाले बड़े कारक के रूप में उभरे हैं लेकिन भाजपा के मंच पर अचानक नए चेहरों के उभरने के भी दो मायने हैं.

या तो पुराना नेतृत्व मोदी के पक्ष में सामने आना नहीं चाहता या अब मोदी चाहते हैं कि पार्टी के नए चेहरे ही जनता के सामने जाएं.

भाजपा कार्यकारिणी की गोवा बैठक के बाद पैदा हुई बदमजगी तभी खत्म होगी जब या तो मोदी पूरी तौर सफल साबित हों या विफल. फिलहाल मोदी पुराने चेहरों के साथ सामने नहीं आना चाहते.

दूसरी ओर पार्टी के वरिष्ठ नेता समय के साथ अपने स्वरों को 'ट्यून' कर रहे हैं. ये भी नज़र आता है कि पार्टी कट्टर हिन्दुत्व के बजाय मध्य वर्गीय शहरी अर्थव्यवस्था के वैकल्पिक मॉडल के साथ सामने आ रही है.

नरेन्द्र मोदी अल्पसंख्यकों से टकराव मोल लेने के बजाय उनके आर्थिक बदलाव का मॉडल भी पेश करना चाहते हैं, जो आने वाले समय में दिखाई देगा.

माइक्रोमैनेजमेंट

बिहार में जेडीयू से गठबंधन टूटते वक्त सुनाई पड़ा था कि फलां नेता थे तो हम साथ थे. पर अब मोदी की टीम सामने आ रही है. फिलहाल मोदी की निगाहें उत्तर प्रदेश और बिहार पर ही हैं, क्योंकि कुछ हासिल हुआ तो यहीं से होगा.

आगामी विधान सभा चुनाव में वे राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस को हराना चाहेंगे. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ उन्हें अपेक्षाकृत आसान लगते हैं.

राजनाथ सिंह पूर्व पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को फिर से सक्रिय कराने में सफल हुए हैं. सम्भवतः उन्हें दिल्ली और राजस्थान के चुनाव संचालन की बागडोर सौंपी जा रही है.

गडकरी के रिश्ते संघ से अच्छे हैं और इस वक्त पार्टी संघ के निर्देश पर चल रही है. मोदी की कोशिश है कि कर्नाटक में खोई हुई प्रतिष्ठा वापस लाने के लिए येदियुरप्पा को वापस लाया जाए.

नरेन्द्र मोदी के 'माइक्रोमैनेजमेंट' को लेकर पिछले दिनों कांग्रेस के जयराम रमेश ने कहीं कहा कि मोदी कांग्रेस के लिए वैचारिक और प्रबंधकीय चुनौती हैं. ये बात पार्टी को चुभ गई फौरन उसने अपने आप को इस वक्तव्य से अलग किया.

नीतीश कुमार का कहना है कि मोदी मीडिया की उपज हैं. इस तथ्य पर से पर्दा अगले साल हटेगा. आने वाला चुनाव बेहद मुश्किल साबित होने वाला है, भाजपा के लिए ही नहीं कांग्रेस के लिए भी.

सवालिया निशान

फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि इशरत जहाँ का मामला क्या मोदी के अंत का कारण बनेगा? राजनीतिक दृष्टि से इस मामले का महत्व तभी है, जब नरेन्द्र मोदी फँसें. फँसने के राजनीतिक लाभ भी हैं.

जिस तरह इशरत जहाँ पीड़ित है, उसी तरह मोदी भी अपने को पीड़ित के रूप में पेश कर सकते हैं. कांग्रेस का एक तबका इस मामले को बढ़ाने के पक्ष में नज़र नहीं आता. लेकिन वकील किस्म के नेता आतुर लगते हैं.

अभी इस सवाल का जवाब मिलना बाकी है कि इशरत जहाँ निर्दोष थी तो गुजरात पुलिस और आईबी के सीनियर अफसरों ने उसकी हत्या की साजिश क्यों की? 'एनकाउंटर' हमारी व्यवस्था पर सवालिया निशान है.

नक्सली आंदोलन से लेकर पंजाब, कश्मीर और पूर्वोत्तर तक फर्जी मुठभेड़ों की लंबी सूची है. इशरत जहाँ का मामला क्या किसी तार्किक नतीजे तक पहुँचेगा? यकीन नहीं होता.

फिलहाल इशरत जहाँ का मामला महत्वपूर्ण तभी होगा, जब उसकी आँच मोदी तक जाएगी. ऐसा होगा या नहीं ये इस महीने के आखिरी दिनों में आने वाली सप्लीमेंट्री चार्जशीट से ही ज़ाहिर होगा.

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