सेहत से जुड़े सवाल पर 'शर्म' किस बात की?

  • 29 जुलाई 2013
महिला स्वास्थ्य

भारत के कई गाँवों, शहरों और महानगरों के घर की छतों पर महिलाएं अपने अंडरगार्मेंट्स कुछ इस तरह सुखाती हैं कि किसी की नज़र ना पड़ जाए.

ब्लाउज़ या पेटिकोट के नीचे और कई बार तो बाथरुम के दरवाज़े के पीछे सूखने वाली इसी मानसिकता को 'शर्म' कहते हैं जो एक हद के बाद शर्मनाक हो जाती है क्योंकि जाने-अनजाने इससे महिलाओं के स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है.

भारत की कई महिलाओं में स्वास्थ्य-संबधी समस्या को लेकर 'शर्म' तो है लेकिन गंभीरता नहीं है. जैसा कि स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर ज्योति खरे बताती हैं कि ठीक से धूप में ना सुखाए गए हल्के गीले अंडरगार्मेंट्स को पहनने से फंगल इंफ़ेक्शन का ख़तरा बढ़ जाता है जो भारतीय महिलाओं में आम सी बात मानी जाती है.

ऐसी आदतों से महिला को अपने जीवन में कम से कम दो-तीन बार तो ये इंफ़ेक्शन होता ही है.

अगर आप भारत में पले बढ़े हैं तो इस काली पॉलीथीन का रहस्य आपसे छुपा नहीं होगा. किसी भी दवा की दुकान में सैनिटरी नैपकिन मांगने पर उसे काली पॉलीथीन में या किसी अखबार में लपेट कर देना बड़ी आम सी बात है.

ये 'शर्म' की वो आदत है जो भारतीयों को महिला स्वास्थ्य संबंधी मामले में सहज नहीं होने देती है.

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से करीब 50 किलो मीटर दूर गांव झीटूढाणा में लक्ष्मी एक किराने की दुकान चलाती हैं जहां शक्कर, तेल से लेकर गोरा होने की क्रीम सब कुछ मिलता है लेकिन सैनिटरी नैपकिन नहीं मिलता.

वजह पूछने पर जवाब मिला कि मांग नहीं है, वहीं गांव की कुछ औरतों का कहना है कि पैसे नहीं है तो कुछ को सैनिटरी नैपकिन के बारे में पता ही नहीं है.

बैतूल जिले में ही गोंड आदिवासियों का गांव गुरगुंडा है जहां लोग अब भी मुर्गे की बांग से ही सुबह उठते हैं. यहां रहने वाली रामदुलारी ने बताया “मैडम लोगों ने एक बार नैपकिन दिया था लेकिन मुझे समझ नहीं आया. हमारे लिए तो कपड़ा ही अच्छा है. नैपकिन तो बड़े लोग इस्तेमाल करते हैं.”

लगभग 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी वाले भारत में आधे से ज़्यादा घरों में माहवारी के वक्त सूती या सिंथेटिक कपड़ों का इस्तेमाल किया जाता है जिसे धोकर किसी ऐसी जगह सुखाया जाता है जहां किसी की नज़र ना पड़े.

कुछ राज्यों में कम दामों पर सैनिटेरी नैपकिन मुहैया कराने की योजना भी शुरू की गई है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘मुस्कान सैनिटेरी नैपकिन’ योजना की घोषणा की है जिसके तहत 20 रुपए में 8 सैनेटरी नैपिकन उपलब्ध कराए जाएंगे.

हालांकि जागरूकता, झिझक और इच्छाशक्ति की कमी के कारण ये योजना कई औरतों के चेहरे पर अभी तक मुस्कान नहीं ला पाई है.

गुवाहाटी से 90 किमी की दूरी पर स्थित बारपेटा, भारत के पिछड़े जिलों में से एक है जिसके धानबंधा गांव में ज्योति मंडल अपने पति और दो बच्चो के साथ रहती है.

ज्योति ने बताया कि उनके परिवार में ये परंपरा है कि शादी के बाद औरतें अंडरगार्मेंट्स नहीं पहनतीं, इसलिए माहवारी के वक्त वो अपनी कमर पर एक नाड़े या रस्सी को बांधकर उसके सहारे कपड़े को लगाकर दिन गुज़ारती है.

कई जगह तो रुढ़िवादी परंपरा, पैसे के अभाव और जागरुकता की कमी के कारण औरतें रेत, राख़, पन्नी और पत्ते इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं. ज्योति जैसी कई औरतों ने मोबाइल पर बात करना सीख लिया है लेकिन माहवारी के बारे में बात करने में उन्हें अब भी 'शर्म' आती है.

कई बार आविष्कार अभाव के कारण भी जन्म लेते हैं. ऐसा ही अभाव कोयंबटूर के मुरगानंथम ने भी देखा जब उन्हें मालूम चला की उनकी पत्नी और उनकी बहनें माहवारी के वक्त कपड़ा इस्तेमाल करती है.

वजह - सैनिटेरी नैपकिन के इस्तेमाल से उनके घर में दूध के लिए पैसे नहीं बचेंगे. मुरगानंदन ने सामाजिक अवहेलनाओं का सामना करते हुए एक ऐसी मशीन का निर्माण किया जिसके ज़रिए आसानी से सैनिटरी नैपकिन महिलाएं अपने घर में ही तैयार कर सकती हैं. एक नैपकिन की लागत महज़ एक रुपए है.

मुरगानंथम ने बीबीसी को बताया, "मेरे गांव के लोगों ने मुझे बाहर निकाल दिया, मेरी पत्नी और परिवार मुझे पागल समझता था, ये मशीन बनाना मेरे लिए आसान नहीं था."

आज भारत ही नहीं विश्व के कई विकासशील देशों में उनकी मशीन का इस्तेमाल हो रहा है लेकिन आज भी कभी-कभी उनकी पत्नी अपने पति के काम के बारे में लोगों को बताने में थोड़ा शर्मा जाती हैं.

ये एक विदेशी कंपनी का लोगो है जो औरतों की शौच संबंधी सुविधा के लिए उपकरण बनाती है. ये लोगो उस शर्म और झिझक का चित्रण है जिसे सार्वजनिक शौचालय की कमी के कारण भारतीय महिलाएं राह चलते झेलती है.

भारत में सार्वजनिक शौचालयों को अहमियत देने वाले सुलभ इंटरनेशनल के प्रमुख बिंदेश्वरी पाठक बताते हैं “मुझे एक जिले की कलेक्टर मिली जिन्होंने बताया कि वो दिन भर पेशाब रोककर गांवों का दौरा करती हैं क्योंकि उन्हें कहीं कोई सही जगह नहीं मिल पाती जहां वो टॉयलेट कर सकें.”

संयुक्त राष्ट्र की 2010 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में मोबाइल फोन ज़्यादा और शौचालय कम है. कई गांवों में बच्चियों के स्कूल ना जाने की वजह वहां शौचालय ना होना है.

मुंह को कपड़े से ढँके वक्त के गुज़र जाने का इंतज़ार करती ये महिला उस 'शर्म' को दिखाती है जिससे अमूमन देश की 80 फीसदी महिलाएं जूझती है.

54 साल की सुखिया बाई बताती हैं, “सरकार ने ये 4-5 फुट के शौचालय बनवा दिए. दरवाज़े लगाए नहीं. ऐसे में शौच करते हुए अगर कोई सामने से गुज़र जाता है तो हम खड़े हो जाते हैं. अच्छा नहीं लगता ना. कोई किसी की बहू है तो कोई किसी की बेटी.”

कई इलाकों में जब बाढ़ आती है तो महिलाएं शौच करने जा ही नहीं पाती जिससे मूत्र की थैली का इंफ़ेक्शन होने का ख़तरा होता है.

दरअसल भारत सरकार के समग्र स्वच्छता अभियान के तहत ग्राम पंचायत में शौचालय निर्माण, किसी भी अन्य सरकारी योजना की तरह ही अनियमितताओं से घिरा हुआ है. ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार का लक्ष्य था कि 2012 तक सभी गांवों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध होगी लेकिन हालात बताते हैं कि ये दूर की कौड़ी है.

ये तस्वीर है मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की रहने वाली अनीता नर्रे और उसके बेटे की. साथ में दिखाई दे रहा है उसका दो साल पुराना शौचालय जिसके लिए अनीता को भारत सरकार के पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश से शाबाशी मिली थी.

एक शिक्षक पिता की बेटी अनीता ने शादी के दूसरे दिन देखा की ससुराल में शौचालय के लिए बाहर जाना पड़ता है तो उसने विरोध किया और शादी के तीसरे दिन मायके चली गई.

फिर क्या था, अलसाई पड़ी समग्र स्वच्छता अभियान योजना को पंचायत ने ज़रा धूप दिखाई और नर्रे परिवार के घर एक हफ्ते में शौचालय बनवा दिया.

अनीता के इस कदम को सरकार ने खूब सराहा, सार्वजनिक शौचालय बनाने वाले सुलभ इंटरनेशनल ने उसे इनाम के तौर पर पांच लाख रुपए दिए और उसके सहारे जागरूकता अभियान भी चलाया गया.

एक 5 बाइ 3 के शौचालय ने अनीता की ज़िंदगी बदल दी लेकिन उसके आस-पास के गांव वालों को अब भी सूरज उगने से पहले मैदान में जाना पड़ता है.

अगर किसी दिन आप सुबह उठें और पाएं कि आप औरत से मर्द बन गई हैं तो सबसे पहला काम आप क्या करेंगी?

एक अख़बार ने जब मिस वर्ल्ड रह चुकी एक भारतीय सुंदरी से ये सवाल किया गया तो जवाब मिला - सबसे पहले जाकर मर्दों की तरह बिना संकोच के टॉयलट करूंगी.

औरतों की इस दबी छुपी इच्छा को कुछ विदेशी कंपनियों ने सच करने की कोशिश की है. ये ऐसे ही एक उपकरण की तस्वीर है जिसके ज़रिए महिलाएं कहीं भी सहजता से और शौचालयों की गंदगी सहे बग़ैर खड़े होकर पेशाब कर सकती हैं.

हालांकि ये बता पाना थोड़ा मुश्किल है कि रुढ़िवादी मान्यताओं वाले देश भारत में जहां 'शर्म' को औरत का गहना और 'कष्ट' को औरत की नियति माना जाता है, वहां उनकी सुविधा के लिए बने इस उपकरण को कितनी आसानी से स्वीकारा जा सकेगा?

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