कांग्रेस : खाद्य सुरक्षा विधेयक जल्दबाज़ी नहीं, ज़रुरत

खाद्य सुरक्षा विधेयक से गरीबों को उम्मीद

कांग्रेस पार्टी ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद के बजाय अध्यादेश के रास्ते लागू करवाने का बचाव किया है.

कांग्रेस पार्टी के महासचिव अजय माकन ने कहा कि देश में कुपोषण की स्थिति को देखते हुए इसे जल्द से जल्द लागू करना ज़रूरी था और इसमें एक दिन की देरी भी कई लोगों की जान ले सकती है.

उधर मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने कहा है कि वह इस विधेयक की विरोधी नहीं है, लेकिन पार्टी चाहती है कि इस पर सदन में चर्चा हो और कुछ संशोधनों के साथ इसे पारित किया जाए.

वामपंथी दलों ने भी इस अध्यादेश की आलोचना की है.

उद्योग संघ फ़िक्की ने इसे जल्दबाज़ी में उठाया गया क़दम बताया है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत सरकार की तारीफ़ की है.

इस विधेयक को अध्यादेश के रूप में लाने के कारण अब सदन में चर्चा के दौरान इसमें संशोधनों पर विचार नहीं हो सकेगा. अब संसद के दोनों सदनों को या तो इसे पारित करना होगा या खारिज़ और फिलहाल विपक्ष इसे खारिज़ करने का जोखिम नहीं लेगा.

बचाव

Image caption विपक्ष चाहता था कि सरकार खाद्य सुरक्षा बिल को संसद में पेश करे और उसपर चर्चा हो.

संसद में बहस से बचने के आरोपों पर अजय माकन ने कहा कि विपक्ष के कारण ही सरकार को अध्यादेश लाने पर मज़बूर होना पड़ा है.

उन्होंने कहा कि सरकार इस अध्यादेश को अचानक नही लाई है. कांग्रेस पार्टी ने 2009 के घोषणा पत्र में खाद्य सुरक्षा का वादा किया था. चालू वित्त वर्ष के बजट में भी इसके लिए 10,000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है.

इस अध्यादेश के लागू होने पर सरकार के खजाने पर 23,800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

लेकिन विरोधी कह रहे हैं कि इस विधेयक को लागू करने में एक लाख 23 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च होंगे जिससे देश के वित्तीय घाटे और चालू खाते के घाटे में इज़ाफ़ा हो जाएगा. और इस वजह से देश की अर्थव्यवस्था की धीमी होती रफ़्तार और मंद पड़ जाएगी.

मंजूरी का इंतजार

Image caption खाद्य सुरक्षा विधेयक की राह में सबसे बड़ी बाधा उसे लागू करने की मशीनरी को लेकर है.

खाद्य और उपभोक्ता मामलों के राज्य मंत्री केवी थॉमस ने बताया है कि इस अध्यादेश को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास भेजा जा चुका है और हम उनकी मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं.

खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत देश की क़रीब 67 फ़ीसदी जनता को एक समान तौर पर पांच किलोग्राम अनाज सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों पर एक से तीन रुपए प्रति किलोग्राम की दर से देने का प्रावधान है.

माना जा रहा है कि खाद्य सुरक्षा अध्यादेश से कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को आगामी लोकसभा चुनावों को दौरान फ़ायदा मिलेगा.

विपक्ष की आपत्ति

अध्यादेश के ज़रिए खाद्य सुरक्षा विधेयक को लागू करने के लिए प्रमुख विपक्षी दलों ने सरकार की आलोचना की है.

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि उनकी पार्टी इस विधेयक को पास करवाना चाहती है लेकिन इसके लिए संसद में बहस और कुछ संशोधन ज़रूरी थे.

उन्होंने कहा, “शायद जुलाई के तीसरे सप्ताह से मानसून सत्र शुरू हो रहा है, फिर जल्दबाजी में ऐसा करने की ज़रूरत क्या थी?”

उन्होंने कहा, “इस विधेयक में कई खामियाँ थी, जिस पर हम संसद में बहस करना चाहते थे और कुछ संसोधनों के साथ इस विधेयक को पास करना चाहते थे. हम विरोध करना नहीं चाहते हैं, लेकिन संसद में बहस होनी चाहिए.”

माकपा का रुख

सीपीएम नेता वृंदा करात ने भी संसद के सत्र से पहले एक अध्यादेश लाकर विधेयक को पास कराने की सरकार की कोशिश की आलोचना की है. उन्होंने इसे संसद की अवमानना और आम लोगों से साथ अन्याय बताया है.

सीपीआई नेता डी राजा ने विधेयक में भारी संशोधनों को ज़रूरी बताया है.

जनता दल सेक्युलर के अध्यक्ष शरद यादव ने कहा है कि सरकार ने आगामी लोकसभा चुनावों के ध्यान में रखते हुए जल्दबाज़ी में ये कद़म उठाया है.

तैयारी का अभाव

Image caption बीते दो दशकों को दौरान भारत की आर्थिक विकास दर काफी रही है, लेकिन इस विकास से गरीबों को फायदा नहीं मिला.

उद्योग संघ फिक्की ने खाद्य सुरक्षा कानून पर चिंता जताते हुए कहा है कि इससे राजकोषीय स्थिति में सुधार की कोशिशों को झटका लगेगा.

फिक्की के महासचिव ए दीदार सिंह ने कहा है कि ये जल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला लग रहा है और देश अभी इस तरह के कार्यक्रम को लागू करने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है.

इस बीच संयुक्त राष्ट्र संघ ने कहा है कि भारत के खाद्य सुरक्षा कानून की प्रासंगिकता वैश्विक स्तर पर है और दुनिया के कई देश ऐसा ही कानून लाने के लिए भारत से प्रेरणा ले सकते हैं.

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