सुप्रीम कोर्टः पार्टियाँ मुफ़्त उपहार के वायदे ना करें

  • 6 जुलाई 2013
चुनाव आयोग
मुफ्त उपहार दिए जाने के वायदे को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए खतरा बताया है

चुनावी घोषणा पत्र में 'मुफ़्त उपहारों' की झड़ी और विरोधी दलों के मुक़ाबले बेहतर उपहार देने की कोशिश काफ़ी चर्चा का विषय रही है.

मगर अब उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि मतदाताओं को लुभाने की ये कोशिश स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए ख़तरा है.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग को जारी यह निर्देश चुनावी घोषणा पत्र से जुड़े दिशा-निर्देशों से संबंधित है.

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वर्तमान कानून के अंतर्गत राजनीतिक दलों की ओर से किए गए ऐसे वायदों से बेशक भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं मिलता मगर चुनावी घोषणा पत्र ऐसा होना चाहिए कि यह आदर्श आचार संहिता में शामिल किया जा सके.

लुभावने वायदे

न्यायमूर्ति पी सताशिवम् और रंजन गोगोई ने कहा, “हालांकि कानून में साफ तौर पर ये कहा गया है कि जन प्रतिनिधित्व (आरपी) अधिनियम की धारा 123 के तहत चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वायदे 'भ्रष्टाचार' की श्रेणी में नहीं आते. मगर हम इस हक़ीकत से इनकार नहीं कर सकते कि किसी भी तरह का मुफ्त उपहार बेशक लोगों को प्रभावित करता है. यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ों को गहरा नुकसान पहुंचाता है.”

खंडपीठ के अनुसार, “ऐसा कोई क़ानून नहीं है जो चुनावी घोषणा पत्र की विषय वस्तु को नियंत्रित करता हो. इसलिए चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिए दिशानिर्देश जारी करे."

उन्होंने कहा, “राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए आदर्श आचार संहिता में एक अलग हिस्सा चुनाव घोषणा पत्र से जुड़े दिशानिर्देशों का होना चाहिए.”

इस फैसले का व्यापक असर होने की संभावना है. इससे मतदाताओं को लुभाने के लिए लैपटॉप, टीवी, मिक्सर और ग्राइंडर, बिजली के पंखे, हल्के वज़न की सोने की थाली और मुफ्त खाद्यान्न जैसे मुफ्त उपहार का वादा करने वाले राजनीतिक दलों पर रोक लग सकती है.

अनोखा उदाहरण

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मुफ्त उपहार का वायदा करने वाले राजनीतिक दलों पर रोक लग सकती है

इस फैसले का एक असर यह भी होगा कि दलों का चुनावी घोषणा पत्र चुनाव आयोग की देख रेख के अंतर्गत आ जाएगा.

खंडपीठ ने कहा कि हालांकि चुनावी घोषणा पत्र आचार संहिता के लागू होने के पहले प्रकाशित किया गया है, चुनाव आयोग इसे आचार संहिता में शामिल करके एक अनोखा उदाहरण स्थापित कर सकता है.

खंडपीठ के मुताबिक़, “हम इस सच्चाई के प्रति सचेत हैं कि आमतौर पर राजनीतिक दल चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हैं. ईमानदारी से कहा जाए तो ऐसे में, चुनाव आयोग को ऐसी किसी गतिविधि पर रोक लगाने का अधिकार नहीं होगा जो चुनाव की तारीख की घोषणा से पहले हुई हो.”

खंडपीठ का मानना है, “फिर भी, इस संदर्भ में एक नई पहल की जा सकती है क्योंकि चुनाव घोषणा पत्र का मकसद चुनावी प्रक्रिया से सीधा जुड़ा हुआ है.”

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