भारतीय खाद्य सुरक्षा कानून में अंतरराष्ट्रीय अड़ंगे

  • 6 जुलाई 2013
खाद्य सुरक्षा

प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून पर अध्यादेश लाकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए-2) की सरकार ने निश्चित रूप से भारी-भरकम और शोर-शराबे वाली संसदीय बहस की ज़रूरत को दरकिनार कर दिया है.

लेकिन यूपीए के इस सपने को हकीकत में बदलने की राह में सबसे बड़ी रुकावट अभी भी मौजूद है.

खाद्य सुरक्षा से जुड़ी सरकारी योजनाओं को छूट देने के विकासशील देशों के संगठन जी-33 के प्रस्ताव पर अमरीका ने अपना रवैया सख़्त कर रखा है और वह भूख व कुपोषण के शिकार लोगों की पोषण जरूरतों को पूरा करने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी सीमा में इजाफ़े को लेकर भी अनिच्छुक है.

इससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा पहले ही यह कह चुके हैं कि गरीब और भूखे लोगों का पेट भरने में किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा.

इस पर विश्व व्यापार संगठन में अमरीका के राजदूत माइकल पुनके ने विकासशील देशों के प्रस्ताव की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि भारत बेहिसाब सब्सिडी देकर कारोबार का धक्का पहुँचा रहा है और इससे एक नए तरह का संकट खड़ा हो सकता है.

जीवन-यापन

माइकल पुनके ने इस कदम को पीछे की ओर लौटने वाला करार दिया है.

उन्होंने कहा, "यह सहूलियत महज कुछ उन उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को ही उपलब्ध हो पाएगी जिनके पास खर्च करने के लिए नकदी है. दूसरे विकासशील देशों को इससे कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है और उल्टा उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी होगी."

जी-33 में चीन, भारत, इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देश शामिल हैं. ये देश दोहा के विकास एजेंडे में खाद्य सुरक्षा, जीवन-यापन और गाँवों के विकास के संरक्षण के लिए एक साथ इकठ्ठा हुए हैं.

जी-33 के विवादास्पद प्रस्ताव में खेती-बारी को लेकर दोहा घोषणापत्र के संशोधित मसौदे में बदलावों की माँग की गई है. भारत इस बात को समझ रहा है कि खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने के लिए गेहूँ और चावल की खरीद से उसके सरकारी खर्च बढ़ेंगे.

उसका कहना है कि बढ़े हुए खाद्यान्न की इस जरूरत को छोटे किसानों से खरीद कर पूरा किया जाना है. भारत चाहता है इस खरीद की वजह से खर्च में होने वाले इजाफ़े को कारोबार को नुकसान पहुँचाने वाली सब्सिडी के तौर पर न देखा जाए.

कारोबारी समझौते के तहत सभी देशों पर कुल सब्सिडी की एक अधिकतम सीमा या 'एग्रीगेट मेज़रमेंट सपोर्ट' (एएमएस) को न पार करने की बंदिश है.

'एग्रीगेट मेज़रमेंट सपोर्ट'

पोषण जरूरतों को पूरा करने के लिए दी जा रही सब्सिडी का इस्तेमाल भूखी जनता का पेट भरने के लिए किया जाना है इसलिए यह माँग की जा रही है कि इस खर्च को कुल सब्सिडी की अधिकतम सीमा के दायरे से बाहर रखा जाए.

विकासशील देश कम आमदनी वाले गरीब किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर जो अनाज खरीदते हैं उसे एएमएस के हिसाब किताब में नहीं रखा जाना चाहिए. इसके साथ ही भारत चाहता है कि सार्वजिनक भंडार के लिए खाद्यान्न की 'मामूली' जरूरत को भी संशोधन में जगह दी जाए.

फिलहाल गेहूँ और चावल के कुल उत्पादन का दस फीसदी खाद्यान्न के संकट का सामना कर रही आबादी की पोषक जरूरतों को पूरा करने के लिए सार्वजनिक भंडार के तौर पर रखा जाता है.

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जी-33 के देश अपने सभी लोगों की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए फ़िलहाल जारी बातचीत में ज़रूरी उपाय शामिल करवाना चाहते हैं.

वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा की विश्व व्यापार संगठन के निवर्तमान प्रमुख पास्कल लामी और ब्राजील के नवनियुक्त महानिदेशक रॉबर्टो कारवाल्हो डी अजेवेडो के साथ इस मुद्दे पर पर्दे के पीछे की जारी बातचीत के बावजूद अमरीका अपने सख्त रवैये पर कायम है.

यह चेतावनी भी दी गई है कि भारत के नए प्रस्तावों को खारिज नहीं किया गया तो इससे विश्व व्यापार संगठन की बातचीत जल्द ही अप्रासंगिक हो जाएगी. कारोबारी सहूलियत के लिए विकसित देशों ने समझौते की एक पेशकश कर रखी है और यह दिलचस्प है कि भारत का प्रस्ताव भी इससे मिलता जुलता है.

विवादास्पद प्रावधान

कारोबारी सुविधाओं का वास्तव में मतलब यह है कि सभी बंदरगाहों पर जरूरी बुनियादी ढाँचा और यातायात व संचार सुविधाओं का पर्याप्त इंतजाम किया जाए. इससे कारोबार से जुड़े लोगों को अपने काम में आसानी होती है.

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो विकसित देश वास्तव में विकासशील देशों को अपनी कंपनियों के कारोबारी हितों के लिए सुविधाओं में निवेश को लेकर दबाव बना रहे हैं. इस समझौते में तकरीबन ऐसे 600 विवादास्पद प्रावधान हैं.

विश्व व्यापार संगठन की भाषा में इन्हें ब्रैकेट्स कहा जाता है. इन प्रावधानों का विकासशील देशों के घरेलू कृषि क्षेत्र पर गंभीर असर होगा.

दुर्भाग्यवश खाद्य सुरक्षा की जरूरतों और पहले से जारी कृषि संकट के और बिगड़ने से होने वाले नुकसान का जायजा लिए बगैर आनंद शर्मा इस कारोबारी सहूलियत के समझौते को अपना समर्थन देने के लिए इच्छुक हैं.

हालांकि यह समझना महत्वपूर्ण है कि आखिर क्यों गरीब और ज़रूरतमंद लोगों की खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी उपायों की माँग को लेकर जी-33 का प्रस्ताव इतना महत्वपूर्ण है.

पहली बात तो यह साफ़ तौर पर समझ लेना जरूरी है कि एएमएस का हिसाब 1986-88 में जारी कीमतों पर रखा जाता है. इसके बाद से ही और खासकर 2007 के वैश्विक खाद्य संकट के बाद से ही कृषि उत्पादों की कीमतों में बड़ा उछाल दर्ज किया गया है.

भीमकाय कृषि सब्सिडी

वर्ष 1986-88 के दौर को आधार कीमतों के लिए लिया गया है. यह वो दौर था जब खाद्यान्नों की कीमतें बहुत कम हुआ करती थीं. अब इन कीमतों की कोई अहमियत नहीं रह गई है.

दूसरी बात यह है कि अमरीका और यूरोप में दी जाने वाली सब्सिडी पिछले कई सालों से जारी है. भले ही इससे व्यापार अंसतुलन बढ़ता हो.

वास्तव में विकसित देशों ने इस बात पर खुशी जाहिर की है कि ओईसीडी की तरफ से दी जाने वाली भीमकाय कृषि सहायता का मुद्दा दिसंबर 2013 में बाली में होने वाली मंत्री स्तरीय बैठक के एजेंडे में शामिल नहीं है.

इस भीमकाय कृषि सहायता का 80 फीसदी बड़ी कंपनियों और समृद्ध किसानों की जेब में जाता है. दूसरी तरफ फ्रांस के जैक्वेस बर्थेलोट ने अपने विश्लेषण में कहा कि विश्व व्यापार संगठन को लेकर अमरीकी राजदूत की नाराज़गी को पूरी तरह से गैरवाजिब कहा.

साल 2010 में भारत ने अपने साढ़े सात करोड़ लोगों को औसतन 58 किलो प्रति व्यक्ति की दर से खाद्यान्न मुहैया कराया था. इसमें साढ़े छह करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले थे और एक करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले लोग थे.

इसकी तुलना में देखें तो अमरीका ने अपने साढ़े छह करोड़ लोगों को कई कार्यक्रमों के जरिए औसतन 385 किलो प्रति व्यक्ति की दर से खाद्यान्न सहायता दी.

वैश्विक निर्यात

इसके अलावा भारत में गरीब किसानों से गेहूँ और चावल की खरीद का ये मतलब नहीं है कि ये अनाज अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाट दिए जाएंगे और इससे कोई व्यापार अंसतुलन खड़ा हो जाएगा.

वास्तव में जैक्वेस बर्थेलोट ने इस बात का हिसाब लगाया है कि साल 1986-88 में गेहूँ और चावल की वैश्विक कीमतें इसलिए कम थीं क्योंकि अमरीका और यूरोप दोनों ने ही अंतरराष्ट्रीय बाजार को अपने अनाज से पाट रखा था. गेहूँ के वैश्विक निर्यात में अमरीका और यूरोप की हिस्सेदारी 53.2 फीसदी की है.

इसलिए खाद्यान्न की वैश्विक कीमतों में आई कमी के लिए जिम्मेदार कौन है, यह साफ़ हो जाता है. 1986-88 को आधार मान कर 2012-13 के लिए खाद्यान्नों की कीमतें तय किया जाना अब पूरी तरह से बेतुका हो गया है.

लेकिन फिर भी विश्व व्यापार संगठन की वार्ता में अभी तक विकसित देशों के असर को महसूस किया जाता रहा है और इन्हीं देशों ने बातचीत की दिशा और नतीजों को तय किया है.

अगर जी-33 देशों की तरफ से लाए गए भारत के प्रस्ताव का अमरीका और यूरोपीय संघ विरोध करते हैं तो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने में मुश्किल पेश आएगी.

और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस समय भारत के पास विश्व व्यापार संगठन को दरकिनार करते हुए कानून बनाने का कोई प्रावधान नहीं है.

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