केदारनाथ में 75 राहतकर्मियों का दल फंसा

  • 6 जुलाई 2013
Uttarakhand
Image caption मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के अनुसार केदारनाथ और केदारघाटी इलाके में फंसे राहतकर्मियों की संख्या 200 के करीब है. (फाइल फोटो)

प्रलयंकारी बारिश और बाढ़ से केदारनाथ में जैसी तबाही हुई है उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है. आपदा के तीन हफ्ते बाद अब भी वहां बेहद खतरनाक और कठिन परिस्थितियां बनी हुई हैं और दूर-दूर तक जीवन के कोई आसार नहीं हैं.

केदारनाथ में शवों को निकालने और उनकी अंत्येष्टि के लिये गये एनडीआरएफ और पुलिस के जवानों का 75 सदस्यीय दल 3 दिनों से वहीं फंसा हुआ है और यहां तक कि उनके पास राशन-पानी भी खत्म हो रहा है.

भारी बारिश और धुंध की वजह से हेलीकॉप्टर वहां जा नहीं पा रहे और उनके सैटेलाइट फोन की बैटरी भी जवाब दे गई है.

केदारनाथ का सड़क मार्ग ठप्प है और हवाई संपर्क भी मौसम पर निर्भर है.

उत्तराखंड के पुलिस महानिरीक्षक राम सिंह मीणा भी उस दल के साथ गये थे.

सरकार ने कहा है कि 22 जुलाई से शुरू हो रहे कांवड़ मेले में तीर्थयात्री ऋषिकेश से आगे पहाड़ों पर नहीं जा सकेंगे.

इस बाबत दूसरे राज्यों की सरकारों को भी निर्देश भेज दिये गये हैं.उत्तराखंड में आपदा की स्थिति को देखते हुए ये फैसला किया गया है.

सड़क मार्ग ठप्प

Image caption बारिश की वजह से ऊंचे इलाकों में राहतकार्य बाधित हो रहा है.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि, “हमारी योजना थी कि फिलहाल दो दिनों के रसद के साथ इन्हें भेज दिया जाए और फिर 10 दिनों के लिये रसद बाद में हेलीकॉप्टर से भेजी जाएगी. लेकिन जैसे ही मैं वहां से लौटा उसके बाद मौसम इतना खराब हो गया कि एक भी हेलीकॉप्टर उड़ ही नहीं पाया है.”

“शुक्रवार को बड़ी कठिनाई से उनसे संपर्क हुआ था, वो सुरक्षित तो हैं लेकिन किसी तरह मैनेज कर रहे हैं.”

“आपदा में केदारनाथ का हेलीपैड मटियामेट हो चुका था उसकी जगह मंदिर से करीब 2 किमी की दूरी पर दूसरा हेलीपैड बनाया गया है. वहां जानेवाले राहतकर्मी हेलीपैड के पास ही शिविर में हैं.”

शिव की नगरी

केदारनाथ से लौटने के बाद रामसिंह मीणा ने जिस तरह से अपने अनुभव बताए उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज का केदारनाथ शायद सही अर्थों में पुराणों में वर्णित शमशानवासी शिव की नगरी हो गया है.

मीणा कहते हैं, “बिल्कुल बियाबान हो चुका है केदारनाथ. ऊपरी स्थानों पर दो-एक साधु छोड़कर वहां कोई नहीं रह गया है. इक्का-दुक्का घोड़े और खच्चर दिख जाते हैं. एक भी इमारत ऐसी नहीं है जो साबुत हों और जहां पनाह ली जा सके.”

“जो मकान और दुकानें बह गईं उसके अलावा जो बची भी हैं वो खंडहर की हालत में है और पानी और कीचड़ से पटी हुए हैं. कुछ एक ऐसी हैं कि कभी भी ढह सकती हैं.”

“मंदाकिनी जो कभी पतली धार की तरह बहती थी आज उसका पाट काफी अधिक चौड़ा हो चुका है. नदी अभी भी इतने अधिक उफान पर है कि हम लोगों ने वहां लकड़ी और रस्सी का जो अस्थाई पुल तैयार किया है उस पर जरा सी चूक में जान जा सकती है.”

केदारनाथ की आपदा में काफी अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका है. क्योंकि बताया जाता है कि घटना के दिन वहां 13 से 15 हजार लोग मौजूद रहे होंगे.

हालांकि मीणा मीडिया में आई इस तरह की खबरों से इनकार करते हैं कि वहां बहुत लाशें पड़ी हुई हैं. मीणा कहते हैं कि, “जो लाशें सामने दिख रही थीं, हमने हाथ से निकालकर उनका दाह संस्कार कर दिया लेकिन जो मलबे में दबी हैं उन्हें बिना मशीन की सहायता से निकाला नहीं जा सकता.”

ग्लेशियर डिपोसिट

Image caption आपदा के बाद उत्तराखंड के कई इलाकों में जनजीवन पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो गया है.

केदारनाथ में मलबे की सफाई के लिये जेसीबी की जरूरत है लेकिन सड़क मार्ग पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है और कम से कम एक महीने तक उसे बनाना मुश्किल है. तब तक जेसीबी वहां नहीं जा सकती.

अभी कम से कम दो महीने मानसून का असर रहेगा और उसके बाद वहां बर्फबारी शुरू हो जाएगी. इस हफ्ते भी केदारनाथ के ऊपरी इलाकों की चोटियों पर हिमपात हुआ है.

इस बीच कुछ भूविज्ञानियों ने आगाह किया है कि केदारनाथ में खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है.

भारतीय भूविज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक पी सी नवानी कहते हैं, “केदारनाथ के ऊपरी इलाके में चौराबाड़ी झील के टूटने और हिमखंड आने का खतरा हो सकता हैं.”

“वहां आए मलबे को भी बिना सोचे-समझे छेड़ा नहीं जाना चाहिये क्योंकि ये एक बेहद संवेदनशील भूक्षेत्र में ग्लेशियर डिपॉजिट है .”

विशेषज्ञ मानते हैं कि केदारनाथ को फिर से बसाने से पहले वहां के भूविज्ञान और संभावित खतरों को ध्यान में रखना होगा.

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