साइबर जासूसी से कैसे बचेगा भारत?

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

भारत की हवाई प्रतिरक्षा प्रणाली, यहाँ के परमाणु संयंत्र, वाणिज्य जगत से जुड़ी जानकारियाँ या दूरसंचार प्रणाली- ये सभी साइबर ख़तरे से बचे रहें, इसके लिए राष्ट्रीय नीति की घोषणा तो हुई है मगर उसे लागू कैसे किया जाएगा उस पर कोई रोडमैप नहीं रखा गया है.

बीते दिनों सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने 'नेशनल साइबर सिक्योरिटी पॉलिसी 2013' के तहत एक राष्ट्रीय नोडल एजेंसी बनाने की घोषणा की.

साइबर जगत से जुड़े हुए खासकर निजी क्षेत्र के लोग इसे लागू किए जाने के रोडमैप पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं.

Image caption स्नोडन की ओर से जानकारी आने के बाद अमरीका में जासूसी को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं

क़ानूनी जानकारी मुहैया कराने वाली कंपनी यूनाइटेड लेक्स के वाइस प्रेसिडेंट (सूचना प्रौद्योगिकी) उज्ज्वल छबलानी ने कहा, ''गोपनीय डेटा की सुरक्षा अहम होती है क्योंकि इसमें हमारे ग्राहकों के हित सीधे तौर पर जुड़े होते हैं. लिहाज़ा हम पहले से ही काफ़ी सख़्त नियमों का पालन करते हैं. सरकारी नीति केवल निम्नतम स्तर की सुरक्षा की बात करती है और हमारी सुरक्षा इससे कई गुना आगे के स्तर की होती है.''

आम लोगों की सुरक्षा

लेकिन आम तौर पर इंटरनेट और फ़ोन का प्रयोग करने वाले लोगों के पास तो किसी भी तरह की साइबर सुरक्षा नहीं होती. ऐसे में उनकी गोपनीय बातचीत या ईमेल या वाणिज्यिक जानकारियां ख़तरे में होती हैं.

स्थिति और भी ज़्यादा चिंताजनक हो जाती है निजी क्षेत्र में, खासकर तब, जब व्यवसाय गोपनीय जानकारियों से संबंधित ही हो. निजी क्षेत्र की कंपनियों को ज़्यादा ख़तरा अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों से ही होता है.

डेटा सुरक्षा और रिकवरी के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी स्टेलर डेटा प्रोटेक्शन के मुख्य कार्यकारी सुनील चंदना ने कहा, ''कंपनियों को प्रतिस्पर्धा करने वाली कंपनियों से ख़तरा होता है क्योंकि वे एक-दूसरे की जानकारियां इकट्ठा करना चाहती हैं.''

सीआईए के पूर्व जासूस एडवर्ड स्नोडेन की ओर से जारी जानकारी में बताया गया कि अमरीका कई देशों की गोपनीय जानकारियां ख़ुफ़िया तौर पर जुटाता रहा है और जिन देशों की जानकारियां ली गईं उनमें भारत भी शामिल है. बताया गया कि भारत से क़रीब साढ़े छह अरब यूनिट डेटा जुटाया गया.

दूसरे देशों की जासूसी

Image caption एडवर्ड स्नोडेन की ओर से जारी जानकारी में पता चला है कि अमरीका ने भारत से भी ख़ुफ़िया जानकारी जुटाई थी

इस घटना से ये भी संभावना प्रबल हो जाती है कि सिर्फ़ अमरीका ही नहीं और भी देश भारत की साइबर जासूसी में लिप्त हों.

कुछ ही महीनों पहले चीनी हैकरों ने भारत के रक्षा अनुसंधान केंद्र के कंप्यूटरों में सेंध लगाकर गोपनीय जानकारियां निकाली थीं.

बड़ा सवाल अब ये है कि इन हमलों को रोका जाए तो कैसे?

भारत सरकार के कई उपक्रमों के साथ साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था, डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ़ इंडिया के निदेशक विनायक गोडसे बताते हैं, ''पिछले पांच-छह साल में डेटा चोरी और जासूसी की घटनाओं में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है. पहले जहां वेबसाइटें संस्था या व्यक्तियों की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए हैक की जाती थीं अब वहीं शांति से अटैक होते हैं, बिना शोर मचाए सिर्फ जानकारियाँ निकालने के लिए.''

सुरक्षा के लिए निवेश बढ़ा

Image caption सरकार की योजना है कि साइबर सुरक्षा के लिए एक नोडल एजेंसी बनाई जाए जो साइबर मामलों पर कार्रवाई करें

गोडसे का मानना है कि सरकार इन ख़तरों से निबटने के लिए काफी निवेश कर रही है और नेशनल साइबर सिक्योरिटी पॉलिसी इसी दिशा में एक सकारात्मक पहल है.

लेकिन मौजूदा स्थिति को देखें तो साइबर सुरक्षा का एहसास वास्तविकता से दूर है. अपुष्ट खबरों की मानें तो भारत में केवल 556 अधिकृत साइबर सिक्योरिटी ऑफ़िसर्स मौजूद हैं, जबकि चीन में क़रीब सवा लाख और अमरीका में एक लाख के क़रीब लोग अधिकृत तौर पर साइबर सिक्योरिटी से जुड़े हुए हैं.

भारत की गिनती आईटी के क्षेत्र मे एक बड़े देश के तौर पर होती है लेकिन हाल ही में हुई कुछ हैकिंग और डेटा चोरी की घटनाओं ने भारत की साख पर बट्टा लगाया है.

ऐसे में ये एक बड़ा सवाल है कि क्या भारत इस दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा पाएगा या इस मौके पर भी पिछड़ता दिखेगा?

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