अर्थव्यवस्था: टूट रहा है मनमोहन का ‘मोहक सपना’

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, राहुल गाँधी

प्रधानमंत्री के तौर पर दो महीने पहले ही अपने कार्यकाल के 10वें साल में प्रवेश करने वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह के लिए भाग्य इससे ज़्यादा क्रूर नहीं हो सकता था.

22 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव की अगुवाई वाली सरकार के वित्त मंत्री के तौर पर बर्बादी के कगार पर खड़ी देश की अर्थव्यवस्था को उबारने का सेहरा कभी उन्हीं के सिर पर बाँधा गया था.

लेकिन आज उन्हें आर्थिक मोर्चे पर जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है वे बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती हैं.

वास्तव में आर्थिक गैरबराबरी और रुपए की अंतरराष्ट्रीय विनिमय दर के मामले में कम से कम ऐसे दो उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनको लेकर मौजूदा परिस्थितियाँ दो दशक पहले के हालात से कहीं बदतर हैं.

देश में फिलहाल जून 1991 जैसी भी कोई स्थिति नहीं है जब भारत की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रतिबद्धताएँ पूरी करने की क्षमताओं पर ही सवालिया निशान लग गए थे और न ही करदाताओं का सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में गिरवी रखा गया है.

लेकिन विदेशी मुद्रा के सवाल पर वित्तीय वर्ष 2012-13 की तीसरी तिमाही (अक्तूबर-दिसंबर 2012) में चालू खाते का घाटा तकरीबन 33 अरब डॉलर या 1,97,402 करोड़ 70 लाख रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया था.

रुपए की विनिमय दर

यह फासला भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा की आमद और उसके बाहर जाने का है. इतना ही नहीं ये उससे पिछली तिमाही से 46 फ़ीसदी ज़्यादा भी है.

चालू खाते का यह घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 6.7 फ़ीसदी के करीब बैठता है. हालांकि इस घाटे में कमी दर्ज की गई है लेकिन यह अब भी सहज स्थिति से बहुत दूर है.

भुगतान संतुलन के बढ़ते घाटे की वजह से अमरीकी डॉलर के मुकाबले रुपए की विनिमय दर पिछले एक महीने के दौरान ही 12 फ़ीसदी की दर से धड़ाम से गिरी है.

31 मार्च को समाप्त हुए पिछले वित्तीय वर्ष में देश के सकल घरेलू उत्पाद में पाँच फ़ीसदी की दर से बढ़ोत्तरी हुई है. यह पिछले दशक की सबसे धीमी विकास दर थी.

यह एक परेशान कर देने वाला नतीजा है खासकर एक ऐसी सरकार के लिए जो अपनी आर्थिक नीतियों में हर चीज के ऊपर विकास को तरजीह देती रही है.

पिछले कुछ समय से डॉक्टर मनमोहन सिंह के करीबी माने जाने वाले नजदीकी सहायक इस बात को लेकर तर्क देते रहे हैं कि देश की तकरीबन सभी प्रमुख आर्थिक समस्याओं का इलाज विकास है.

विदेशी निवेश

इन सलाहकारों में वित्त मंत्री पी चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया का नाम प्रमुखता के साथ लिया जाता है. सरकार की तरफ से विकास के नारे के झंडाबरदार रहे लोगों का बार-बार यह कहना रहा है कि इससे बचत और निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा.

नौकरियों के अवसर बढ़ेंगे और मुद्रास्फीति के बुरे असर को कम किया जा सकेगा. इतना ही नहीं बल्कि उभरती हुई अर्थव्यवस्था के तौर पर भारत को दुनिया के बड़े देशों के साथ जगह भी मिलेगी.

दुर्भाग्य से इनमें से कुछ भी नहीं हो पाया है. बचत की दर कम हुई है और निवेश भी घटा है. भारतीय उद्यमियों की तरफ से विदेशों में किए जाने वाले निवेश ने पहली बार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को पीछे छोड़ दिया है.

यहाँ तक कि सरकार भी बुरी तरह से विदेशी निवेशकों की ओर गुहार करती हुई दिख रही है और वह इस आशंका से ग्रसित भी है कि साख निर्धारण करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ जल्द ही भारत का दर्जा कम कर देंगी.

अगर ऐसा सचमुच हुआ तो यह पहले से चले आ रहे भुगतान संतुलन को और ज्यादा बिगाड़ देगा. सरकार ने अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमाओं पर लगी रोक हटाई है. इनमें दूरसंचार क्षेत्र भी एक है.

वित्त मंत्री सारी दुनिया घूमकर हर किसी को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत की तरक्की का अफसाना जल्द ही दोबारा शुरू हो जाएगा.

खुदरा क्षेत्र

लेकिन शेयर बाजार में किसी तरह का उत्साह नहीं दिखाई देता और घरेलू और विदेशी निवेश के माहौल में सुधार होने के कम ही संकेत मिलते हैं.

उदाहरण के लिए आठ महीने पहले दिसंबर में सरकार ने खुदरा क्षेत्र में मल्टी ब्रांड आउटलेट्स के लिए विदेशी निवेश को आकर्षित करने के इरादे से नियमों में रियायत दी थी.

ऐसा विपक्ष और सरकार के कुछ घटकों के विरोध के बावजूद किया गया था. हालांकि वे सहयोगी अब सरकार का हिस्सा नहीं रहे लेकिन वॉलमार्ट और टेस्को जैसी विशालकाय कंपनियों ने भारत में निवेश को लेकर अपनी योजनाएँ अभी तक सार्वजनिक नहीं की हैं.

बीते समय में रोजगार के मौके भी उम्मीद के मुताबिक नहीं पैदा हुए हैं. यहाँ तक कि भारतीय इतिहास में पहली बार साल 2004 और 2008 के बीच की चार साल की अवधि के दौरान जब अर्थव्यवस्था नौ फ़ीसदी की दर से बढ़ रही थी तब भी हालात कोई बहुत उत्साहजनक नहीं थे.

नौकरियों के नए अवसर अब और कम हुए हैं और अर्थव्यवस्था भी महज पाँच फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है. आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर हाल के सालों में सरकार की इकलौती सबसे बड़ी नाकामी मँहगाई पर लगाम लगाने की अक्षमता रही है खासकर खाद्य कीमतों के मामले में.

खान-पान की चीजों की मँहगाई दर के दो अंकों में रहने को लेकर कई तरह की बातें की जाती रही हैं. इसमें आमदनी के बढ़ने की वजह से खान-पान की आदतों में हुए बदलाव और ईंधन की ऊँची लागत भी एक वजह रही है.

अर्थव्यवस्थी की सीढ़ी

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि खाद्य पदार्थों की ऊँची कीमतों ने अमीरों के बनिस्बत गरीब लोगों को ज्यादा तकलीफ पहुँचाई है और यहाँ तक कि मध्य वर्ग भी इसके असर से अछूता नहीं रह पाया है.

इसकी वजह सिर्फ इतनी ही है कि अर्थव्यवस्था की सीढ़ी पर जो सबसे नीचे खड़ा होता है उसकी कुल आमदनी का सबसे बड़ा हिस्सा पेट भरने में खर्च हो जाता है.

खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों ने गरीब और अमीर के फासले को और अधिक चौड़ा कर दिया है. यह पहले से गैरबराबरी वाले समाज को और अधिक असमान बनाने जैसा है.

सरकार का पक्ष रखने वाले लोगों का दावा है कि बुरा दौर खत्म हो चुका है और आने वाले वक्त में अर्थव्यवस्था में सुधार होगा. समस्या यह है कि कम ही लोग इस आशावाद से इत्तेफाक रखते हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह बात बार-बार दोहराते रहे हैं कि अच्छी राजनीति और अच्छी अर्थव्यवस्था के बीच कोई अंतर नहीं होता है लेकिन हालात इससे उलट हैं. सरकार ने जो कुछ भी किया है वह उसे राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही तरफ से नुक़सान पहुँचाने जा रहा है.

बाज़ार समर्थक

अगर सरकार को यह लगता है कि ईंधन की घरेलू कीमतों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बराबर रखने की जरूरत है और वह ऐसा करती है तो अगले आम चुनाव में उसके फैसले को लोगों के बीच सराहे जाने की संभावना बहुत कम रहेगी.

कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को अपने कार्यकाल के दौरान संसद में बहुमत के लिए वामदलों पर निर्भर होना पड़ा था और इसकी वजह से उसने कई बाजार समर्थक नीतियों पर अपना रवैया सुस्त भी किया था.

वैसे साल 2009 के बाद से कांग्रेस के हाथ में सत्तारूढ़ गठबंधन की लगाम रही है और वह अपने तथाकथित ‘आर्थिक सुधारों’ के लिए वामदलों को जिम्मेदार भी नहीं ठहरा सकती.

हालाँकि पिछले कुछ सालों के दौरान देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बिगड़ी ही है. 2014 के अप्रैल-मई में होने वाले चुनाव में सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार के लिए यह एक बुरी खबर ही है.

( बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार